Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वृद्धों की बात और हालात- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

ज़ाहिर है, जो समय आराम, सम्मान और लिहाज का है, ऐसे ही समय में हमारी पीढ़ी ज़ईफों को तनहा छोड़ देती है। फिर एक ऐसा समय आता है कि वह भरा-पूरा घर रहने के बावजूद वृद्धाश्रम की तरफ चल पड़ते हैं।

मुझसे उनका लगाव कुछ अलग ही तरह का था- दीपक जैन 'दीप'

मेरी ज़िंदगी मे आपके होने के तसव्वुर को मैं शायद आज तक कोई नाम नहीं दे पाया हूँ। आपके सुलूक़ से कभी लगता था कि आप मुझे अपना भाई समझते हैं, कभी लगता था दोस्त समझते हैं, कभी लगता था आप मेरी रहबरी फ़रमा रहे हैं, कभी बच्चों की तरह दुलार रहे हैं।

ग़ज़लकार गोविंद गुलशन तथा जीवन और मौत का फ़लसफ़ा- के० पी० अनमोल

गोविंद गुलशन साहब को पढ़ते हुए बार-बार एक बिंदु पर ध्यान जाता रहा कि इनके लेखन में जीवन और मौत को कई तरह से समझा गया है, परिभाषित किया गया है। वे जीवन को उसकी पूरी धड़कन के साथ महसूस करते हैं तो मौत को उसकी पूरी जड़ता के साथ।

चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास- संतोष सिंह

रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उधेड़-बुन, आशा-निराशा, हार-जीत तथा धूप-छाँव को अपने में समेटती गोविन्द गुलशन जी की ग़ज़लें विविधता से भरी हुई हैं।