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मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

स्मृति से संकल्प तक- अलका मिश्रा

स्मृति से संकल्प तक- अलका मिश्रा

गोविन्द गुलशन जी की शायरी, उनका मार्गदर्शन और उनका स्नेह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश-पुंज बनकर रहेगा। यह विशेषांक उसी स्मृति, उसी कृतज्ञता और उसी प्रकाश को समर्पित है।

क़रीब जाने से चलता है शख्सियत का पता
ज़मीं  से  चाँद  ज़रा-सा   दिखाई   देता  है

श्रद्धेय गोविन्द गुलशन जी का यह शेर मानो उनके व्यक्तित्व का आत्मकथ्य है। साहित्य में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका प्रभाव केवल रचना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनका जीवन, आचरण और सान्निध्य भी उतना ही अर्थपूर्ण हो जाता है। गोविन्द गुलशन जी ऐसे ही विरले रचनाकार थे, जिनकी शायरी जितनी ऊँचाई पर दिखाई देती है, उनके निकट जाने पर उनकी मानवीय गरिमा उतनी ही गहराई में उतरती चली जाती है।


उनकी शायरी से पहली बार साक्षात्कार करने वाला श्रोता या पाठक उनकी भाषा, भाव-समृद्धि और प्रस्तुति से सहज ही प्रभावित हो जाता है। किंतु जो उनके सान्निध्य में आया, उसने जाना कि उनके भीतर बैठा शायर केवल शब्दों का साधक नहीं, बल्कि जीवन को समझने वाला एक गंभीर, ध्यानी और अत्यंत सरल मनुष्य भी है। अनुभवों की परिपक्वता के बावजूद उनका स्वभाव सात्विक, व्यावहारिक और दृष्टि संतुलित थी।

वर्ष 2015 में नई दिल्ली की एक साहित्यिक गोष्ठी से आरंभ हुआ यह साक्षात्कार, धीरे-धीरे संवाद, मार्गदर्शन और गुरु-शिष्य परंपरा तक विस्तृत हुआ। मंच पर उनका पाठ श्रोताओं को भाव-विभोर कर देता था। उनकी शायरी में न तो अनावश्यक प्रदर्शन था, न शब्दाडंबर, बल्कि एक सहज गहराई थी, जो सीधे मन से संवाद करती थी। यही कारण है कि उन्हें सुनकर यह बोध होता था कि शायरी केवल कहने की कला नहीं, बल्कि देखने, समझने और साधने की प्रक्रिया है।

गुरुवर का यह विश्वास था कि ग़ज़ल केवल भावुक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुशासन और विवेक की विधा है। उन्होंने अपने शागिर्दों को यह सिखाया कि शेर कैसे खुलता है, अर्थ के कितने ज़ाविये हो सकते हैं, और उससे भी अधिक यह कि ग़ज़ल में क्या नहीं कहा जाना चाहिए। भाषा की शुद्धता, भाव की मर्यादा और कथ्य की सच्चाई इन तीनों पर उनका विशेष आग्रह था।
“कुछ नया कहा या नहीं?”, उनका यह प्रश्न शिष्यों को सतत रचनात्मक बने रहने की प्रेरणा देता था।

उनका सान्निध्य केवल साहित्यिक नहीं था, वह मानवीय भी था। उनके घर का वातावरण, उनका पारिवारिक स्नेह, अपनत्व और सरलता सब मिलकर यह अनुभव कराते थे कि बड़ा शायर होना और बड़ा मनुष्य होना, दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। उनका व्यक्तित्व पल भर में सामने वाले को अपना बना लेता था। आज के समय में ऐसा निःस्वार्थ स्नेह दुर्लभ होता जा रहा है।

गुरुवर का असमय जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, वह शब्दों से नहीं भरी जा सकती। किंतु यह भी सत्य है कि कोई रचनाकार अपने शब्दों, अपने संस्कार और अपने शिष्यों के माध्यम से जीवित रहता है। गोविन्द गुलशन जी की शायरी, उनका मार्गदर्शन और उनका स्नेह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश-पुंज बनकर रहेगा।

