Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
शब्दों का ही नहीं, सघन व सशक्त अनुभूतियों का आईना- कुलदीप सिंह भाटी

कवि की कविताओं में देश-प्रेम है, तो प्रकृति के प्रति प्रेम भी। कवि कहता है कि जिस प्रकार एक बीज में एक पेड़ समाहित होता है, उसी प्रकार एक-एक नागरिक में उसका देश। यदि बीज, पेड़ से विद्रोह नहीं करता तो फिर देश के लोग अपने ही देश से क्यों दग़ाबाज़ी करते हैं? यहाँ 'दग़ाबाज़ी' भष्टाचार, नौकरशाही, कर्तव्यों की अवहेलना, पुरातात्विक धरोहरों के प्रति हमारी उदासीनता, प्रदूषण आदि चिन्ताओं तक व्यापित है।

मनभावन बाल कहानियाँ- कौशल पाण्डेय

डॉ० जयप्रकाश प्रजापति 'अंकुश कानपुरी' की ग्यारह बाल कहानियों के इस पांचवें संग्रह 'अंकुश कानपुरी की बाल कहानियाँ' में दो तरह की बाल कहानियाँ हैं।

अंधकार के विरुद्ध गीतात्मक प्रतिरोध : जहाँ नहीं उजियार का सामाजिक यथार्थ- अवनीश त्रिपाठी

'जहाँ नहीं उजियार' केवल एक नवगीत-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय के सामाजिक अंतर्विरोधों का गीतात्मक दस्तावेज है। योगेन्द्र मौर्य के नवगीत दलित चेतना को केंद्र में रखते हुए उस व्यापक मानवीय संघर्ष को स्वर देते हैं, जो समानता, गरिमा और न्याय की खोज से जुड़ा है। इन गीतों में पीड़ा का स्वर है, पर उससे अधिक परिवर्तन की आकांक्षा है; अंधकार का चित्रण है, पर उससे भी अधिक उजियार की संभावना पर विश्वास है।

फ़िक्र की गहराई, जज़्बात की मुख़्तलिफ़ पहलुओं से तरजुमानी और बयान की लज़्ज़त- मो० इशरत सग़ीर

गोविंद गुलशन जी का तअल्लुक़ उस्ताद शाइर कृष्ण बिहारी 'नूर' के शे'री घराने से बराहे-रास्त था। ऐसे में उनके यहाँ ग़ज़ल का हुस्न रवायत के तमाम तक़ाज़ों पर पूरा उतरता है। गोविंद गुलशन जी ख़ुद उस्तादी के ओहदे पर फाइज़ हो चुके थे। यही सबब है कि उनके शागिर्दो ने उनकी ग़ज़लों को यकजा कर 'कल न कल तो तेरे' उन्वान के तहत इरा पब्लिकेशन, कानपुर से शाया किया है।