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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की इक्कीसवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की इक्कीसवीं कड़ी

शिखा की बात सुनकर दोनों देवर भावुक हो उठे। जब दोनों ने बहू के बारे में पुनः पूछा तो शिखा ने चुप्पी साध ली, क्योंकि इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। आजकल कोई भी कितना क़रीबी ही क्यों न हो, बहुत प्रश्न नहीं पूछता। सच तो यह भी है कि कोई ज़्यादा जवाब नहीं देना चाहता। आज आत्मीयता भी औपचारिकताओं को ओढ़कर आती है।


रिश्तेदारों व मेहमानों का बारह दिनों तक घर में आना-जाना लगा रहा। समीर और शिखा का लोगों के संग बहुत अच्छा सामाजिक व्यवहार था। यही वजह थी कि ग़मी के इस मौक़े पर काफ़ी लोग शिखा से मिलने आये। दूर से आये लोगों के खाने और ठहरने का इंतज़ाम प्रखर की मदद से बहुत सहूलियत से हो गया था। सार्थक काफ़ी रिश्तेदारों को जानता था तो उसके आने से उनका ध्यान रखने में सुविधा रही।

अब प्रखर भी आये हुए रिश्तेदारों के लिए अपरिचित नहीं था। प्रखर की मिलनसारिता से आने वाले सभी अभिभूत थे। कुछ ने अपने दिमाग़ की खलबली को सीधे-सीधे प्रखर से ही उसका परिचय पूछकर शांत किया। प्रखर ने ख़ुद को समीर और शिखा का मित्र व पड़ोसी बताकर उनकी जिज्ञासा को शांत कर दिया। आज कामकाज़ी लोगों के दिमाग़ में मित्र शब्द पहले के जैसे हौवा नहीं रहा। स्त्री हो या पुरुष, उसके विपरीत लिंगी मित्र हो सकते हैं, ऐसा लोग मानकर चलते हैं। कोई भी अब किसी को बातों की सीमाएँ तोड़ने का हक़ नहीं देता, भलई किसी के भी दिमाग़ में कितनी भी बातें चलें।

दोनों देवरों को लग रहा था कि शिखा अकेली कैसे रहेगी। प्रवीण और प्रशांत बार-बार सार्थक से पूछ रहे थे कि अब तुम्हारा क्या विचार है। तुम शिखा को अपने साथ लेकर जाओगे या फिर तुमने क्या सोचा है, वह बताओ।
'आप निश्चिंत रहिए चाचाजी, जैसा माँ कहेंगी; वही होगा।' बोलकर फिलहाल सार्थक ने सभी के मुँह बंद कर दिए थे। इन तेरह दिनों में किसी ने भी बहू मीता का फोन शिखा के पास आते हुए न देखा, न सुना। जिसकी वजह से शिखा के देवरों को उसकी बहुत चिंता हुई। उन्होंने शिखा से स्वयं ही पूछ लिया-
"भाभी, सब ठीक तो है! बहू का एक भी बार फोन नहीं आया! आपने अपने भविष्य के लिए अब क्या सोचा है?"
शिखा अपने बेटे और बहू के व्यवहार से संतुष्ट नहीं थी। वह जल्दबाज़ी में कुछ भी बोलकर ख़ुद को परेशानियों में नहीं डाल सकती थी। फिलहाल बात टालने के हिसाब से शिखा ने ख़ुद ही उन दोनों को जवाब दिया- "मैं हमेशा यही रहूँगी, जब तक स्वस्थ हूँ। इस घर में मेरी बहुत सारी यादें बसी हुई हैं। मैंने काफ़ी वक़्त समीर के साथ इसी घर में निकाला है। जहाँ तक सार्थक की बात है, हम निर्णय ले लेंगे। अगर मुझे कोई ज़रूरत हुई तो आप दोनों को ज़रूर बताऊँगी। वैसे भी हमेशा की तरह आप सबका इस घर में आना-जाना लगा रहेगा। माँ-बाऊजी की विरासत से हम सबका जुड़ाव है। समीर के जाने के बाद उनकी ज़िम्मेदारियों को निभाने की कोशिश करूँगी। कभी मन हुआ तो आप दोनों के पास भी आऊँगी।"

शिखा की बात सुनकर दोनों देवर भावुक हो उठे। जब दोनों ने बहू के बारे में पुनः पूछा तो शिखा ने चुप्पी साध ली, क्योंकि इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। आजकल कोई भी कितना क़रीबी ही क्यों न हो, बहुत प्रश्न नहीं पूछता। सच तो यह भी है कि कोई ज़्यादा जवाब नहीं देना चाहता। आज आत्मीयता भी औपचारिकताओं को ओढ़कर आती है। कोई भी किसी से अधिकार के नाम पर कुछ नहीं करवा सकता, इसलिए शिखा के लिए भी किसी को बहुत जवाब देना ज़रूरी नहीं था। तभी समीर के छोटे भाई प्रशांत ने शिखा से कहा- "भाभी! आप अगर चाहे तो हम लोगों के साथ भी रह सकती हैं। हम दोनों को ही बहुत अच्छा लगेगा।"

शायद उन लोगों को समझ आ गया था कि सार्थक की बहू ने अगर उसे एक भी फोन नहीं किया है तो उसकी क्या मंशा हो सकती है! यही वजह थी कि सार्थक भी अपनी बीवी की सहमति के बग़ैर कोई जवाब नहीं दे पा रहा था। परिवार के लिए समीर और शिखा ने बहुत किया था। तभी देवरों का पूछना भी बनता था, पर वो सब भी अपने घरों के माहौल से वाकिफ़ थे। तभी उतना ही कहा और पूछा गया, जितने उत्तर मिलने की गुंजाइश थी।
तब शिखा ने अपने देवर प्रशांत से कहा, "आप दोनों बिल्कुल निश्चिंत रहो। मैं ठीक हूँ, और मैं अभी कहीं नहीं जाऊँगी। मैं जो भी निर्णय लूँगी, आप दोनों को ज़रूर बताऊँगी।"