यह विशेषांक उसी स्मृति, उसी कृतज्ञता और उसी प्रकाश को समर्पित है। यह हमारा परम सौभाग्य है कि गुरुवर की अंतिम कृति 'कल न कल तो तेरे..' इरा प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व भी उनकी पुस्तक 'हवा के टुकड़े' का द्वितीय संस्करण यहीं से प्रकाशित हुआ। यह विशेषांक केवल स्मरण नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है, उन मूल्यों, उस दृष्टि और उस साहित्यिक चेतना को आगे बढ़ाने का, जिसे उन्होंने अपने जीवन से जिया और अपनी शायरी से रचा।
श्रद्धेय गुरुवर गोविन्द गुलशन जी की स्मृति में इरा प्रकाशन द्वारा 'गोविन्द गुलशन स्मृति पुस्तक प्रकाशन योजना' की उद्घोषणा करते हुए हम आशान्वित हैं कि गुरु जी के नाम के अनुरूप, उनके आशीर्वाद से, इरा प्रकाशन के माध्यम से कुछ उत्कृष्ट और संवेदनशील शायरों की शायरी की पुस्तकें पाठकों तक पहुँच सकेंगी। यह योजना केवल प्रकाशन का उपक्रम नहीं, बल्कि गुरु परंपरा के उस सतत प्रवाह को आगे बढ़ाने का संकल्प है, जिसमें गुणवत्ता, संवेदना और साहित्यिक उत्तरदायित्व सर्वोपरि रहेगा।

अंत में, उन्हीं की पंक्तियों के साथ इस विशेषांक को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं-

जल रहा है दिया मुहब्बत का
सिर्फ़ इतना है रौशनी कम है

3 Total Review
H

Hareram Sameep

24 February 2026

आपने गोविंद जी के कवि व्यक्तित्व को बहुत सुन्दर शब्दों में यूँ आलोकित किया है कि उन की बहुआयामी प्रतिभा को खोलकर रख दिया। आभार और साधुवाद।

के० पी० अनमोल

16 February 2026

बहुत अच्छा लिखा आपने। बधाई।

M

Mamchand Agarwal Vasant

15 February 2026

बहुत सुंदर

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रचनाकार परिचय

अलका मिश्रा

ईमेल : alkaarjit27@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-27 जुलाई 1970 
जन्मस्थान-कानपुर (उ० प्र०)
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल० (मनोविज्ञान) तथा विशेष शिक्षा में डिप्लोमा।
सम्प्रति- प्रकाशक ( इरा पब्लिशर्स), काउंसलर एवं कंसलटेंट (संकल्प स्पेशल स्कूल), स्वतंत्र लेखन तथा समाज सेवा
विशेष- सचिव, ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन 
लेखन विधा- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, दोहा, क्षणिका, आलेख 
प्रकाशन- बला है इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
101 महिला ग़ज़लकार, हाइकू व्योम (समवेत संकलन), 'बिन्दु में सिन्धु' (समवेत क्षणिका संकलन), आधुनिक दोहे, कानपुर के कवि (समवेत संकलन) के अलावा देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं यथा- अभिनव प्रयास, अनन्तिम, गीत गुंजन, अर्बाबे कलाम, इमकान आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
रेख़्ता, कविता कोष के अलावा अन्य कई प्रतिष्ठित वेब पत्रिकाओं हस्ताक्षर, पुरवाई, अनुभूति आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्पादन- हिज्र-ओ-विसाल (साझा शेरी मजमुआ), इरा मासिक वेब पत्रिका 
प्रसारण/काव्य-पाठ- डी डी उत्तर प्रदेश, के टी वी, न्यूज 18 आदि टी वी चैनलों पर काव्य-पाठ। रेखता सहित देश के प्रतिष्ठित काव्य मंचों पर काव्य-पाठ। 
सम्मान-
साहित्य संगम (साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था तिरोड़ी, बालाघाट मध्य प्रदेश द्वारा साहित्य शशि सम्मान, 2014 
विकासिका (साहित्यिक सामजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था कानपुर द्वारा ग़ज़ल को सम्मान, 2014
संत रविदास सेवा समिति, अर्मापुर एस्टेट द्वारा संत रवि दास रत्न, 2015
अजय कपूर फैंस एसोसिएशन द्वारा कविवर सुमन दुबे 2015
काव्यायन साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मानित, 2015
तेजस्विनी सम्मान, आगमन साहित्य संस्था, दिल्ली, 2015
अदब की महफ़िल द्वारा महिला दिवस पर सम्मानित, इंदौर, 2018, 2019 एवं 2020
उड़ान साहित्यिक संस्था द्वारा 2018, 2019, 2021 एवं 2023 में सम्मानित
संपर्क- एच-2/39, कृष्णापुरम
कानपुर-208007 (उत्तर प्रदेश) 
 
मोबाइल- 8574722458