Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

अंधकार के विरुद्ध गीतात्मक प्रतिरोध : जहाँ नहीं उजियार का सामाजिक यथार्थ- अवनीश त्रिपाठी

अंधकार के विरुद्ध गीतात्मक प्रतिरोध : जहाँ नहीं उजियार का सामाजिक यथार्थ- अवनीश त्रिपाठी

'जहाँ नहीं उजियार' केवल एक नवगीत-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय के सामाजिक अंतर्विरोधों का गीतात्मक दस्तावेज है। योगेन्द्र मौर्य के नवगीत दलित चेतना को केंद्र में रखते हुए उस व्यापक मानवीय संघर्ष को स्वर देते हैं, जो समानता, गरिमा और न्याय की खोज से जुड़ा है। इन गीतों में पीड़ा का स्वर है, पर उससे अधिक परिवर्तन की आकांक्षा है; अंधकार का चित्रण है, पर उससे भी अधिक उजियार की संभावना पर विश्वास है।

नवगीत हिंदी काव्यधारा की वह संवेदनात्मक परिणति है, जो परंपरागत गीत की लयात्मकता को बनाए रखते हुए आधुनिक जीवनानुभवों की जटिलताओं से साक्षात्कार करती है। छायावादोत्तर काल में जब सामाजिक यथार्थ की कठोरता और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के विघटनकारी अनुभव साहित्य के केंद्र में आए, तब गीत-विधा के सामने यह चुनौती थी कि वह केवल रागात्मक आत्माभिव्यक्ति तक सीमित न रहे, बल्कि बदलते समय की विडंबनाओं, विसंगतियों और संघर्षों को भी आत्मसात करे। इसी ऐतिहासिक दबाव से नवगीत का उद्भव हुआ। यह न तो पारंपरिक श्रृंगारिक गीत का विस्तार है, न ही मुक्तछंद कविता का विकल्प; बल्कि यह लय, छंद और गेयता की संरचना में समकालीन जीवन की टूटन, श्रम, शहरीकरण, राजनीतिक छल, सामाजिक असमानता और मानवीय असुरक्षा को अभिव्यक्त करने का सर्जनात्मक प्रयास है।

नवगीत ने लोकधर्मी संवेदना, बोलचाल की भाषा और जीवन-सापेक्ष बिंबों को अपनाते हुए कविता को पुनः जन-संवाद का माध्यम बनाया। यहाँ गीत का संगीत केवल भाव- विलास का उपकरण नहीं, बल्कि प्रतिरोध की ऊर्जा है। इस विकास-यात्रा में नवगीत ने अनेक चरण पार किए, जैसे- आरंभिक सामाजिक यथार्थ-बोध से लेकर जनांदोलन, दलित चेतना, स्त्री-अस्मिता, पर्यावरण-संकट और लोकतांत्रिक विडंबनाओं तक। इस प्रकार नवगीत का आशय केवल ‘नया गीत’ नहीं, बल्कि ‘नए समय का गीत’ है। ऐसा गीत जो लय में बँधा होते हुए भी जीवन की विसंगत लयों को पहचानता है और उन्हें स्वर देता है। इसी परंपरा में योगेन्द्र प्रताप मौर्य के संग्रह ‘जहाँ नहीं उजियार’ के सभी 60 गीतों को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ नवगीत की सामाजिक प्रतिबद्धता और गीतात्मकता का सघन संश्लेष उपस्थित है। नवगीत-संग्रह ‘जहाँ नहीं उजियार’ समकालीन हिंदी नवगीत की उस धारा का प्रतिनिधि पाठ है, जिसमें गीत की लयात्मकता और सामाजिक प्रतिबद्धता का जीवंत संश्लेष उपस्थित होता है। यह संग्रह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे समय की सामाजिक संरचना, दलित अनुभव, स्त्री की विडंबित स्थिति, राजनीतिक छल-छद्म, आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय संकट का बहुआयामी काव्य-प्रलेख है। नवगीत के संबंध में देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ का कथन स्मरणीय है कि ‘हर गीत, नवगीत नहीं होता पर हर नवगीत का गीत होना आवश्यक है।’ योगेन्द्र मौर्य के गीत इस कसौटी पर खरे उतरते हैं क्योंकि इनमें गेयता के साथ युगबोध की तीक्ष्णता और पक्षधरता का साहस एक साथ उपस्थित है।

