Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
नवीन सी० चतुर्वेदी की ग़ज़लें

जाल में किसी को जब तुम तड़पता देखोगे
और बचा न पाओगे तब हृदय द्रवित होगा

दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त' की ग़ज़लें

पहली आरी सीधे पेड़ों पर चलती है
मेरे बच्चों ज़्यादा भी मत अच्छा होना

गुलशन मदान की ग़ज़लें

बहुत बिकती हैं तलवारें-कटारें
सुई  का धंधा मंदा चल रहा है

शिज्जू शकूर की ग़ज़लें

दर्द की शक्ल बदलते ही बदल जाते हैं
मेरे अल्फ़ाज़ नये सांचों में ढल जाते हैं

क्या ज़रूरी है कि ठोकर से सबक़ ले कोई
जो समझदार हैं, पहले ही सँभल जाते हैं