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दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त' की ग़ज़लें

दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त' की ग़ज़लें

पहली आरी सीधे पेड़ों पर चलती है
मेरे बच्चों ज़्यादा भी मत अच्छा होना

ग़ज़ल- एक

मासूमों को झोंक दिया है भट्टी में
किसने पत्थर मार दिया मधुमक्खी में

उनके मुँह से शांति अहिंसा की बातें
गुजराती ताला ज्यों खर की टट्टी में

पत्थर दोनों ही हैं बाक़ी क़िस्मत है
कोई मंदिर कोई आटा चक्की में

लगा हुआ था बच्चों का इक न्यायालय
सारे झगड़े निपटे कट्टी मिट्ठी में

उड़ने वालों उड़ लो जितना उड़ना है
मिल ही जाना है सब इक दिन मिट्टी में

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ग़ज़ल- दो

बोझ जब लगने लगे अनुबंध का क्या अर्थ है
झूठ की बुनियाद पर सौगंध का क्या अर्थ है

काठ का उल्लू बनाकर छोड़ दे जो ताख में
है नदारद प्रेम तो संबंध का क्या अर्थ है

देखना ही है नहीं खा ली कसम जिस शख़्स ने
साफ़ मौसम, धूल, बारिश, धुंध का क्या अर्थ है

यदि कुटिलताएँ भरी हों तितलियों के वास्ते
तो कुसुम दल में समाहित गंध का क्या अर्थ है

जब कुएँ में घोल दी जाएँ नशे की गोलियाँ
फिर नशे के पान पर प्रतिबंध का क्या अर्थ है

उष्ण, समशीतोष्ण हो या शीत के मौसम रहें
आप हों जब साथ तो कटिबंध का क्या अर्थ है

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ग़ज़ल- तीन

कितने भी मतवाले हों तो क्या करिएगा?
खाने के ही लाले हों तो क्या करिएगा?

पंच बनाकर बिठा दिया है सच्चाई ने
झूठे बहुमत वाले हों तो क्या करिएगा?

वो जिसने एहसान किए हों लाखों तुम पर
वो दिल के ही काले हों तो क्या करिएगा।

जादूगर का जादू रुक जाएगा लेकिन
दर्शक मति भ्रम पाले हों तो क्या करिएगा?

आईने को साफ़ कराने वालों बोलो
आँखों पर ही जाले हों तो क्या करिएगा?

कम-ज़र्फ़ों ने कम-ज़र्फ़ी के बद-नीयती के
सौ-सौ उल्लू पाले हों तो क्या करिएगा

छप्पन भोग बनाकर रख रक्खा हो लेकिन
दरवाज़ों पर ताले हों तो क्या करिएगा?

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ग़ज़ल- चार

मान मनौवल क्यों करना क्या रोना धोना?
जाओ जाओ जाओ तुम तो ख़ुश ही हो ना?

कंकर पत्थर कौन लिए फिरता है आख़िरी
झोली में जिसके भी आ जाता है सोना।

जाने का जब सोच लिया तो जाओ ही फिर
ऐसे में अब रुककर भी किसका क्या होना?

सोच रहे हो पंछी वापस आ जाएगा
आँगन में रखकर बैठे हो ख़ाली दोना।

पूरा घर जिसका होना है हो जाए पर
ख़ाली रखना वो मेरा छोटा सा कोना।

चिट्ठी का मजमून बनाना ये क्या जाने
मैसेज में जो खेल रहे हैं बाबू शोना।

पहली आरी सीधे पेड़ों पर चलती है
मेरे बच्चों ज़्यादा भी मत अच्छा होना

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ग़ज़ल- पाँच

डोरे डालेंगी इच्छाएँ इच्छाओं पर ताले रखना।
दिन दूने टूटेंगे लेकिन सारे ख़्वाब सम्हाले रखना।

जो फूलों का हार सजाएँ उनके आगे ख़ुद बिछ जाना
जो काँटे चुनकर लाएँगे उनकी ख़ातिर भाले रखना।

दुनियादारी समझाएँगे दुनिया वाले क़दम क़दम पर
फिर भी मस्तों की बस्ती में अपना डेरा डाले रखना।

कोयल बुलबुल भौंरे तितली इनको रखना बाहर लेकिन
अंदर के जंगल में थोड़े-थोड़े उल्लू पाले रखना।

कायर कूचर निब्बर झब्बर चल जायेंगे सारे लेकिन
गोरे चाहे काले रखना यार मगर दिलवाले रखना।

ख़ुद लिखकर ख़ुद ही समझें वो समझाएँगे क्या लिखना है
अपनी सीधी सच्ची बातें फिर भी रोज़ हवाले रखना।

रख लेना मासूम दुआएँ जेबों में ताबीज़ बनाकर
असहज करने वाली बातें आयेंगी तो टाले रखना।

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2 Total Review
D

divakar pandey

07 July 2025

संपादक महोदय का बहुत बहुत आभार

वसंत जमशेदपुरी

04 July 2025

बहुत सुंदर

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रचनाकार परिचय

दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त'

ईमेल : pandeydivakar.pandey.dp@gmail.com

निवास : लखनऊ (उ०प्र०)

प्रकाशित पुस्तकें- गोपी (लघुकथा संग्रह), चित्रगुप्त का समाधान, तमाशाई व सीधे-सच्चे व्यंग्य (व्यंग्य संग्रह), हवा इस ओर की चलती नहीं है (ग़ज़ल संग्रह), हारा हुआ नायक (उपन्यास)
निवास- लखनऊ (उ०प्र०)
मोबाइल- 7526055373