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समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वृद्धों की बात और हालात- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

समकालीन हिंदी ग़ज़ल में वृद्धों की बात और हालात- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

ज़ाहिर है, जो समय आराम, सम्मान और लिहाज का है, ऐसे ही समय में हमारी पीढ़ी ज़ईफों को तनहा छोड़ देती है। फिर एक ऐसा समय आता है कि वह भरा-पूरा घर रहने के बावजूद वृद्धाश्रम की तरफ चल पड़ते हैं।

आमतौर पर हम वृद्ध उन्हें कहते हैं, जिनकी उम्र साठ साल से अधिक हो गई है। यह वो समय है, जब हमें अपनी नौकरी से अवकाश दे दिया जाता है और बीमारियाँ हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसे समय में हमें सबसे अधिक ज़रूरत अपने परिवार की होती है, लेकिन आधुनिकता और एकल परिवार के दौर में बुज़ुर्ग को हाशिये पर छोड़ दिया जाता है। न उनका ख़याल रखा जाता है, न उनसे बातें की जाती हैं, और न उनकी तकलीफों को समझा जाता है। घर के लिए बड़े बुज़ुर्ग, जो इज़्ज़त और एहतराम के लायक़ होते हैं, उन्हें वह सम्मान भी नहीं मिल पाता।

हमारे धर्म ग्रंथों में घर के वृद्धों का बड़ा महत्व है। जहाँ कहा गया है कि जो अपने माता-पिता, वृद्धों और गुरुजनों की नित्य सेवा करते हैं, उन्हें- 'आयु विद्या यशोबलम' अर्थात आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती है। रामायण में राजा दशरथ एक ऐसी स्त्री की प्रशंसा करते हैं, जो अपनी संतान से ज़्यादा अपने बूढ़े माँ-बाप का ख़याल रखती है।

पर अफ़सोस यह है कि हमारे पुराने विचार आज की नई पीढ़ी से मेल नहीं खाते। ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता' अवकाश प्राप्त पिता की ऐसी ही दुर्दशा की तरफ़ इशारा करती है। आज रोज़ नए वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। संतानों को अर्थहीन पिता के प्रति वह लगाव नहीं है। डॉ० रागिनी दूबे मानती हैं कि धर्म और भारतीय साहित्य को पढ़ाकर ही यह मानसिकता बदली जा सकती है।

असल में पिता जिस जतन से पुत्र को खड़ा करता है। पुत्र उस तरह से पिता की ख़िदमत नहीं कर पाता। उसे घर के बड़े-बुज़ुर्ग बोझ से लगने लगते हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह की एक कहानी 'शून्य की ओर' में जब ग़रीबी के कारण पिता को क़र्ज़ लेना पड़ता है तो उसका बेटा घर की ज़िम्मेदारी से भाग कर अलग हो जाता है।

सिर्फ़ उपन्यास, कविता और कहानी ही नहीं, समकालीन हिंदी ग़ज़ल में भी ऐसे शेर भरे पड़े हैं, जहाँ बुज़ुर्गों की प्रति हमारी ग़ैर ज़िम्मेवाराना हरकत की चिंता दिखलाई गई है। जो ग़ज़ल कभी अपने इश्क़ के ख़ुमार में पड़ी हुई थी, यह काम महत्वपूर्ण नहीं है कि उनमें बड़े-बूढ़ों की सामाजिक स्थिति का वर्णन भी हो रहा है-

ये बूढ़ा दर्द है जो साथ मेरे
जहाँ भी बैठता है, खाँसता है

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उम्र के मोड़ पर साठ के बाद में
सबको अपनी थकन का पता चल गया

- जहीर कुरेशी


मैं जानता हूँ मुझे अब दवा ज़रूरी है
किराया घर का भी देना बड़ा जरूरी है

- हरेराम समीप

ज़ाहिर है, जो समय आराम, सम्मान और लिहाज का है, ऐसे ही समय में हमारी पीढ़ी ज़ईफों को तनहा छोड़ देती है। फिर एक ऐसा समय आता है कि वह भरा-पूरा घर रहने के बावजूद वृद्धाश्रम की तरफ चल पड़ते हैं। ऐसे में हमें उषा प्रियंबदा की 'वापसी' कहानी याद आती है। गजाधर बाबू रिटायरमेंट के बाद इसलिए ख़ुश हैं कि उन्हें अपने परिवार के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिलेगा, लेकिन घर लौटने के बाद अपने ही परिवार से उन्हें जो अपेक्षा मिलती है, वह दोबारा उन्हें नौकरी पर जाने को विवश करती है।