संग्रह के शीर्षक ‘जहाँ नहीं उजियार’ को यदि व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में देखा जाए, तो यह केवल प्रकाश-अंधकार का सामान्य द्वंद्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उन हिस्सों की पहचान है, जो विकास, संसाधन और सम्मान की मुख्यधारा से बाहर रह गए हैं। ‘उजियार’ यहाँ ज्ञान, अवसर, न्याय और मानवीय गरिमा का प्रतीक बन जाता है, जबकि ‘जहाँ नहीं’ का संकेत वंचना की स्थायी संरचना की ओर जाता है। इस शीर्षक में भारतीय काव्य-परंपरा के ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की सांस्कृतिक स्मृति भी निहित है, किंतु योगेन्द्र मौर्य इस प्रार्थना को आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक अर्थ प्रदान करते हैं। शीर्षक एक प्रश्न भी है और एक प्रतिरोध भी। यह उन बस्तियों, श्रमिक जीवन-स्थितियों और दलित अनुभवों की ओर संकेत करता है, जहाँ स्वतंत्रता और लोकतंत्र के दशकों बाद भी ‘उजियार’ नहीं पहुँचा। इस दृष्टि से शीर्षक पूरे संग्रह का वैचारिक केंद्र बन जाता है। नवगीत की परंपरा में शीर्षक अक्सर रचना-दृष्टि का संकेतक होता है, जैसा कि नामवर सिंह ने कहा था कि ‘रचना का शीर्षक उसकी वैचारिक देहरी होता है।’ योगेन्द्र मौर्य का यह शीर्षक संग्रह के भीतर उपस्थित सभी सरोकारों को एक सूत्र में बाँध देता है। दलित चेतना, स्त्री की पीड़ा, श्रम की उपेक्षा, राजनीतिक अंधकार और पर्यावरणीय संकट सभी इस ‘उजियार के अभाव’ की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ बनकर सामने आते हैं। इस प्रकार शीर्षक केवल प्रतीक नहीं, बल्कि संग्रह की सामाजिक संवेदना का रूपक बन जाता है।

संग्रह की केंद्रीय चेतना दलित विमर्श है, पर यह विमर्श घोषणापरक न होकर संवेदनात्मक और अनुभवजन्य धरातल पर व्यक्त हुआ है। शीर्षक गीत की पंक्तियाँ ‘देख रहा हूँ उस बस्ती को/ जहाँ नहीं उजियार’ केवल भौतिक अंधकार का संकेत नहीं करतीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और अवसर-वंचना के स्थायी अंधकार की ओर इंगित करती हैं। ‘भूखे-नंगे बच्चे सारे/ घर भी हैं बीमार’ जैसी पंक्तियाँ वर्गीय और जातीय हाशियाकरण की उस सच्चाई को सामने लाती हैं, जिसे विकास-चर्चाएँ अक्सर ढँक देती हैं। यहाँ कवि प्रश्न उठाता है ‘इस स्थिति के लिए किसे हम/ मानें जिम्मेदार’ यह प्रश्न किसी एक सत्ता-तंत्र से नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक विवेक से है। दलित विमर्श यहाँ करुणा-प्रधान नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व-प्रधान है। योगेन्द्र मौर्य के इस संग्रह में दलित चेतना केवल विषयगत उपस्थिति नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण काव्य-दृष्टि की आधारभूमि के रूप में विकसित होती है। उनके नवगीतों में दलित जीवन का चित्रण बाहरी सहानुभूति के रूप में नहीं, बल्कि आत्मानुभव की प्रामाणिकता के साथ सामने आता है।

