Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
शुभारंभ, शब्द और समय- अलका मिश्रा

तकनीक ने हमारी दुनिया को छोटा कर दिया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने लेखन और सृजन की परिभाषाओं पर भी नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। लेकिन तकनीक शब्द दे सकती है, भाषा को नया रूप दे सकती है। संवेदना, अनुभव और मनुष्य होने की गहराई अब भी मनुष्य के भीतर से ही आती है।

बदलता मौसम और बदलती संवेदनाएँ - अलका मिश्रा

इरा वेब पत्रिका का यह अंक इस बार आपके पास अत्यंत विलंब से आ रहा है इसके लिये हम आपसे क्षमाप्रार्थी हैं। इस विलंब के पीछे हमारी टीम की कुछ व्यक्तिगत परेशानियाँ रहीं जिसके कारण पत्रिका पर काम करना संभव न हो सका। आगे से पत्रिका अपने निर्धारित समय से आपके पास पहुँच सके इसके लिये हमने इसके स्वरूप को ‘मासिक' से ‘द्विमासिक' करने का निर्णय लिया है। आशा है कि आपका स्नेह एवं सहयोग पहले की भाँति हमें प्राप्त होता रहेगा।  

विकसित-शिक्षित समय में भी ताक़त मनुष्यता पर हावी है- के० पी० अनमोल

मनुष्य ने अपना जीवन, अपनी जाति को तो ख़तरे डाला ही है, पूरी सृष्टि और तमाम जीव-जन्तुओं का जीना भी हराम किया हुआ है। सार यही समझ आता है कि इस प्रजाति का मूल स्वभाव विध्वंस का ही है।

स्मृति से संकल्प तक- अलका मिश्रा

गोविन्द गुलशन जी की शायरी, उनका मार्गदर्शन और उनका स्नेह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश-पुंज बनकर रहेगा। यह विशेषांक उसी स्मृति, उसी कृतज्ञता और उसी प्रकाश को समर्पित है।