Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
वो जो शायरी को इबादत समझते थे- तरुणा मिश्रा

वो शख़्स जिसने शायरी को फ़न नहीं, इबादत की तरह जिया, जिसकी हर दाद से हौसले को परवाज़ मिलती थी, जो उस्ताद कम, रहबर और साया ज़्यादा थे, जिनकी महफ़िलों में लफ़्ज़ भी महकते थे और दिल भी, गोविंद गुलशन सिर्फ़ नाम नहीं, हमारी अदबी रूह का हिस्सा हैं।

आत्मीयता के समंदर गोविंद गुलशन जी- कृष्ण कुमार नाज़

धुएँ  में  हैं  उजाले  की   लकीरें
दिया शायद अचानक बुझ गया है
मगर उसकी रोशनी अब भी हमारी यादों में जल रही है।

गोविन्द गुलशन : जिनकी ज़िन्दगी ग़ज़ल थी- असलम राशिद

गुलशन सर बताते थे कि आपने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल शादी के तक़रीबन एक साल बाद 1987 में लखनऊ के सफ़र के दौरान कही थी, और फिर वहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अपने उरूज पर पहुँचकर भी नहीं रुका।

रेत समाधि और गीतांजलि श्री- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

"रेत समाधि अपने कथ्य और शिल्प में नवीन उपन्यास है| रेत समाधि में ऐसी स्त्री है जो हर स्त्री के अंदर छिपी हुई है| वह अपने आप में साधारण है परंतु अपनी प्रस्तुति में असाधारण है| उपन्यास में ऐसा संसार है जो परिचित है और अपने जादुई अंदाज में हमारे सामने आता है| रेत समाधि मौत के दरवाजे पर जिजीविषा की कथा को कहता है| रेत समाधि अपने औपन्यासिक शैली के लिए विशेष प्रसिद्ध रहा है|"