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सैयारा का तैयारा- दिलीप कुमार सिंह

सैयारा का तैयारा- दिलीप कुमार सिंह

इस फ़िल्म में युवक-युवतियाँ (जिन्हें अब ज़ेन ज़ी भी कहा जाता है) अपने वर्तमान प्रेम के साथ फ़िल्म देखने जाते हैं और अपने भूतपूर्व प्रेम (एक्स) को याद करके दहाड़ें मारकर रोते हैं। मैं भी अपनी दफ़्तरी नीरस और उबाऊ दिनचर्या से ऊबकर कर यह ज़ेन ज़ी, मिलेनियल और अल्फ़ा जेनेरेशन की फ़िल्म देखने चला गया।

“सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई
देखूँ तो एक शख्स भी अपना नहीं हुआ ”।
उर्दू के मशहूर शायर जॉन एलिया का यह शेर आजकल बड़ा मुफ़ीद है । ये उन ख़वातीनो-हज़रात पर बहुत फिट बैठ रहा है जो आजकल मोहब्बत का पैमाना “सैयारा” फ़िल्म को मान रहे हैं। सैयारा फ़िल्म की बिडम्बना यही है कि यह बड़ी दिलफ़रेब है।
इस फ़िल्म में युवक-युवतियाँ (जिन्हें अब ज़ेन ज़ी भी कहा जाता है) अपने वर्तमान प्रेम के साथ फ़िल्म देखने जाते हैं और अपने भूतपूर्व प्रेम (एक्स) को याद करके दहाड़ें मारकर रोते हैं। मैं भी अपनी दफ़्तरी नीरस और उबाऊ दिनचर्या से ऊबकर कर यह ज़ेन ज़ी, मिलेनियल और अल्फ़ा जेनेरेशन की फ़िल्म देखने चला गया। पहले मैंने सोचा था कि अकेले देखूँगा। अपनी नीरस, एकरस और तनावपूर्ण ज़िंदगी को जरा सा बदलूँगा। वीकेंड पर मल्टीप्लेक्स में रंगीन एवं आधुनिक कपड़े पहन कर पॉपकॉर्न खाते हुए और कोल्डड्रिंक पीते हुए सुंदर चेहरों को ताड़ने का सुख लेने को मेरा जी बेक़रार था। यह सब फंतासी वाली कल्पनाएँ करके मेरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।
मैंने जिस तरह के सोशल मीडिया पर फ़िल्म के वीडियो देखे, यह कि उसमें युवक -युवतियाँ अपने पूर्व प्रेम को याद करके दहाड़ें मारकर रो रहे थे। उस हिसाब से यदि किसी प्रेम दृश्य को देखकर मैं कमज़ोर पड़ गया और किसी पूरानी प्रेमिका के विरह में आँसू निकल आये तो मेरी पत्नी मेरी क़ायदे से ख़बर लेगी।
सो मैंने इतवार के दिन बीवी से कहा “आज दोपहर का खाना मैं नहीं खाउँगा। मुझे बाहर कुछ लोगों से मिलने जाना है। कुछ ज़रूरी काम हैं।"

“कहीं नहीं जाना है किसी से मिलने। पूरे हफ़्ते लोगों से मिलते ही तो रहते हो। इतने लोगों से मिल कर कौन सा किला फ़तह कर लिया है जो अब सन्डे को भी मेल-मुलाक़ात ज़रूरी है। सन्डे को फ़ैमली को टाइम दो।"

पूरे हफ़्ते फ़ैमली के लिये ही तो खटता हूँ। आज भी तो घर के सारे काम निपटा दिए हैं मैंने। मुझे कहीं जाना है ज़रूरी काम है” मैंने मिमियाते हुए अपना बचाव किया।
“कोई ज़रूरी काम का बहाना नहीं चलेगा। आज हम नई ब्लॉकबस्टर मूवी “सैयारा” देखने चलेंगे। सुना है ऐसी शानदार मूवी दसियों बरस में एक-आध ही आती है। इस मूवी ने तहलका मचा रखा है। मैं अपने फ्रेंड सर्किल के जितने भी व्हाट्सएप ग्रुप में हूँ। उन सब लेडीज़ ने ये ट्रेंडिंग मूवी देख ली है और सब अपनी सेल्फ़ी डाल रही हैं। सिर्फ़ मैं ही बची हूँ। हम नहीं देखेंगे ये मूवी तो हम बैकवर्ड माने जाएँगे। आख़िर हम भी मॉडर्न और प्रोग्रेसिव सोच के हैं। मैं तो तुम्हारी छुट्टी का वेट कर रही थी। हम आज ही चलेंगे ये मूवी देखने। मैं तो सब काम निपटा कर रेडी हो गई हूँ। अब तुम भी रेडी हो जाओ।" पत्नी ने आदेशात्मक स्वर में कहा।
मैं हैरान रह गया कि यह औरत कितना ज़्यादा मेरे जीवन में घुस गई है, इसे कैसे पता चला कि मैं क्या करने वाला हूँ? इसका इतना आतंक है मुझ पर कि जो भी मैं सोचता हूँ, वह भी यह जान जाती है।
मैंने उसे शीशे में उतारने का प्रयत्न करते हुए कहा–

