Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
देवेन्द्र पाठक 'महरूम' के गीत

बिरला कोई किसी का बेटा
पढ़-लिख गर क़ाबिल बनता है,
सफल हुआ लेकिन नियुक्ति के
इन्तज़ार में दिन गिनता है,

सत्यशील राम त्रिपाठी के गीत

बड़े सवेरे घर बुहार चमकाती कोना-कोना,
लीप-पोतकर कर देती हैं घर का रूप सलोना।
मेंहदी रची हथेली से जब रचती हैं रंगोली,
लगता होली खेल गईं हैं शुभ किरणों की टोली।

गरिमा सक्सेना के गीत

बड़े दिनों में भीगे 
और नहाये पेड़
मंद-मंद मुस्काये पेड़
 
इक अरसे से 
धूल भरे थे चित्र सभी
दिखे नहीं थे 
बहुत दिनों से मित्र सभी

डॉ० राम वल्लभ आचार्य के गीत

शीतल पड़ी फुहार
धरा से गंध उठी सौंधी।

धरती का रस चूस चूस कर,
मेघ हुए भारी;
आखिर कितना ढोते,
झरने की थी लाचारी;
जल से भरी गगरिया अपनी,
रख दी फिर औंधी।