Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
गरिमा सक्सेना के गीत

बड़े दिनों में भीगे 
और नहाये पेड़
मंद-मंद मुस्काये पेड़
 
इक अरसे से 
धूल भरे थे चित्र सभी
दिखे नहीं थे 
बहुत दिनों से मित्र सभी

डॉ० राम वल्लभ आचार्य के गीत

शीतल पड़ी फुहार
धरा से गंध उठी सौंधी।

धरती का रस चूस चूस कर,
मेघ हुए भारी;
आखिर कितना ढोते,
झरने की थी लाचारी;
जल से भरी गगरिया अपनी,
रख दी फिर औंधी।

आलोकेश्वर चाबडाल के गीत

हो गई जब भूल हो, दूर दिखता कूल हो
तिल सरीखी बात को जब, दे रहा जग तूल हो
त्यागकर ऋजुता, निगाहें तीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के गीत

अब शृँगालों में गधे कुछ शेर सा साहस भरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?