“ये तो लौंडे-लपाड़ों की फ़िल्म है। हमारी उम्र हो गई है। हमें क्या देखनी है ये फ़िल्म।"

“अच्छा तो हर सन्डे को बालों में कलर क्यों लगाते हो। हर बुधवार को सैलून में फेशियल क्यों करवाते हो। जवान दिखने के लिये ही ना? ये टाइट जीन्स और टीशर्ट इसीलिए तो पहनते हो ताकि जवान दिख सको। यानी ये सब करने के लिये तो जवान हो और फ़िल्म देखने की बात हो तो बूढ़े हो जाओगे। इतना डबल स्टैंडर्ड क्यों? हमें फ़िल्म देखनी है उसमें एक्टिंग नहीं करनी है। और जब उम्र हो चली है तो हेयर कलर- फेशियल छोड़ो, नौकरी से वीआरएस लो और धोती -कुर्ता पहनो और घर बैठ कर हरि का भजन करो।" उसने तल्ख़ स्वर में कहा।

मैं हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगा। उसके तंज़ का मर्म और उसके क्रोध की लिमिट की थाह लेने लग तो उसने मुझसे सधे शब्दों में कहा –
“मैं तैयार होने जा रही हूँ। आज न सिर्फ़ हम सैयारा मूवी देखेंगे बल्कि लंच भी बाहर किसी रेस्टोरेंट में करेंगे “यह कहकर मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वह कमरे से निकल गई। मैं समझ गया कि यह सैयारा का तैय्यारा (हवाई जहाज) अब कुछ न कुछ करके ही मानेगा।

पत्नी की बात से मैं चिढ़ गया और तय किया कि इसे हर हाल में आज मज़ा चखाना ही है। यानी कि वह सैयारा देख कर रोई तो मैं इसे ख़ूब ताने दूँगा और वह कुछ दिनों तक बैकफुट पर रहेगी । और अगर यह न रोई तो मैं ख़ूब रोऊँगा ताकि कई दिनों तक यह उधेड़बुन में रहे कि उसके पति परमेश्वर किसकी याद में रो रहे हैं और न आने किस-किस की याद में रो रहे हैं।

सिनेमा हॉल में हम दोनों पहुँच गए। कुछ जाने-पहचाने लोगों से बातचीत करके मैंने ये जाना कि ये लोग भी फ़िल्म को इंजॉय करने नहीं बल्कि रोने के लिये आये हैं। ये उन दफ़्तरी पुरुषों की क़ौम थी जो मेरी रोज़ी-रोटी और परिवार की परवरिश में अपना लड़कपन कहीं बहुत पीछे छोड़ आयी थी और दिन रात तनाव पाले हुए दफ़्तर और गृहस्थी की चक्की में पिस रहे थे। यह दफ़्तरी प्राणी आज रोना चाहता था, जी भर के रोना चाहता था ताकि बरसों से उसके मन में छिपा दर्द आँसुओं के रास्ते निकल जाए भले ही पुराने भूले-बिसरे प्यार को याद करके। मैं सोच रहा था कि मैं अच्छा-भला चरित्रवान पुरुष अपनी पत्नी को मिल गया हूँ तो मेरो पत्नी मुझे ग्रांटेड ले रही हैं पर मैं भी अब उसे सबक सिखाउँगा। मैं फ़िल्म में प्रेम दृश्यों को देखकर सुबक-सुबक कर रोउँगा ताकि मेरी पत्नी शंका, ईर्ष्या से जल भुन जाए कि मैं किसी पुरानी प्रेमिका को अब भी इतना याद करता हूँ कि विवाह के इतने वर्षों बाद राज़ी ख़ुशी पत्नी के साथ रहने के बावजूद मुझे उस पुरानी प्रेमिका की इतनी शिद्दत से याद आ रही है।

