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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

आलोकेश्वर चाबडाल के गीत

आलोकेश्वर चाबडाल के गीत

हो गई जब भूल हो, दूर दिखता कूल हो
तिल सरीखी बात को जब, दे रहा जग तूल हो
त्यागकर ऋजुता, निगाहें तीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

एक गिलहरी हम

राघव के कोमल चरणों की, चुभन करें कुछ कम
एक गिलहरी तुम बन जाओ , एक गिलहरी हम

भरत-भूमि के जन-गण-मन में
रघुनन्दन बसते हैं
देख अमंगल गल जाते हैं
मंगल में हँसते हैं
घायल भारत का तन-मन है
घाटों पर चढ़ आएँ
कर्मठता के केवट को हम
दें आवाज जगाएँ

पीर नदी के पार लगाएँ, आज दिखाएँ दम
एक गिलहरी तुम बन जाओ , एक गिलहरी हम

आँसू-आँसू नयन हुए हैं
सिसकी हो लीं साँसें
टुकड़े-टुकड़े हुए कलेजे
टूटी सारी आसें
तुंग हिमालय झुके हुए हैं
शब्द हुए हैं मौन
जीवन मरघट जा पहुँचा है
वापस लाये कौन

जनकसभा में लखनलाल से, आओ ठोकें खम
एक गिलहरी तुम बन जाओ, एक गिलहरी हम

हर एक पल में लहर नई है
हर पल में सिहरन है
काँप रहा है कोना-कोना
कण-कण में क्रंदन है
काली से भी काली रातें
बुझा-बुझा-सा दिन है
अश्रु-ताल पर सेतु बाँधना
सचमुच बहुत कठिन है

जनकदुलारी के हाथों में, मुँदरी धर दें हम
एक गिलहरी तुम बन जाओ, एक गिलहरी हम

राम-काज में लगे हुए हैं
वानर-भालू सारे
लगन देखकर लगन चकित है
जग के नैना हारे
अपने को नन्हा पाकर तू
क्यों पग अपने रोके
उनके अपने अवसर हैं रे
तेरे अपने मौके

सूरज चंदा जब सो जाएँ, जुगनू काटे तम
एक गिलहरी तुम बन जाओ, एक गिलहरी हम

बूँद-बूँद से घट भरता है
घट-घट से पनघट
लहर-लहर से नदिया भरती
ऋषि मुनियों से तट
मनके-मनके से माला है
पात-पात से वट
मोक्ष दिलाती है रे पगले
राम-राम की रट

यज्ञ बड़ा है समिधा देखो, पड़ ना जाएँ कम
एक गिलहरी तुम बन जाओ, एक गिलहरी हम

*********


लिखो नहीं

शब्दों को माला करने को, लिखो नहीं तुम लिखो नहीं
कवि! काग़ज़ काला करने को, लिखो नही तुम लिखो नहीं

लिखो लगे जब लिखे बिना तुम
दर्पण से डर जाओगे
लिखो लगे जब लिखे बिना तुम
आँखों से गिर जाओगे
लिखो लगे जब लिखे बिना तुम
प्रश्नों से घिर जाओगे
लिखो लगे जब लिखे बिना तुम
जीते जी मर जाओगे

भिक्षुक बन प्याला भरने को, लिखो नहीं तुम लिखो नहीं
कवि! काग़ज़ काला करने को, लिखो नही तुम लिखो नहीं

लिखो नगर की सब क़लमें जब
लिखने से घबरा जाएँ
नगर-वधू-सी घूँघट काढ़ें
दिखने से घबरा जाएँ
लिखो दवातें दावत खा जब
आपस में टकरा जाएँ
लिखो प्रजा की अनल चुआती
आँखें जब पथरा जाएँ

नस्लों को नाला करने को, लिखो नहीं तुम लिखो नहीं
कवि! काग़ज़ काला करने को, लिखो नही तुम लिखो नहीं

कठिनाई का कड़ा हिमालय
नंगे पग चढ़ने वाले
त्रस्त तंत्र से लड़ते-लड़ते
अब ख़ुद से लड़ने वाले
विज्ञापन में ऊँचाई की
नई इबारत गढ़ने वाले
लिखो तुम्हीं को देख रहे हों
सारे जब पढ़ने वाले

पंचामृत हाला करने को, लिखो नही तुम लिखो नहीं
कवि! काग़ज़ काला करने को, लिखो नही तुम लिखो नहीं

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धीर रखना रे!