यह दलित-चेतना पीड़ा के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति, सामाजिक संरचना और आत्मसम्मान की आकांक्षा को एक साथ व्यक्त करती है। कई गीतों में यह चेतना प्रतिरोध की भाषा ग्रहण कर लेती है, जहाँ वंचना की स्वीकृति नहीं बल्कि उसके विरुद्ध संघर्ष की तैयारी दिखाई देती है। कवि जब लिखता है ‘हमने काटे हैं पहाड़ तो/ तोड़ी है चट्टान’, तब वह श्रम को दलित अस्मिता के केंद्रीय तत्व के रूप में स्थापित करता है। यह श्रम केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि इतिहास में अपने अस्तित्व को दर्ज करने का माध्यम बन जाता है। इन नवगीतों में दलित जीवन की त्रासदी को करुणा के भावुक आग्रह से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के ठोस चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। ‘भूखे-नंगे बच्चे सारे/ घर भी हैं बीमार’ जैसी पंक्तियाँ सामाजिक उपेक्षा की संरचनात्मक प्रकृति को उजागर करती हैं। यहाँ ग़रीबी को व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता के रूप में देखा गया है। इसी संदर्भ में कवि का प्रश्न ‘इस स्थिति के लिए किसे हम/ मानें ज़िम्मेदार’ दलित विमर्श के मूल प्रश्न को सामने लाता है। यह प्रश्न नैतिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर समाज को कटघरे में खड़ा करता है। योगेन्द्र मौर्य की दलित चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह इतिहास और वर्तमान के बीच संबंध स्थापित करती है। ‘हम “बहुजन” हैं हमीं/ प्रताड़ित होते आए हैं’ जैसी पंक्तियाँ केवल वर्तमान पीड़ा का बयान नहीं, बल्कि शताब्दियों से चली आ रही सामाजिक असमानता की स्मृति हैं। इस प्रकार कवि दलित अनुभव को समय की लंबी धारा में रखकर देखता है। यह दृष्टि उस वैचारिक परंपरा से जुड़ती है, जिसे भीमराव रामजी आंबेडकर ने सामाजिक न्याय और समानता के संघर्ष के रूप में स्थापित किया था।

संग्रह के नवगीतों में प्रत्यक्ष वैचारिक घोषणाएँ नहीं हैं, परंतु समानता और प्रतिनिधित्व की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन गीतों में दलित चेतना का एक और आयाम आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है। कवि दलित जीवन को केवल पीड़ित या असहाय रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसकी जिजीविषा और संघर्षशीलता को भी रेखांकित करता है। 'गर्म हवाओं से लड़ना ही/ है अपनी पहचान' जैसी पंक्तियाँ दलित जीवन की जीवटता को अभिव्यक्त करती हैं। यह स्वर निराशा का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का है। नवगीत की लयात्मक संरचना इस आत्मविश्वास को और प्रभावी बना देती है, जिससे गीत में संघर्ष और आशा का संतुलित भाव निर्मित होता है। दलित चेतना का सामाजिक आयाम भी इन नवगीतों में स्पष्ट है। कवि बार-बार सहभागिता और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर बल देता है। 'शोषित, वंचित और उपेक्षित/ की हो भागीदारी' में लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर समान अवसर की माँग व्यक्त होती है। यह माँग किसी वैचारिक उग्रता के साथ नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार-बोध के साथ सामने आती है। इस प्रकार योगेन्द्र मौर्य का दलित विमर्श संघर्ष और संवाद दोनों को साथ लेकर चलता है।