यह कहानी हर घर की है, जहाँ परिवार में वृद्धों के प्रति आत्मीयता नहीं है, जिस कारण घर के उम्रदराज़ लोग घुटन, संत्रास और अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं।देखें ग़ज़ल के कुछ शेर-

नाती-पोते वाले होकर अभी गाँव में तनहा हैं
वो परिवार कहाँ है जिस पर मरते आये बाबूजी

- ओमप्रकाश यती

दवा लेने को बोलेंगे यही सब सोचकर बेटा
पिता को बिन बताए चुपके दफ़्तर भाग जाता है

- विकास

जो एक सूखी नदी इस क़दर अकेली थी
कि उससे रिश्ता हर इक आदमी ने तोड़ दिया

- ज्ञानप्रकाश विवेक

लगने लगा है बिस्तर बाहर दलान में
बूढ़े के लिए अब नहीं कमरा मकान में

- वसंत

उम्र कट जाएगी क्या वक़्त को रोते-रोते
मौत आ जाएगी बस बोझ को ढोते-ढोते

- रामप्रकाश गोयल

ऐसा नहीं है कि समकालीन हिंदी ग़ज़ल सिर्फ़ वृद्धों की दुर्दशा का जायज़ा लेती है, जहाँ उन्हें सम्मान मिला है यह जहां उनके प्रति प्रेम और निष्ठा दिखाई गई है, उसका ज़िक्र भी हिंदी ग़ज़ल में ख़ूब हुआ है, कुछ शेर देखें-

बुज़ुर्गों की थोड़ी ख़ुशी के लिए
वजह-बेवजह मुस्कुराते रहो

- अनिरुद्ध सिन्हा

बड़े-बुज़ुर्ग मुसीबत में यूँ लगे मुझको
उफनती नदियों में कोई चटान ज़िंदा है

- हरेराम समीप

मुझको थमने नहीं देता है ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते

- मेराज फैज़ाबादी

ख़ुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है
पाँव दाबे हैं बुज़ुर्गों के तो फ़न आया है

- मुनव्वर राना

मुझे शक है वहाँ कोई बड़ा-बूढ़ा नहीं रहता
कि ख़ाली हाथ उस घर से ब्राह्मण लौट आया है

- अशोक मिज़ाज

तना रहा था जो आँगन के सिर पे छत जैसा
हम उस दरख़्त का साया घना नहीं भूले

- जहीर कुरेशी

डूबते उम्मीद को फिर रोशनाई दे रहा है
वो पिता के हाथ में पहली कमाई दे रहा है

- अशोक अंजुम

वो अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई दे रहा है
शजर बूढा है लेकिन पाई-पाई दे रहा है

- राहुल शिवाय

आज हिंदी में ग़ज़ल उस हर मुद्दे पर लिखी जा रही है, जिसका वास्ता आमजन से है। इन हिंदी की ग़ज़लों में प्राचीनता भी है और आधुनिकता भी। असल में आधुनिकता की कल्पना ही बेमानी है। किसी भी भाषा का दूसरा कवि अपने पहले कवि से आधुनिक होता है। ग़ज़ल में ही देखें तो ख़ुसरो से कबीर अधिक आधुनिक थे। कबीर से भारतेंदु अधिक आधुनिक हैं। भारतेंदु से दुष्यंत भी आधुनिक हुए और दुष्यंत से अभिषेक कुमार सिंह की ग़ज़लों में भी यही आधुनिकता झलकती है।

समय के साथ साहित्य की ज़रूरत बदल जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जिसे प्रवृत्ति कहते हैं। हमारी चुनौतियाँ और समस्याएँ हर समय एक-सी नहीं होती। दुष्यंत के समय की चुनौती इमरजेंसी थी, लेकिन अभी के शायरों की चुनौतियाँ राजनीति में धर्म, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय, अलगाव, क्षेत्रीयता और संवादहीनता का बोलबाला है। हिंदी ग़ज़ल की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह सिर्फ समस्या खड़ी कर डराती नहीं है, बल्कि उसे मुक़ाबला करने की भी सीख देती है। दुष्यंत के कई शेर इसके उदाहरण में पेश किये जा सकते हैं। दुष्यंत जब कहते हैं-

एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल की भीगी हुई बाती तो है

तो दुष्यंत इस फैले हुए अंधकार के ख़िलाफ़ समाधान भी बता रहे होते हैं। फिर इसी का अगला मिसरा- नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है, कहकर वह हर कमज़ोर वृद्ध, निसहाय और निर्बल के हौसले में इजाफ़ा करते हैं। ठीक इसी तरह अदम गोंडवी हमें हिदायत देते हैं कि हमारा पाँव ज़मीन पर रहना ज़रूरी है-