जब समय प्रतिकूल हो
हर तरफ जब धूल हो
रो रहा हो मन-सुमन जब
हँस रहा जग शूल हो

मन को अपने ओ मनुज तू, वीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

जानता है यह जगत तो
घाव पर नित नून रखना
जीर्ण-जर्जर तन-बदन पर
तमतमाता जून रखना
हास पर परिहास पर तो
है नहीं विश्वास इसको
हाँ, मगर उपहास का है
आदि से अभ्यास इसको

हो गई जब भूल हो, दूर दिखता कूल हो
तिल सरीखी बात को जब, दे रहा जग तूल हो
त्यागकर ऋजुता, निगाहें तीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

कह रही हैं देहरियाँ यह
कह रहा अवनत नयन है
हर प्रलय में लय निहित है
हर गमन में आगमन है
श्वांस में अरदास रख ले
आस का अनुप्रास रख ले
चाहता है तू सुधा यदि
गरल का आकाश रख ले

जब लगे अब हार है, जिंदगानी भार है
सब दवाएँ चुक गयीं, बस मृत्यु ही उपचार है
घन का अपने रे मनुज तू, नीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

दृष्टि सबसे फेरकर तू
बस स्वयं को हेरकर तू
आज कह दे तीव्र स्वर में
इंद्रियों को घेरकर तू
तू धरा है, तू गगन है
तू ही प्राणों की पवन है
मुक्तिदाता तू स्वयं का
तू ही जल है, तू अगन है

साथ अपने छोड़ दें, प्राण भी मुख मोड़ दें
युग-युगों के वचन सारे, एक पल में तोड़ दें तो
कृष्ण रखना ख़ुद में तू रघु, वीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

यदि सरल-सा जी लिया तो
क्या जिया रे तूने जीवन
मुख न देखा युद्ध का यदि
तो तू योद्धा है रे निर्धन
ये कलाई मोड़ने दे
बाण समय को छोड़ने दे
चाहता है मूर्ति बनना
तो तू ख़ुद को तोड़ने दे

पीर का जब हो चरम, डगमगाता हो धरम
देह ठंडी कर रहा हो, पलक का आँसू गरम
आँख में अम्मा की तू, तस्वीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

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जय होती है

भले देर से होती है पर तय होती है
सच की यारो सदा जगत में जय होती है

महल त्यागकर जंगल छानें
कौशल्या के नंदन
लंकाओं को जीत कमाएँ
सारे जग का वंदन

अनाचार की छोटी-सी ही वय होती है
सच की यारो सदा जगत में जय होती है

दुर्योधन पर, दुःशासन पर
द्रुपदसुता ही भारी
लाज ढाँकने आ जाते हैं
सदा सुदर्शन धारी

बढ़े चीर की कथा कहो कब क्षय होती है
सच की यारो सदा जगत में जय होती है

जिसके पथ में शूल नहीं वह
सच भी क्या सच यारो
तलवों से बस कह दो इतना
कुछ भी हो मत हारो

हार हराती हर गाथा मधुमय होती है
सच की यारो सदा जगत में जय होती है

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रचनाकार परिचय

आलोकेश्वर चबडाल

ईमेल : alokesh.chabdal@gmail.com

निवास : नई दिल्ली

संप्रति- वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी, निगमित कार्यालय, गेल इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली
जन्मतिथि- 30 अगस्त, 1974
जन्मस्थान- गिन्ती गाँव, कोटाबाग़, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (हिंदी)
लेखन विधाएँ- गीत, मुक्तक, घनाक्षरी, दोहे, लघुकथा, हास्य-व्यंग्य, बाल कविता।
प्रकाशन- हंस, कादम्बिनी, कथादेश, दैनिक जागरण– पुनर्नवा, मेरी सहेली, गृहशोभा, सरिता, वनिता, अमर उजाला, अभिनव प्रयास, नंदन, बाल भारती आदि राष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों में भागीदारी व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंच संचालन।
मोबाइल नं.- 9720166139