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कवि की कार और आलोचक का अलाऊंस- डॉ० प्रमोद सागर

कवि की कार और आलोचक का अलाऊंस- डॉ० प्रमोद सागर

अब जनाब, यात्रा आत्मा की नहीं, इंस्टाग्राम की है। पहले कवि मन से उतरता था, अब 'मॉडल पोज़' में।
अब कवि का दर्द पेट्रोल की तरह है- महँगा भी, ज्वलनशील भी, और कुछ-कुछ फेक भी।

अब साहित्य सवारी बन गया और कविता पेट्रोल से चलने लगी। आज के ज़माने में कवि और लेखक अगर सच में 'यात्रा' शब्द सुन लें, तो सबसे पहले दिमाग़ में आते हैं- रेलवे पास, ट्रैवल अलाऊंस और होटल के बिल। पहले कवि यात्रा करता था प्रेरणा के लिए- गंगा किनारे जाकर लिखता था, अब कवि यात्रा करता है स्पॉन्सरशिप के लिए। पहले लोग कविता को आत्मा की अभिव्यक्ति कहते थे, अब उसे 'इवेंट डिलीवेरेबल' कहा जाता है।

अब कवि की पहली पंक्ति होती है- “भाई, स्टे कौन करा रहा है?”
और आलोचक की पहली शर्त- “डिनर बुफे में क्या मिलेगा?”
अब कविता का लहजा वही है, जो होटल की चाय का तापमान तय करे।
पहले कवि अपनी साइकिल पर दो ज़िलों की यात्रा करता था। थैली में किताबें और जेब में बस धूल, और लौटकर ऐसी कविता लिखता था, जो पूरे समाज का दर्पण बन जाए। अब कवि अपनी SUV में एयरपॉड लगाकर कहता है-
"भाई, कविता तो आती है, बस सिग्नल मिलना चाहिए।"

अब कविता सड़क पर नहीं उतरती, वो GPS से चलती है। अब शब्द नहीं बहते, इंजन गरम होता है। कवि अगर दिल्ली से जयपुर के किसी लिटफेस्ट में जा रहा हो, तो उसकी तैयारी किसी राजनयिक यात्रा जैसी होती है-
"भाई, VIP पास है न?"
"और मंच की सीट तीसरी या चौथी पंक्ति में?"
अब कविता मंच पर नहीं चढ़ती, स्टेज प्रोटोकॉल से गुज़रती है।

इन आधुनिक कवियों का सबसे बड़ा दर्द ये है कि अब कविता उन्हें प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि 'रील कवरेज' देती है। वो हर सत्र के बाद अपने ड्राइवर से कहते हैं-
"भाई, थोड़ी फोटो निकाल ले कार के पास, ताकि लगे हमने ‘लंबा सफर’ किया।"
और उस फोटो का कैप्शन होता है-
'कविता की यात्रा जारी है।'

अब जनाब, यात्रा आत्मा की नहीं, इंस्टाग्राम की है। पहले कवि मन से उतरता था, अब 'मॉडल पोज़' में।
अब कवि का दर्द पेट्रोल की तरह है- महँगा भी, ज्वलनशील भी, और कुछ-कुछ फेक भी।

अब आलोचक की बात कीजिए- वो भी किसी साधक से कम नहीं, बस अंतर इतना कि साधक तपस्या में जलता है, और आलोचक 'अलाऊंस' में।
जहाँ पहले आलोचक किसी नई किताब पर गहन चिंतन करते थे, अब वे सबसे पहले पूछते हैं- "सम्मेलन कहाँ हो रहा है?"
अगर जवाब मिले- "दिल्ली, होटल अशोका में।"
तो कहते हैं- "विचारों की गंभीरता वहीं निकलती है।"
अगर आयोजन गोरखपुर में हो, तो जवाब देते हैं- "स्वास्थ्य ठीक नहीं है।"