अदीबो ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक के चाँद-तारों में

- अदम गोंडवी

वृद्ध विमर्श पर बात करते हुए वे रचनाएँ भी गुम नहीं हुई हैं, जिसमें एक औलाद अपने फ़र्ज़ को नहीं भूल रहा है। उदय प्रकाश की कहानी 'थर्ड डिग्री' में बेटा सुरेश अपनी माँ को पूरा सम्मान देता है। माँ को साथ रहने के नाम पर अनेक बार पत्नी से झगड़ता भी है। पत्नी और माँ के बीच कलह होने पर वह हर बार माँ का ही पक्ष लेता है।

शारीरिक रूप से शिथिल और अशक्त बुज़ुर्गों के पास उनके जीवन के अनुभवों की विशाल संपदा है, जो हमें ख़तरों से बचा लेती है। हिंदी ग़ज़ल के कई शेरों से बुज़ुर्गों के इस अनुभव का पता चलता है-

तुम्हारी महफ़िलों में हम बड़े-बूढ़े ज़रूरी हैं
अगर हम ही नहीं होंगे तो पगड़ी कौन बांधेगा

- मुनव्वर राना

पुराने लोग नया हौसला तो क्या देंगे
मगर बुज़ुर्गों से मिलते रहो दुआ देंगे

- अख्तर नज़्मी

असर बुजुर्गों की नेमतों का
हमारे अंदर से झाँकता है
पुराने नदियों का मीठा पानी
नए समंदर से झाँकता है

- वेद गुप्ता

कुछ बुज़ुर्गों की विरासत से मिले
कुछ हुनर लोगों की सोहबत से मिले

- अनुज नगेन्द्र

एक वृद्ध की सबसे बड़ी ख़ासियत अपनी संतान से नाराज़ ना होना है। अगर तकलीफ़ होती है तो वह बस यही सोच कर रह जाता है कि-

अपने घर में ही ऐसा लगता है
हम भी मेहमान हो गये हैं अब

- डॉ० उर्मिलेश

कोई न आया इसको हटाने के वास्ते
हम खंडहरों के जिस्म पे जाले बने रहे

- अरुण साहेबाबादी

बुढ़ापे में हमें यों क़ैद कर रक्खा है बच्चों ने
हमारे घर की चौखट से हमारी चारपाई तक

- अनिरुद्ध सिन्हा

असल में पिछले चालिस-पचास सालों में बूढ़ों की स्थिति अधिक भयावह हुई है। पहले वृद्ध जीवन की त्रासदी नहीं होती थी। घर में बड़े-बुज़ुर्गों को ज़्यादा सम्मान दिया जाता था तब हमें अपनी संस्कृति, अपने पुश्तैनी घर और पुरानी चीज़ों से बहुत लगाव होता था। फिर आधुनिकतावाद और बाज़ारवाद ने हमसे वह संस्कार छीन लिए जिसका दर्द सबसे पहले हिंदी कहानियों में देखने को मिला। भीष्म साहनी की 'चीफ़ की दावत' में वृद्ध माँ के रखने की जगह एक समस्या बनी हुई है। राजेंद्र यादव की कहानी 'बिरादरी बाहर' एक ऐसे पिता पारस बाबू की कहानी है, जिसे परिवार से निष्कासित कर दिया गया है। चंदकिशोर जायसवाल की कहानी 'मनबोध बाबू' एक ऐसे बुज़ुर्ग की कथा है, जिसमें जायदाद न मिलने पर बेटे-बहु ने बाप को घर से अलग कर दिया है। ठीक इसी तरह हिंदी उपन्यासों में भी ज़ईफों की दर्दनाक स्थिति दिखलाई पड़ती है। यह चित्र कविता में भी है, लेकिन आज की कविता अपने तुक, कथ्य और छंदहीनता के कारण पाठकों को प्रभावित नहीं कर पा रही है। इसलिए ग़ज़ल, जो हिंदी कविता की इकलौती एक प्रभावी विधा है, उसमें हर वह शख्स अपनी जगह पाता है, जो भेदभाव और ग़ैर बराबरी का शिकार है। चाहे वह समाज में पल रहा वृद्ध ही क्यों न हो। कुछ और शेर देखें-

बैठना पास बुजुर्गों के कभी थोड़ी देर
यानी मुरझाए हुए पौधों को पानी देना

- के० पी० अनमोल

बुज़ुर्गों को नई नस्लों से मिलती है कहाँ इज़्ज़त
तो कहिए फ़ायदा क्या है भला ऐसी पढ़ाई का

- देवमणि पाण्डेय

अब ज़्यादातर रिश्ते बनते हैं ऐसे
अब रिश्तों को ज़रूरत ज़िंदा रखती है

- अभिषेक कुमार सिंह

नज़र जिनको मिली हमसे वही आँखें दिखाते हैं
किसे कैसे कहाँ रक्खें हमें बच्चे बताते हैं

