Ira Web Patrika
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सामाजिक व्यवस्था पर कड़ा प्रहार : उपन्यास ‘निज़ाम’- आनंद दास

मोहनदास नैमिशराय का उपन्यास ‘निज़ाम’ दलित चेतना और यथार्थवादी चित्रण का एक सशक्त माध्यम है। यह उपन्यास भारतीय न्याय व्यवस्था, जेल प्रशासन और समाज में व्याप्त जातिवाद की जड़ों पर गहरा प्रहार करता है।....नैमिशराय जी ने मुख्य रूप से जेल की चारदीवारी के भीतर के शोषण को उजागर किया है। उपन्यास के जरिए वे यह स्पष्ट करते हैं कि जेल जैसी जगह ‘सुधार-गृह’ बनने की बजाय दलितों और पिछड़ों के लिए ‘यातना-गृह’ बनी हुई है।

रचनात्मक विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव : राहतों के नाम पर बेचैनियाँ- डॉ० अविनाश भारती

संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें शामिल प्रत्येक ग़ज़ल अपने अलग भाव-संसार और अनुभव के साथ सामने आती है। कहीं सामाजिक विडम्बनाओं पर तीखा व्यंग्य है, कहीं राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन पर चोट है, कहीं रिश्तों की नमी और टूटन है तो कहीं स्त्री-जीवन की गहरी पीड़ा और संघर्ष है।

क्या खोया- क्या पाया का आकलन : टेसू लेके ही टरे- डॉ० मधु संधु

इन कहानियों में प्रवासी मन की पीड़ा, सांस्कृतिक चित्र, सम्बन्धों के घेरे, नियति के घात, बहुमुखी चुनौतियाँ, अतीत की भावुक स्मृतियाँ और अपने देश की याद अधिकांशत: यहाँ-वहाँ बिखरी हैं।

स्मृतियों, रिश्तों और बदलते समय का अंतर्द्वंद्व : वे लोग- आशा पाण्डेय

इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी कहानी नायिका के आत्मकथ्य के रूप में सामने आती है। उपन्यास का मूल स्वर गाँव और शहर के बीच फैले जीवन-संघर्ष को पकड़ता है, जहाँ केवल भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि संवेदनाओं की दूरियाँ भी जन्म लेती हैं।