संग्रह में कई स्थानों पर दलित चेतना मानवीय करुणा से जुड़कर व्यापक सामाजिक चेतना का रूप ले लेती है। कवि जाति-विभाजन को केवल दलित समुदाय की समस्या नहीं मानता, बल्कि पूरे समाज के नैतिक संकट के रूप में देखता है। इसलिए उसके गीतों में दलित अनुभव अंततः मानवीय संवेदना के विस्तार में बदल जाता है। यही कारण है कि दलित विमर्श इन नवगीतों में अलग से आरोपित विषय नहीं लगता, बल्कि समूची सामाजिक संरचना को समझने की दृष्टि बन जाता है। यदि समकालीन हिंदी नवगीत में दलित चेतना की उपस्थिति का मूल्यांकन किया जाए, तो योगेन्द्र मौर्य का यह संग्रह उस दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में दिखाई देता है। यहाँ दलित जीवन के यथार्थ को गीतात्मकता के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जिससे संवेदना और विचार दोनों का संतुलन बना रहता है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि संग्रह के नवगीत दलित विमर्श को केवल साहित्यिक विषय नहीं रहने देते, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा से जोड़ते हैं। यही इस संग्रह की वैचारिक शक्ति है और यही उसे समकालीन नवगीत परंपरा में विशिष्ट बनाती है। 'हम बहुजन हैं हमीं/ प्रताड़ित होते आए हैं' जैसी पंक्तियाँ इतिहास की लम्बी दासता का स्मरण कराती हैं। इस संदर्भ में नामवर सिंह का यह विचार प्रासंगिक प्रतीत होता है कि "साहित्य में यथार्थ का प्रवेश केवल चित्रण नहीं, दृष्टि का परिवर्तन भी है।" योगेन्द्र मौर्य की दृष्टि दलित अनुभव को बाहरी सहानुभूति से नहीं, भीतर की आत्मस्वीकृति से देखती है। 'शोषित, वंचित और उपेक्षित/ की हो भागीदारी' में संसद-भवन का उल्लेख सत्ता-संरचना में प्रतिनिधित्व के प्रश्न को रेखांकित करता है। यह दलित विमर्श संविधानिक समानता की आकांक्षा से जुड़ा हुआ है।

स्त्री-विमर्श भी संग्रह की एक महत्वपूर्ण धारा है। यद्यपि स्त्री-विषयक गीतों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, पर उनकी संवेदना तीखी और मार्मिक है। 'बचपन बीत रहा है' में बालिका-श्रम की त्रासदी का चित्रण करते हुए कवि लिखता है 'इतनी कच्ची वय में कितने/ काम कराती है' यहाँ स्त्री देह और श्रम का दोहरा शोषण निहित है। स्त्री की अस्मिता का प्रश्न यहाँ किसी वैचारिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की विडंबना के रूप में उपस्थित होता है। नवगीतकारों के संबंध में महेश्वर तिवारी ने कहा है कि "नवगीत का रचनाकार अपने समय की सामाजिक धड़कनों को सुनता है।" योगेन्द्र की स्त्री-दृष्टि इसी सामाजिक धड़कन से उपजी है। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर कवि की दृष्टि अत्यंत तीखी है। 'राजनीति ने सिक्का/ अजब उछाला है' और 'कई कलाओं में/ माहिर ये बंदा है' जैसी पंक्तियाँ राजनीतिक छल और जन-भावनाओं के दुरुपयोग का व्यंग्यात्मक उद्घाटन करती हैं। 'जादूगर भी/ देख इसे शर्मिंदा है' कहकर कवि राजनीति को तमाशे और जादू-टोने की संज्ञा देता है। यह व्यंग्यात्मकता नवगीत की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जिसमें लय और कटाक्ष का सुंदर संयोजन मिलता है। 'जनता का कारिंदा है' में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की विडंबना उभरती है कि सत्ता जनता के नाम पर जनता से ही दूर होती जाती है।

आर्थिक विषमता का चित्रण भी संग्रह का एक सशक्त पक्ष है। श्रमजीवी वर्ग की अस्मिता को 'हमने काटे हैं पहाड़ तो/ तोड़ी है चट्टान' में गौरवपूर्ण स्वर मिलता है। यहाँ श्रम केवल करुणा का विषय नहीं, बल्कि पहचान का आधार है। 'गर्म हवाओं से लड़ना ही/ है अपनी पहचान' में श्रम और संघर्ष की चेतना एक साथ अभिव्यक्त होती है। यह स्वर नवगीत की उस परंपरा से जुड़ता है, जिसे कुमार रवीन्द्र ने 'जनजीवन की लय से जुड़ा गीत' कहा था। संग्रह का एक महत्वपूर्ण आयाम सांप्रदायिकता और हिंसा के विरुद्ध मानवीय स्वर है। 'तुम नफ़रत के लिए भला क्यों/ जीते-मरते हो' में कवि सीधे संवाद की मुद्रा में है। 'जाति-वर्ग-मज़हब की खाई/ चौड़ी करते हो' कहकर वह विभाजनकारी राजनीति की आलोचना करता है। यह स्वर भारतीय गंगा-जमुनी तहज़ीब की स्मृति को पुनर्स्थापित करता है। 'क्या हुआ/ क्यों आज धरती/ ख़ून से फिर लाल है' जैसे प्रश्न वैश्विक युद्ध-स्थितियों की ओर संकेत करते हैं। पर्यावरणीय चेतना भी इस संग्रह में समकालीन संकट की तरह उपस्थित है। 'आज हवा में हमने/ जहर मिलाया है' में औद्योगिक प्रदूषण और उपभोक्तावादी उत्सवधर्मिता पर तीखा प्रहार है। तंत्र की निरंकुशता की आलोचना के साथ ही 'निर्मम बुलडोजर' और 'यह माँग हमारी है' जैसे गीत विकास की आड़ में प्रकृति के विनाश की आलोचना भी करते हैं। यहाँ पर्यावरण प्रश्न को केवल प्रकृति-सौंदर्य तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे मनुष्य के अस्तित्व से जोड़ा गया है।