फ़िल्म शुरू हुई, मैं फ़िल्म के दर्द को आत्मसात करते हुए रोने को तैयार बैठा हूँ। फ़िल्म चलती रही मैं देखता रहा, रोने को तैयार था पर कमबख़्त की मगर दर्द महसूस होने के बजाय मुझे उबासी आ रही थी फ़िल्म की बोरियत से, फ़िल्म देखकर मेरे रोने-धोने की तो कोई बात ही नहीं थी। मुझे थोड़ी सी आत्मग्लानि भी महसूस हुई कि मैं किस तरह का नराधम प्राणी हूँ। जरा सी भी सामाजिकता नहीं है मुझमें। बस ज़रा सा रोना ही तो है ताकि एक ज़िम्मेदार नागरिक के कर्तव्य पूरे हो जाएँ। इसके अलावा मेरे रोने से सिनेमा हॉल में बैठे मेरे बगल के व्यक्ति को पता भी चल जाये कि उसके बगल एक भावुक मगर ज़िम्मेदार नागरिक बैठा है जो सैयारा फ़िल्म देखकर सिनेमा हॉल में अपने रोने के कर्तव्य से विमुख नहीं हुआ है। रोने से एक बोनस और यह मिलता कि पत्नी भी जल-भुन जाती डाह से। पर क्या करूँ आँखें सूख गईं “ए सैयारा तेरे हाल पे सिनेमा हॉल में न रोना आया।"

इंटरवल होने पर मुझे थोड़ा सा दर्द महसूस हुआ। मैंने अपने दर्द के वजह की तफ़्तीश की तो पाया कि यह दर्द फ़िल्म के इमोशन की वजह से नहीं था बल्कि भूख की वजह से था। मैं अपने दर्द का निवारण करने को निकला तो पीछे से आवाज़ आई, “जो कुछ खाने-पीने जा रहे हो मेरे लिये भी लेते आना” पत्नी ने पीछे से टोका।

“सिगरेट पीने की तलब लगी है। उसी का सुट्टा लगाने जा रहा हूँ। तुम्हारे लिए भी एक सिगरेट सुलगा लाऊँ क्या” तल्ख़ लहजे में कहते हुए मैंने उसे घूरा।

उसने मुझे आग्नेय नेत्रों से देखा। कुछ देर तक तो मैंने उससे नज़रें मिलाई फिर अपना आगा-पीछा, भला-बुरा सोचकर मैंने नज़रें फेर लीं और सिनेमा हॉल से बाहर निकल आया।

मुझे तनाव हो रहा था सो मैंने सिगरेट सुलगा ली। तनाव मुझे फ़िल्म के इमोशन पर नहीं बल्कि अपने निर्णय से उपजे कोफ़्त पर था। कि मैंने यह फ़िल्म देखने का निर्णय क्यों किया था ? इससे भला तो यह था कि सन्डे को घर पर रेस्ट करता और पत्नी से ढेर सारे स्वादिष्ट व्यंजन बनवा कर खाता। इतने पैसे भी ख़र्च हो गए और छुट्टी के दिन भी आराम बदा नहीं हुआ।

मैंने सिगरेट पीने के बाद कोक और सैंडविच उदरस्थ किया और बीवी के लिये वही दोनों ख़रीद भी लिया है। मैंने तय किया कि अब पैसे लग गए हैं तो फ़िल्म पूरी देखूँगा और चल कर इस बात को ताड़ता हूँ कि अगर पत्नी ज़रा सा रोई या सुबकियाँ लीं तो पूरे साल उसे ताने दूँगा और बदले लूँगा जिस तरह वह मुझे ताने दिया करती है। और हाँ सिगरेट पत्नी के लिये मैंने नहीं ली है।

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रचनाकार परिचय

दिलीप कुमार सिंह

ईमेल : jagmagjugnu84@gmail.com

निवास : बलरामपुर(uttr प्रदेश)

जन्म तिथि- 19 जून 1980
शिक्षा- एम एस सी ,बी एड ,कम्प्यूटर में डिप्लोमा ।
सम्प्रति- शिक्षण व लेखन ।
लेखन की विधा- कहानी,कविता,व्यंग्य,उपन्यास,लघुकथा ,स्क्रिप्ट आदि।कुछ समय तक रेडियो और अन्य मनोरंजक माध्यमों हेतु भी लेखन।
पुस्तकें-तीन कथा संग्रह,दो लघुकथा संग्रह प्रकाशित, दो उपन्यास प्रकाशित,दो व्यंग्य संग्रह
प्रकाशन- एक उपन्यास एवं एक कथा संग्रह प्रकाशनाधीन ,
पुरस्कार/सम्मान
भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता द्वारा कहानी हेतु पुरस्कार,
प्रकाशन विभाग ,भारत सरकार द्वारा कहानी हेतु पुरस्कृत ।
पाखी पत्रिका द्वारा “शब्द साधक युवा सम्मान “
कलमकार ,गाथा,इंडियन एक्सप्रेस, द्वारा लेखन हेतु पुरस्कृत ।स्पंदन संस्था जयपुर, क्षितिज संस्था इंदौर द्वारा कहानी हेतु सम्मानित।
सम्पर्क- मालती कुंज कालोनी, आनंद बाग,बलरामपुर ,उत्तर प्रदेश 271201 
मोबाइल- 9956919354/9454819660