Ira Web Patrika
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स्मृतियों में बसी एक कला वीथिका- अशोक भौमिक

मुम्बई के सबसे लोकप्रिय डेस्टिनेशन्स में से एक है– जहाँगीर आर्ट गैलरी। सात-आठ सालों के लंबे इंतज़ार के बाद चित्रकारों को यहाँ एग्जिबिशन के मौक़े मिलते हैं। अशोक भौमिक के इस नायाब संस्मरण की पृष्ठभूमि में यही कला-गैलरी है। गहरी मानवीय संवेदना से संपृक्त इस स्मृति आख्यान में हमारी दुनिया के छल और विश्वासघात की ऐसी तस्वीरें हैं, जो पाठक को स्तब्ध कर जाती हैं।

- गंगाशरण सिंह

पिता होना- सुधा गोयल

यह वह वक्त था, जब लड़कियाँ अकेली घर से बाहर नहीं निकलती थीं। आप उन परम्पराओं से बग़ावत करना सिखा रहे थे। और मैं क़दम-क़दम आपके सिखाए या दिखाए रास्ते पर चल रही थी। आप मुझे गढ़ रहे थे। हिम्मत से आगे बढ़ा रहे थे। मैं आपका सपना थी और आप वह सपना पूरा कर रहे थे। आप राजनैतिक जलसों में भी साथ ले जाने लगे थे। राजनीति का क-ख-ग भी आपसे सीखे रही थी।

मृद्गंध की स्मृति : हरिगढ़ की मिट्टी से नगर के आकाश तक- डॉ० मुकेश कुमार

प्रातःकाल के सूरज की लालिमा खेतों में फैल रही थी। बालक अपने छोटे पाँव हल की पथरीली रेखाओं पर रखकर चलता और बैलों की धीमी चाल तथा हल की खुरचाइयाँ उसके भीतर जीवन में संतुलन और स्थिरता का भाव पैदा कर रही थी।

बचपन की चोरी- अंजू केशव

गर्मियों में जब पूरा परिवार दोपहर की नींद का मजा ले रहा होता तो माँ के बनाए हुए अचार चुरा कर खाना प्रिय शगल था। क्या आनंद था उसमें आहाहा! भुलाए नहीं भूलता। एक बार तो इस चोरी के चक्कर में, नए बने अचार की पूरी की पूरी बरनी ही ऊँचाई से गिरा कर तोड़ दी और बरनी के साथ अचार का भी सत्यानाश कर दिया।