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विकसित-शिक्षित समय में भी ताक़त मनुष्यता पर हावी है- के० पी० अनमोल

विकसित-शिक्षित समय में भी ताक़त मनुष्यता पर हावी है- के० पी० अनमोल

मनुष्य ने अपना जीवन, अपनी जाति को तो ख़तरे डाला ही है, पूरी सृष्टि और तमाम जीव-जन्तुओं का जीना भी हराम किया हुआ है। सार यही समझ आता है कि इस प्रजाति का मूल स्वभाव विध्वंस का ही है।

कैसी विडंबना है कि सर्वाधिक विकसित-शिक्षित समय में भी ताक़त मनुष्यता पर हावी है। अपने घर-पड़ोस से लेकर वैश्विक स्तर तक देखें तो यही कड़वा सच हमारे सामने खड़ा है। पढ़-लिख कर, सभ्य होकर, मनुष्य को इस दुनिया और उसकी सबसे अहम ज़रूरत मनुष्यता के कल्याण के बारे में सोचना था, लेकिन हम देख क्या रहे हैं! चारों ओर हिंसा, बल, भय, वर्चस्व और कलह के मंज़र!

जिनके पास पॉवर है, वे निरंकुश हुए जा रहे हैं। वे अपनी सत्ता, अपना वर्चस्व स्थापित करने की मंशा लिए हुए हैं, मगर उनका क्या, जो मासूम हैं! जिन्हें बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं! जो बिना किसी अपराध के अहंकार और वैमनस्य के शिकार हो रहे हैं! क्या हासिल है इस उन्माद का, इस गुण्डई का! पिछले कुछ सालों में देखा जा रहा है कि हिंसा और मुर्खता मनुष्य के सिर पर सवार हुई पड़ी है। मूल्य, संयम, सहभागिता के भाव जाने कहाँ डूब मरे! जाने कहाँ जाकर रुकेगा यह सब! और अफ़सोसनाक यह है कि दुनियाभर में होने वाला यह उन्माद, शान्ति और धर्म के नाम पर हो रहा है!

बसंत ऋतू , जिसमें हमें प्रकृति के सुहावने रूप को महसूस करना था, जीना था, बिना किसी अहसास के निकली जा रही है। रमज़ान का पवित्र महिना, जिसे इबादत का सबसे बेहतरीन समय माना जाता है, विध्वंस देकर गुज़र रहा है। महिला दिवस- माता के नवरात्रे, जिसमें शक्ति को सम्मान देना था, उसकी उपासना करनी थी, शायद हमेशा की तरह उपेक्षित ही रहें। ऊपर से गुमान यह कि हम सबसे सभ्य जीव हैं, सबसे बुद्धिमान प्रजाति हैं! क्या किया जाए इस सभ्यता का, इस बुद्धि का, जो न ख़ुद के लिए काम आ रही है, न दुनिया के! बल्कि तबाही का कारण बनी जा रही है!

मनुष्य ने अपना जीवन, अपनी जाति को तो ख़तरे डाला ही है, पूरी सृष्टि और तमाम जीव-जन्तुओं का जीना भी हराम किया हुआ है। सार यही समझ आता है कि इस प्रजाति का मूल स्वभाव विध्वंस का ही है। ऐसे में महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं वे लोग, जिन्होंने दुनिया को इन करोड़ों सालों में रहने लायक बनाने में सहयोग किया। शान्ति, सृजन और संभावनाओं के वे ध्वजवाहक, जिन्होंने मनुष्यता शब्द को गरिमा दी, अर्थ दिये, उन लोगों की अहमियत और ज़्यादा समझ आती है अब। हमें कृतज्ञ होना चाहिए ऐसे समस्त नायकों पर जिन्होंने मनुष्यता के लिए, इस सृष्टि के लिए कुछ किया और दिया। आने वाले ऐसे लोग और जो वर्तमान में हैं, उनकी क़ीमत समझनी चाहिए।

पत्रिका के इस अंक में सृजन, सरोकार और संवेदनाओं को सहेजने का प्रयास किया गया है। इस प्रयास में सहभागी समस्त रचनाकारों का साधुवाद। पाठकों- साहित्य-प्रेमियों से कि सृष्टि, भावनाओं और मूल्यों को बचाए रखने के हर संभव प्रयास बनाए रखें। उम्मीदें और कामनाएँ कि हम विनाश और विध्वंश से बाहर निकलें और सुख, सम्पन्नता, शान्ति, सहभागिता और सृजन से मायने समझें, उनके अर्थ बनाए रखें।

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
मोबाइल- 8006623499