Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
पिता के नायकत्व पर विमर्श करती ग़ज़लें: उँगली कंधा बाजू गोदी- अखिलेश श्रीवास्तव

जो नई-नवेली-सी बात यह संग्रह पढ़कर मेरे मन में उभर रही है, वह बेटियों की दृष्टि से पिता को देखने को आतुर है। पुत्र समयातीत होते हुए पिता भी होता है। उसके लिए पिता पर लिखना अपनी ही भूमिका को शब्द देना है पर बेटियाँ जब पिता पर लिख रही हैं तो उन्हें भाव के समंदर पर ही पूरी कविता लिखनी है। कथ्य और भाव का अंतर बच ही नहीं सकता, पिता के लिए बेटी के पास जो भाव होते हैं, वो बेटे के भाव से अलग हैं।

जीवन के कई रंग अपने भीतर समेटे है: जैसे बहुत क़रीब- नेहा कटारा पाण्डेय

अनमोल जी एक सरल स्वभाव व सादगी प्रिय इंसान हैं। वे हमेशा अपने लेखन को सरल व सहज बनाने की बात कहते हैं। जितना सरल आप लिखेंगे उतनी ही आपके लेखन की पहुँच अधिक पाठकों तक हो सकेगी, ऐसा मानना है उनका। वे वर्तमान में हिन्दी ग़ज़ल के युवा ग़ज़लकार व अनमोल‌‌ सितारे हैं। हमेशा अपने शिल्प व कहन‌ के अंदाज़ से‌ हर‌ ग़ज़ल को एक नया मेयार दे रहे अनमोल जी की ग़ज़लों में मित्रता, गाँव की मिट्टी से लगाव, पर्यावरण के प्रति चिंतन, सामाजिक मुद्दों पर विचार, प्रेम, बुज़ुर्गों के‌ प्रति सम्मान, देश-प्रेम जैसे कई रंग मिलते हैं।

हिन्दी भावधारा की अनूठी ग़ज़लों का संग्रह: पतवार तुम्हारी यादें- के० पी० अनमोल

यह पुस्तक हिन्दी शिक्षण संस्थान, जोधपुर से वर्ष 2023 में आयी है। इसे राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा आंशिक सहयोग भी प्रदान किया गया है। संग्रह की एक ख़ास बात यह भी है कि अपने पहले संग्रह की तरह महावीर जी ने इसमें भी केवल फ़ेलुन के रुक्नों की बहरों यानी बह्रे-मीर पर आधारित ग़ज़लों को ही सम्मिलित किया है।

बोल जमूरे! बोल के बहाने अपने समय की पड़ताल- डॉ० लवलेश दत्त

पुस्तक में जनक छंद में निबद्ध छोटी-छोटी कविताएँ, जो कहीं कटाक्ष करती हैं, कहीं हमारी व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, कहीं गुदगुदाती हैं तो कहीं आँखों को नम भी कर देती हैं।