Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दसवीं कड़ी

चम्पा, बेला, रात-रानी सब पर खुलकर निखार चढ़ा था। देव को पहले पौधों से कोई ख़ास प्यार नहीं था। लेकिन देवयानी के शौक़ को देख देव को भी पौधों से प्यार होने लगा था।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की तेईसवीं कड़ी

“तुम्हारा स्त्री होना.....तुम्हारे शब्दों के चारों ओर काँटों वाली बाड़ खड़ी कर देता है। तुम्हारे संस्कार हो या मेरे, हम दोनों को कभी खुलकर लिखने नहीं  देंगे, क्योंकि दोनों ने ही अपनी-अपनी ज़िंदगियाँ पूरी ईमानदारी के साथ निभाई हैं।  सामाजिक मर्यादाएं तुम्हारे पेन पर मुझ से कहीं अधिक आकर बैठ जाती हैं, और तुम उसके बोझ तले अपने उद्गारों की काँट-छाँट कर पन्नों पर ख़ुद को उतारती हो।”

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की नौवीं कड़ी

देवयानी….. देवयानी! देवयांक! ओह! अपनी ग़लती से मैंने अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली। मैं भी! कौन से ज़माने में पहुँच गया। देवयांक अब छोटा बच्चा कहाँ, उसके ख़ुद मेरी छुटकी-सी लाड़ली-सी बिटिया चिया है। मेरी चिया! सबसे दूर हो गया मैं।" देव के आँखों से आँसू की अविरल धारा बहने लगी।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बाईसवीं कड़ी

जानती हो शिखा, जब प्रीति गयी थी, मेरे पास प्रणय था। मेरे अकेलेपन का साथी। उस समय जो भी महसूस करते, एक-दूसरे से साझा करते। वह काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा। पर तुम्हारा सोचकर मेरा जी घबराता था, क्योंकि मुझे सार्थक के व्यवहार के बारे में सब पता था।