- डॉ० अविनाश भारती

मुझे इतना सताया है मेरे अपने अज़ीज़ों ने
कि अब जंगल भला लगता है घर अच्छा नहीं लगता

- मुनव्वर राना

मरज मुझमें कई घर कर गये हैं
मैं कैसा था, मैं कैसा हो गया हूँ

- प्रेमकिरण

ये जंगल कट गये तो किसके साये में गुज़र होगी
हमेशा इन बुजुर्गों को हमारे साथ रहने दो

- ओमप्रकाश यती

पुरानी पीढ़ियों की आँख में भी है सुकूं दिखता
चलाकर साइकिल जो बेटियाँ पढ़ने को जाती हैं

- डॉ० भावना

उम्रों का वो लिहाज कि बरगद की राह में
आते ना थे बबूल अभी कल की बात है

- हस्तीमल हस्ती

छोड़कर बूढ़े शजर को घर अधूरे रह गये
पर्वतों से जब कटे पत्थर, अधूरे रह गये

- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी ग़ज़ल समाज की हर दशा से वाक़िफ़ है। समाज का हर ठुकराया हुआ तबक़ा यहाँ अपनी जगह पाता है। फिर उसे लगने लगता है कि वो ग़ज़ल ही है जहाँ उसकी अपनी बात कही जा रही है, जहाँ सामाजिक समस्याओं का विवेचन हो रहा है। कमज़ोर और लाचार लोगों की बातें हो रही हैं। हमारी मनोदशा को चित्रित करने का प्रयास हो रहा है। यह ग़ज़ल हर उस आदमी के साथ है, जो उदास, उपेक्षित और साधन विहीन है। यही कारण है कि कविता से प्रेम रखने वाला हर पाठक कविता, गीत, दोहे को झाँकता हुआ ग़ज़ल की आगोश में मुतमईन होकर बैठ जाता है।

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रचनाकार परिचय

ज़ियाउर रहमान जाफ़री

ईमेल :

निवास : नवादा (बिहार )

नाम- डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफरी
जन्मतिथि-10 जनवरी 1978
जन्मस्थान- भवानन्दपुर,बेगूसराय, बिहार
शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी, अंग्रेजी, शिक्षा शास्त्र)बीएड,पत्रकारिता, पीएचडी हिन्दी, यू जी सी नेट (हिन्दी )
संप्रति- सरकारी सेवा

प्रकाशित कृतियाँ-
1. खुले दरीचे की खुशबू- हिंदी गजल
2. खुशबू छू कर आई है- हिंदी गजल
3.परवीन शाकिर की शायरी- हिंदी आलोचना
4.ग़ज़ल लेखन परंपरा और हिंदी ग़ज़ल का विकास-हिन्दी आलोचना
5. हिंदी गजल :स्वभाव और समीक्षा - हिंदी आलोचना
6. चांद हमारी मुट्ठी में है- हिंदी बाल कविता
7. आखिर चांद चमकता क्यों है- हिंदी बाल कविता
8. मैं आपी से नहीं बोलती -उर्दू बाल कविता
9. चलें चांद पर पिकनिक करने- उर्दू बाल कविता
10. लड़की तब हंसती है- संपादन

पुरस्कार एव सम्मान-
आपदा प्रबंधन पुरस्कार,बिहार शताब्दी सम्मान,यशपाल सम्मान तथा शाद अजीबाबादी साहित्य एवं समाज सेवा सम्मान समेत पचास से अधिक सम्मान एवं पुरस्कार

संपादन एवं पत्रकारिता-
संवादिया( बाल पत्रिका)जागृति, निगाह, चल पढ़ कुछ बन, साहित्य प्रभा आदि में सहयोगी संपादक एवं दैनिक हिंदुस्तान समेत कई पत्र -पत्रिकाओं में पत्रकारिता। 

विशेष-
. आकाशवाणी पटना दरभंगा भागलपुर, डीडी बिहार,ई टीवी बिहार आदि से नियमित प्रसारण
. बाल कविता नासिक के पाठ्यक्रम में शामिल
. पीएचडी उपाधि हेतु कई शोधार्थियों द्वारा ग़ज़ल साहित्य पर शोध
. देश भर के कई सेमिनारों और मुशायरों में शिरकत

पता-
C/O-एस. एम इफ़्तेख़ार काबरी
(पेशकार )
शरीफ कॉलोनी,बड़ी दरगाह, नियर बीएसएनएल टॉवर,पार नवादा
ज़िला -नवादा(बिहार) 805112
मोबाइल-6205254255
मोबाइल -9934847941