Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
विकास की ग़ज़लें

विकास की ग़ज़लें अपने समय की तल्ख़ अभिव्यक्ति है। वे पूरी ग़ज़लीयत के साथ, बड़े सलीक़े से हमारे दौर के ज़रूरी विषय अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं। इनकी ग़ज़लों के आईने में सियासत, समाज और उस समाज का आम आदमी, सभी अपना अक्स बहुत साफ़-साफ़ देख सकते हैं। इनके पास बेबाक कहन है और उतने ही बेबाक विषय उठाने की हिम्मत भी। बहुत सादगी और संजीदगी के साथ ग़ज़ल में विकास साधनारत हैं। मज़बूत कथ्य के साथ-साथ इनकी ग़ज़लों की अपनी ज़मीनें तथा उनके रदीफ़ भी सम्मोहित करते हैं।

- के० पी० अनमोल

सत्यम भारती की ग़ज़लें

ख़ुशियों का पल उतरा है
बादल-बादल उतरा है

सारे जग का उजियारा
किरणों में ढल उतरा है

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें

करें ख़ुद ग़लतियाँ और गालियाँ बंदों को बक जाएँ
भरोसा कुछ नहीं ज़िल्ले-इलाही कब सनक जाएँ

जुटे हैं सारे दरबारी अभी पर्दे सजाने में
यही हैं कोशिशें दरबार के सब पाप ढक जाएँ

किशन तिवारी की ग़ज़लें

माफ़ कर देना हमें इतिहास अपनी भूल पर
इस सदी ने बोई जो बतलाओ नफ़रत ठीक है!