शिल्प की दृष्टि से योगेन्द्र मौर्य के नवगीत संक्षिप्त, लयात्मक और संप्रेषणीय हैं। अधिकांश गीत दो या तीन चरणों में पूर्ण हो जाते हैं। छंद का अनुशासन है, पर वह जड़ नहीं। भाषा सहज, बोलचाल के निकट और लोक-संवेदना से संपृक्त है। प्रतीक और बिंब सीधे जीवन से उठाए गए हैं, जैसे ‘कंकाल’, ‘पिंजरा’, ‘फंदा’, ‘धुंधलका’, ‘रेत’ आदि। ये बिंब जटिल बौद्धिकता के नहीं, बल्कि जीवनानुभव के प्रतीक हैं। यही कारण है कि गीत पाठक के भीतर तत्काल प्रभाव उत्पन्न करते हैं। नवगीत के आलोचक रामदरश मिश्र ने कहा था कि "नवगीत की शक्ति उसकी संप्रेषणीयता में है।" योगेन्द्र के गीत इस कसौटी पर भी सफल हैं। वे जटिल वैचारिक शब्दावली से बचते हैं और सीधे पाठक से संवाद करते हैं। यह संवादात्मकता उनके गीतों को मंच और पाठ दोनों के लिए उपयुक्त बनाती है। संग्रह के नवगीतों में केवल नकारात्मकता ही नहीं व्याप्त है अथवा संघर्ष एवं विसंगति ही नहीं है बल्कि सकारात्मकता का स्वर भी संग्रह में निरंतर बना हुआ है। 'खेत, मेड़, खलिहान, फसल के/ साथ रहे उल्लास' और 'उम्मीदों के गीत लिखें हम/ हर मौसम में' जैसी पंक्तियाँ निराशा के बीच आशा का आलोक जगाती हैं। यह आशावाद यथार्थ से पलायन नहीं, बल्कि संघर्षशील जीवन-दृष्टि का परिणाम है।

समग्रतः ‘जहाँ नहीं उजियार’ समकालीन नवगीत की उस सशक्त परंपरा का प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें गीत की लय, सामाजिक सरोकार और वैचारिक प्रतिबद्धता का संतुलित रूप मिलता है। दलित चेतना इसकी धुरी है, पर उसके साथ स्त्री, श्रम, राजनीति, पर्यावरण और मानवीय सह-अस्तित्व के प्रश्न भी समान रूप से जुड़े हैं। यह संग्रह नवगीत को केवल भावाभिव्यक्ति की विधा न मानकर सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम सिद्ध करता है। योगेन्द्र मौर्य का यह काव्य-प्रयास नवगीत की वर्तमान धारा में एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक योगदान है। यह बात स्पष्ट है कि 'जहाँ नहीं उजियार' केवल एक नवगीत-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय के सामाजिक अंतर्विरोधों का गीतात्मक दस्तावेज है। योगेन्द्र मौर्य के नवगीत दलित चेतना को केंद्र में रखते हुए उस व्यापक मानवीय संघर्ष को स्वर देते हैं, जो समानता, गरिमा और न्याय की खोज से जुड़ा है। इन गीतों में पीड़ा का स्वर है, पर उससे अधिक परिवर्तन की आकांक्षा है; अंधकार का चित्रण है, पर उससे भी अधिक उजियार की संभावना पर विश्वास है। यही विश्वास इस संग्रह को निराशा का आख्यान बनने से बचाता है और उसे प्रतिरोध की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति में रूपांतरित करता है। गीत की लयात्मकता और सामाजिक यथार्थ का यह संयोजन नवगीत की उस मूल आत्मा को पुनर्स्मरण कराता है, जिसमें कविता जीवन के संघर्षों के साथ खड़ी दिखाई देती है। इस दृष्टि से 'जहाँ नहीं उजियार' समकालीन नवगीत को नई वैचारिक ऊर्जा प्रदान करने वाला संग्रह सिद्ध होता है, जो पाठक को केवल संवेदनशील नहीं बनाता, बल्कि उसे अपने समय के अंधकार को पहचानने और उसे बदलने की नैतिक प्रेरणा भी देता है।

