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वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें

करें ख़ुद ग़लतियाँ और गालियाँ बंदों को बक जाएँ
भरोसा कुछ नहीं ज़िल्ले-इलाही कब सनक जाएँ

जुटे हैं सारे दरबारी अभी पर्दे सजाने में
यही हैं कोशिशें दरबार के सब पाप ढक जाएँ

ग़ज़ल- 1

आत्मा आहत हुई तो शब्द बागी हो गये
कहते-कहते हम ग़ज़ल दुष्यंत त्यागी हो गये

है सियासत कोठरी काजल की रखना एहतियात
अच्छे-अच्छे लोग इसमें जा के दागी हो गये

गेह-त्यागन और यह संन्यास धारण सब फ़रेब
ज़िन्दगी से हारने वाले विरागी हो गये

गालियाँ बकते रहे जिनको उन्हीं के सामने
क्या हुआ ऐसा कि श्रीमन पायलागी हो गये

आप जिन कामों को करके हो गये पुण्यात्मा
हम उन्हीं को करके क्यों पापों के भागी हो गये

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ग़ज़ल- 2

कौवे कई पधार चुके हैं मचान पर
अब तब्सिरा करेंगे वो कोयल की तान पर

लोगों ने चीख-चीख के हालत बिगाड़ ली
रेंगी कहाँ है जूँ भी मगर उनके कान पर

औरों का ख़ून चूस के मोटा हुआ है जो
उपदेश दे रहा है वो विधि के विधान पर

बरसों हमारी अक़्ल पे ताला पड़ा रहा
करते रहे भरोसा किसी बेईमान पर

पंछी के पर कतर के ये सय्याद ने कहा-
जाना है जाओ शौक़ से ऊँची उड़ान पर

ख़ूबी कहो इसे या हमारी कमी कहो
जो है हमारे दिल में वही है ज़ुबान पर

इक रोज़ ऐ 'अकेला' वो आएगा लौट के
चैनो-क़रार है इसी वह्मो-गुमान पर

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ग़ज़ल- 3

लोग भी क्या हैं, किसी का दिल दुखाकर ख़ुश हुए
फूल पर बैठी हुई तितली उड़ाकर ख़ुश हुए

प्यास हम अपनी बुझा लें, ये इजाज़त है कहाँ
फिर भी ऐ दरिया तेरे नज़दीक आकर ख़ुश हुए

मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं
लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपाकर ख़ुश हुए

शक्लो-सूरत देखने लायक़ थी तब सय्याद की
क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ाकर ख़ुश हुए

आख़िरश करते भी क्या, जब क्लास में टीचर न था
सारे बच्चे-बच्चियाँ ऊधम मचाकर ख़ुश हुए

बोझ दिल का एक ही झटके में हल्का हो गया
हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुलाकर ख़ुश हुए

ऐ 'अकेला' और क्या होता, शबे-ग़म ये हुआ
सरफिरे झोंके चराग़ों को बुझाकर ख़ुश हुए

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ग़ज़ल- 4

करें ख़ुद ग़लतियाँ और गालियाँ बंदों को बक जाएँ
भरोसा कुछ नहीं ज़िल्ले-इलाही कब सनक जाएँ

जुटे हैं सारे दरबारी अभी पर्दे सजाने में
यही हैं कोशिशें दरबार के सब पाप ढक जाएँ

सियासत वोट की शासन से जो करवाए, वो कम है
नया फ़रमान तो देखो- 'कुएँ प्यासों तलक जाएँ'

ये शाही जश्न का मौक़ा है, गुस्ताख़ी न कर देना
सम्हालो दर्द अपना तुम, न ये आँखें छलक जाएँ

अरे पगले न यूँ ख़ुश हो, ये है तामीर सरकारी
मुकम्मल हो भवन, तब तक न दीवारें दरक जाएँ

न इतरा करके तू गुलज़ार, उपजाऊ ज़मीनों को
हुनर तब है बयाबानों में जब गुलशन महक जाएँ

न होगी जी हुज़ूरी ऐ 'अकेला' हम से टुच्चों की
हमारे काम सबके सब अटकते हैं, अटक जाएँ

