Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
लद्दो देवी और ड्राइविंग का लोकतंत्र- - प्रीति 'अज्ञात'

लोग कहते हैं, डर का भी एक संस्कार होता है, हमारी लद्दो देवी उसी कुल की कन्या थीं। बचपन में साइकिल चलाने से डर, कॉलेज में स्कूटर से डर, शादी के बाद कार से डर और बुढ़ापे में ओला-उबर से प्यार; लद्दो देवी का विकास-क्रम यही रहा।

लोकतंत्र की गाड़ी चल पड़ी, पम पम पम-डॉ० मुकेश असीमित

लोकतंत्र की इस गाड़ी का डिज़ाइन भी निराला है। टायर में ट्यूब नहीं, बल्कि वादों की हवा भरी गई है। इंजन? जी हाँ, वो पुराने, झूठे भाषणों की गर्मी से चलता है। और सीटें? भाई, सीटें आरक्षित हैं– सामान्य जनता के लिए 'जनरल डिब्बा' है, खचाखच भरा। जनता भीड़ में ही सुकून महसूस करती है। अकेले बैठने में डर लगता है।

कवि की कार और आलोचक का अलाऊंस- डॉ० प्रमोद सागर

अब जनाब, यात्रा आत्मा की नहीं, इंस्टाग्राम की है। पहले कवि मन से उतरता था, अब 'मॉडल पोज़' में।
अब कवि का दर्द पेट्रोल की तरह है- महँगा भी, ज्वलनशील भी, और कुछ-कुछ फेक भी।

सैयारा का तैयारा- दिलीप कुमार सिंह

इस फ़िल्म में युवक-युवतियाँ (जिन्हें अब ज़ेन ज़ी भी कहा जाता है) अपने वर्तमान प्रेम के साथ फ़िल्म देखने जाते हैं और अपने भूतपूर्व प्रेम (एक्स) को याद करके दहाड़ें मारकर रोते हैं। मैं भी अपनी दफ़्तरी नीरस और उबाऊ दिनचर्या से ऊबकर कर यह ज़ेन ज़ी, मिलेनियल और अल्फ़ा जेनेरेशन की फ़िल्म देखने चला गया।