Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
अंसार क़ंबरी की ग़ज़लें

हम इधर भी रहे हम  उधर  भी  रहे
जानते  भी   रहे   बेख़बर   भी  रहे
 
ज़िंदगी तो  रही  क़ैदियों  की तरह
बाज़ुओं पर मगर बालो-पर भी रहे

नवीन सी० चतुर्वेदी की ग़ज़लें

जाल में किसी को जब तुम तड़पता देखोगे
और बचा न पाओगे तब हृदय द्रवित होगा

दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त' की ग़ज़लें

पहली आरी सीधे पेड़ों पर चलती है
मेरे बच्चों ज़्यादा भी मत अच्छा होना

गुलशन मदान की ग़ज़लें

बहुत बिकती हैं तलवारें-कटारें
सुई  का धंधा मंदा चल रहा है