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ग़ज़ल- 5

वो चलाये जा रहे दिल पर कटारी देखिए
हँस रहे हैं फिर भी हम, हिम्मत हमारी देखिए

पायलागी सामने और पीठ पीछे गालियाँ
आजकल के आदमी की होशियारी देखिए

एक हरिजन दर्द अपना क्या बयां कर पाएगा
सामने शुक्ला, दुबे, चौबे, तिवारी देखिए

सारे अपराधों पे है हासिल महारथ आपको
आप संसद के लिए उम्मीदवारी देखिए

मैकशों के साथ उठना-बैठना अच्छा नहीं
मौलवी जी आप अपनी दीनदारी देखिए

कब तलक लटका के रक्खेंगे ये दिल का मामला
सामने वाले की कुछ तो बेक़रारी देखिए

काम हो पाया नहीं तो घूस लौटा दी गई
बेईमानों की ज़रा ईमानदारी देखिए

ऐ ‘अकेला’ इक तमाशा बन गई जम्हूरियत
एक बंदर को नचाते सौ मदारी देखिए

2 Total Review

नन्दलाल रौशन

27 December 2025

हर ग़ज़ल अपने आप में लाजवाब है आदरणीय, क्या कहने, बहुत खूब

A

AWDHESH KUMAR MEENA

26 December 2025

बहुत खूब लिखा सर जी

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रचनाकार परिचय

वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

ईमेल : virendraakelachh@gmail.com

निवास : छतरपुर (म०प्र०)

जन्मतिथि- 18 अगस्त, 1968
जन्मस्थान- किशनगढ़, छतरपुर (म०प्र०)
शिक्षा- एम० ए० (इतिहास), बी० एड
सम्प्रति- अध्यापन
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, गीत, कविता, व्यंग्य-लेख, कहानी, समीक्षा आलेख।
प्रकाशन- 'शेष बची चौथाई रात' (ग़ज़ल संग्रह, 1999), 'सुबह की दस्तक' (ग़ज़ल-गीत-कविता, 2006), 'अंगारों पर शबनम' (ग़ज़ल संग्रह, 2012)
वागर्थ, कथादेश, वसुधा, साप्ताहिक शुक्रवार, त्रिवेणी सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं रचनाओं का प्रकाशन।
उपलब्धियाँ- भावना प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'समकालीन हिंदी ग़ज़लकार' एवं किताबगंज प्रकाशन, राजस्थान द्वारा प्रकाशित 'हिंदी ग़ज़ल परम्परा' में वर्णित उल्लेखनीय ग़ज़लकारों में शामिल ग़ज़लकार। 'चुनी हुई हिन्दी ग़ज़लें' (सूर्य भारती प्रकाशन, दिल्ली), समकालीन ग़ज़लकारों की बेहतरीन ग़ज़लें (किताबगंज प्रकाशन, राजस्थान), सदी के मशहूर ग़ज़लकार (गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज), इस दौर की ग़ज़लें (के०बी०एस० प्रकाशन, दिल्ली) आदि प्रतिष्ठित/उल्लेखनीय ग़ज़ल संकलनों में सम्मिलित। इंटरनेट पर कविता कोश, भारत कोश, रेख़्ता, विकिपीडिया आदि पर प्रकाशित।
प्रसारण- लगभग 30 वर्षों से आकाशवाणी, छतरपुर से रचनाओं का निरंतर प्रसारण। आकाशवाणी द्वारा गायन हेतु रचनाएँ अनुमोदित। दूरदर्शन केंद्र, भोपाल से रचनाओं का प्रसारण।
सम्मान- ग़ज़ल संग्रह 'शेष बची चौथाई रात' पर अभियान जबलपुर द्वारा 'हिन्दी भूषण' अलंकरण।
गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज द्वारा 'अकबर इलाहाबादी' सम्मान।
पुष्पगंधा प्रकाशन, कवर्धा (छत्तीसगढ़) द्वारा 'चंद्रसेन विराट' स्मृति सम्मान।
मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति मंच, सागर (म०प्र०) द्वारा कपूर चंद वैसाखिया 'तहलका' सम्मान।
अखिल भारतीय साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा काव्य कृति ‘सुबह की दस्तक’ पर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान के अन्तर्गत 'काव्य-कौस्तुभ' सम्मान तथा लायन्स क्लब द्वारा ‘छतरपुर गौरव’ सम्मान।
सम्पर्क- छत्रसाल नगर के पीछे, पन्ना रोड, छतरपुर (म०प्र०)- 471001
मोबाइल- 9981585601