 


समीक्ष्य पुस्तक- जहाँ नहीं उजियार
विधा- नवगीत
रचनाकार- योगेन्द्र प्रताप मौर्य
प्रकाशक- कलमकार पब्लिशर्स, द्वारका (दिल्ली)
संस्करण- प्रथम, 2025
पृष्ठ- 127
मूल्य- ₹350

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

अवनीश त्रिपाठी

ईमेल : tripahiawanish9@gmail.com

निवास : सुलतानपुर (उत्तरप्रदेश)

जन्मतिथि- 27 दिसंबर, 1982
शिक्षा- एम०ए०, बी० एड
सम्प्रति- श्री बजरंग विद्यापीठ इंटर कॉलेज, देवलपुर सहिनवां, सुलतानपुर में टीजीटी के रूप में कार्यरत।
प्रकाशित कृतियाँ- 'दिन कटे हैं धूप चुनते' (नवगीत संग्रह) एवं 'सिसक रहा उपसर्ग' (दोहे संग्रह)
संपादन- नई पीढ़ी के गीत, नवगीत : नई चेतनाएँ
संपादित संकलन- कवितालोक, गीतिकालोक, गुलदस्ता-ए-ग़ज़ल, नेह के महावर, उत्तरायण, नई सदी के नवगीत, समकालीन गीत कोश, अक्षर बाजरे, गुनगुनाएँ गीत फिर से- 2 और 3, दोहे के सौ रंग, समकालीन दोहे, दोहे में नारी, हम असहमत हैं समय से, ग़ज़ल पंचशतक, हिन्दी ग़ज़ल के साक्षी, समकालीन दोहा शतक, नवगीत : नए संदर्भ, नई दृष्टि सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ संकलित एवं प्रकाशित।
सम्मान-
कवितालोक सृजन संस्थान (हिसार, हरियाणा) द्वारा काव्य श्री सम्मान- 2015
साहित्य प्रोत्साहन संस्थान (मनकापुर, गोंडा) द्वारा नवगीत श्री सम्मान- 2016
सृजनांजलि प्रकाशन द्वारा रचना सम्मान- 2016
साहित्य सेवा संस्थान (फिल्लीपुर, फैजाबाद) द्वारा काव्यश्री सम्मान- 2017
अखिल भारतीय गीतकार मंच (लखनऊ) द्वारा महेश अनघ स्मृति सम्मान- 2018
हिन्दी भाषा साहित्य परिषद (खगड़िया, बिहार) द्वारा हरिवंश राय बच्चन स्मृति रत्न सम्मान- 2019
शिवोहम साहित्यिक मंच (कानपुर, उत्तरप्रदेश) द्वारा शिक्षक साहित्यकार अलंकरण- 2019
नालंदा जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन (नालंदा, बिहार) द्वारा माँ मालती देवी स्मृति सम्मान- 2020
डॉ० शांति कुमारी गीत सम्मान सहित विभिन्न संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित।
स्थायी पता- ग्राम व पोस्ट- गरएँ, जनपद- सुलतानपुर (उत्तरप्रदेश)- 227304
मोबाइल- 7309311233