Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
दर्पण की भाँति प्रतिबिंबित करती ‘फ़िबोनाची वितान’ कहानियाँ- शैल अग्रवाल

कहा जाता है कहानियाँ कल्पना लोक में ले जाने के साथ-साथ तत्कालीन समय और समाज को दर्पण की भाँति प्रतिबिंबित करती हैं और यह बात आरती लोकेश गोयल के इस नए कहानी-संग्रह पर पूरी तरह से सही प्रतीत होती है। यदि यहाँ भारतीय समाज और मूल्य व मान्यताएँ है, तो दुबई भी है। पश्चिम का वैभव-विलास और एकाकी जीवन भी। कोरोना-काल का एक बोनजाई उल्लेख भी मिलता है हमें इन कहानियों में...

एक आदिम चरवाहा गाँव की दास्तान- शशि काण्डपाल

एक गौरव गाथा,एक पल्लवित समाज और उसके पलायन/ उन्नति की कीमत का निर्मम इतिहास- डॉ गिरिजा किशोर पाठक द्वारा लिखित पुस्तक “एक आदिम चरवाहा गाँव की दास्तान” की समीक्षा। 

'तोल्स्तोय की जीवनी' अनूदित पुस्तक- रामप्रसाद राजभर

दो वर्ष पूर्व हेनरी त्रोयत द्वारा लिखित तोल्स्तोय की जीवनी को पढ़ने का सौभाग्य मिला। लेकिन कैसे?  वह ऐसे कि लगभग पाँच वर्ष के दौरान कथाकार श्री रूपसिंह चन्देल साहब ने इस जीवनी का पुनर्सृजन किया देवनागरी में। छः सौ छप्पन (बावन और छप्पन की संख्या बदनाम हो चली है!) पृष्ठों का पुनर्सृजन करना वह भी स्वेच्छा से तथा अपने मौलिक लेखन के साथ-साथ! आश्चर्य चकित करता है मगर एक अनुशासित जीवनशैली के विकट अनुयायी के लिए यह सहज है।

मानवीय संवेदना एवं जिजीविषा का आईना : मुस्तरी बेगम- डॉ० पंकज साहा

मुस्तरी बेगम शशि कांडपाल जी का पहला कहानी संग्रह है, जिसमें चौदह कहानियाँ हैं। इस संग्रह में लेखिका ने 'अपनी बात' कहने की परंपरा से स्वयं को मुक्त कर लिया है। शायद उन्हें लगता होगा कि अपनी बात तो उनकी कहानियों में ही है या 'बात बोलेगी मैं नहीं' के तर्ज पर उन्होंने सोचा होगा कि जब कहानियाँ बोल ही रही हैं तो अलग से मैं क्या बोलूँ?