अब विचार नहीं, भत्ते यात्रा तय करते हैं।
अब ‘समीक्षा’ किसी की पुस्तक नहीं, फूड रिव्यू से शुरू होती है- "भोजन उत्तम था, आयोजन शानदार।"
अब साहित्य का गद्य 'स्वागत भाषण' में घुल गया है।
हर सम्मेलन में वही दृश्य-
कवि मंच पर अपनी कविता पढ़ रहा है,
आलोचक सामने बैठे हॉल में घड़ी देख रहा है,
क्योंकि उसे दोपहर तक 'अगले सत्र के सम्मान समारोह' में जाना है।
हर कविता की तालियाँ वही हैं, जो 'लंच ब्रेक' से पहले बची रह जाती हैं।
अब कवि सम्मेलन भावनाओं का मंच नहीं, अलाऊंस का ठिकाना है।
कवि के बोलने से पहले आयोजक का निर्देश होता है- "भाई, पाँच मिनट में ख़त्म करना, बाक़ी लोगों का पेट्रोल लिमिट में है।"
और कवि सोचता है- "अगर मैं दो पंक्तियाँ और पढ़ दूँ, तो शायद डिनर कूपन पक्का हो जाए।"

अब कविता नहीं, कूपन कल्चर है।
अब जनाब, कवियों के बीच कार और कपड़े का मुक़ाबला भी चलता है।
पहले पूछा जाता था- "कविता का विषय क्या है?"
अब पूछा जाता है- "भाई, ये शॉल कहाँ से ली?"
कवि के चेहरे पर मुस्कान होती है- "अकादमी वालों ने दी थी पिछले सेमिनार में।"
अब सम्मान की पहचान वही शॉल और वही बैग हैं, जो हर साल रंग बदलते हैं, पर नीति नहीं।
हर आयोजन के अंत में समूह फोटो।
हर चेहरा थका हुआ पर कैमरे के लिए मुस्कुराता हुआ, और कैप्शन-
'शब्दों की पवित्रता पर सार्थक विमर्श।'
अब विमर्श नहीं, विनम्र अभिनय है।

अब की आलोचना भी किसी ‘बजट सत्र’ से कम नहीं। आलोचक किसी किताब की समीक्षा करने से पहले 'फ्लाइट डिटेल' देखता है।
वो कहता है- "भाई, विचार विमर्श लंबा होगा, बिज़नेस क्लास चाहिए।"
अब साहित्य का यथार्थ वही है, जो एयरपोर्ट लाउंज में लिखा जाता है। कभी-कभी तो लगता है, आलोचक अब वही है जो हर सम्मेलन में माइक टेस्टिंग करता है, और लेखक वही जो सुनते-सुनते सोचता है- "भाई, ये कब चुप होंगे?"

अब संवाद का मतलब ही बदल गया है। पहले विचारों का टकराव होता था, अब 'माइक पास करो' वाली प्रतियोगिता।
और उस दिन, जब कोई सच्चा कवि अपनी पुरानी स्कूटी पर किसी छोटे क़स्बे से कविता लेकर आएगा, तो पीछे बैठे 'भत्तावाले कवि' कहेंगे- "भाई, ये बहुत रॉ है, लेकिन इसमें पॉलिशिंग की कमी है।"
और वो मासूम कवि अपनी नोटबुक बंद कर लेगा, क्योंकि उसे नहीं पता कि अब कविता भाव नहीं, ब्रांड वैल्यू से बिकती है। कविता अब आत्मा नहीं, इवेंट रिपोर्टिंग है। और आलोचक का विवेक अब 'रसीद के पीछे' लिखा जाता है।

कभी सोचिए जनाब, अगर आज के कवि और आलोचक को राहुल सांकृत्यायन, माखनलाल चतुर्वेदी या नागार्जुन देख लें, तो शायद मुस्कराकर कहें-
"अब कविता का इंजन पेट्रोल नहीं, PR तेल से चलता है।"
और नामवर सिंह ऊपर से हँसकर कहें-
"अब साहित्य नहीं, लिटरल इंडस्ट्री बन गई है।"
और कबीर तो बस इतना ही कहते-
"कविता गाड़ी चढ़ गयो, भत्ता लेके जाइ।

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रचनाकार परिचय

प्रमोद सागर

ईमेल : kitabganj@gmail.com

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प्रबंधक- किताबगंज प्रकाशन समूह, गंगापुर सिटी (राजस्थान)
मोबाइल- 08750660105