दोनों ही देवर अपनी भाभी का बहुत आदर करते थे, पर वह यह भी जानते थे कि वह शिखा को अपने घर चलने का बोल रहे हैं पर उनकी पत्नियाँ शायद इस निर्णय से ख़ुश नहीं हों। इसके बाद उन्होंने भी इस विषय पर चर्चा नहीं की। सब मेहमानों और रिश्तेदारों के तेरह दिन बाद चले जाने पर सार्थक ने अपनी माँ को बताया कि उसकी टिकट आते हुए रविवार की है। उसने एक बार भी शिखा को अपने साथ चलने के लिए नहीं कहा। न सार्थक और रुकना चाहता था, न ही शिखा ने उससे रुकने को कहा। सार्थक के जाने से पहले शिखा ने सार्थक को अपने पास बुलाया और पूछा- "सार्थक, क्या हुआ है बेटा? इतने दिनों से तुम्हें देख रही हूँ कुछ परेशान हो। मैंने तुम्हें कई बार मीता को, यहाँ आने के लिए फोन करते देखा, हुआ क्या है? मुझे बताओगे?"
शिखा बेटे को परेशान देखकर समीर के अचानक चले जाने से हुए कष्ट को कुछ समय के लिए भूल गयी।
सार्थक ने माँ की गोद में सिर रखकर बोलना शुरू किया। आज पहली बार सार्थक मीता के बारे में इतना बोला था। सार्थक ने शिखा को अपनी शादी के समय का सारा वाक़या बताया-
"माँ, मैं और मीता एक ही कॉलेज में पढ़ा करते थे। मीता मुझे अच्छी लगती थी। हम दोनों एक साथ काफ़ी समय गुज़ारने लगे। उसने अपने घर में मेरे बारे में बताया कि मुझे अनाथाश्रम से गोद लिया है। मीता के माँ-बाप को जैसे ही इस बात का पता लगा, उन्होंने हमारी शादी के लिए इंकार कर दिया। तब मीता की ज़िद होने से हम दोनों ने जल्दबाज़ी में मंदिर जाकर शादी की। माँ, मीता स्वभाव से बहुत स्वार्थी व असंतुलित व्यवहार की है। विवाह हो जाने के बाद मुझे पता लगा कि मीता किसी के भी साथ एडजस्ट नहीं कर सकती। उसको बस लड़ना आता है। मैं कई दिनों से उसे फोन करके यहाँ आने को बोल रहा था, पर वह नहीं आना चाहती थी। वह मुझे साफ़-साफ़ बोल चुकी है कि मैं तुम्हारी माँ के लिए कुछ भी नहीं कर पाऊँगी। तुम अगर उन्हें यहाँ लाते हो तो उनका सब कुछ करने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी। मैं किसी भी बात के लिए उससे कोई आशा न रखूँ। चूँकि माँ मेरी है तो उसका मुझे ही करना होगा।"

फिर सार्थक ने मीता के बारे में बहुत कुछ बताया कि वह कैसे उसके साथ निभाने की कोशिशे कर रहा है। मीता को चार महीने की प्रेग्नन्सी है। सार्थक को उसकी हर बात को तवज्जो देनी पड़ती है।
“माँ, वह आपका कभी भी कुछ नहीं करेगी, उल्टा आपकी बेइज्ज़ती ही करेगी। वह मुझे ही नहीं छोड़ती है। आप और पापा ने जिस तरह मान-सम्मान से ज़िंदगी को जीया है, वह आपको नहीं रहने देगी। आपको नहीं पता वह मेरे ऊपर भी हाथ उठा देती है। मैं उससे उतनी ही बात करता हूँ, जिसमें घर में शांति बनी रहे। शायद बच्चा होने के बाद सब ठीक होने लगे। अभी तो मुझे कुछ समझ नहीं आता क्या करूँ।"
"बेटा, तुम अपनी शादी के बाद इतनी परेशानी में थे, और तुमने हमारे साथ साझा भी नहीं किया! शिखा ने सार्थक से पूछा।"
सार्थक की बातों पर विश्वास करके शिखा ने बोल तो दिया, पर जब उसने पिछला याद किया तो उसे सार्थक की वो कमियाँ भी याद आयीं, जहाँ उसकी ग़लतियों को समीर कभी नजरंदाज़ नहीं कर पाये। साथ ही शिखा को सार्थक से हुई बातों से ही पता चला कि मीता प्रेग्नेंट है। इससे पहले उसने कभी कोई ज़िक्र नहीं किया।

शिखा ने सार्थक की इस बात को सुनकर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कहीं न कहीं सार्थक शिखा के स्वाभिमान को ठेस पहुँचा रहा था। उसका समीर के अन्त्येष्टि से जुड़े सभी संस्कारों को बहुत मन से करना, शिखा के लिए अनगिनत प्रश्न खड़े कर रहा था। फिर सार्थक ने अपनी बात पूरी की-
'आप दोनों क्या मदद करते माँ? मेरी शादी भी तो मेरी ही मर्ज़ी की थी। मैंने तो आपको बताया तक नहीं था। उल्टा आपको बहुत आहत किया, पर मैं अभी बहुत लाचार हूँ। तभी आपको नहीं ले जाना चाहता। दोनों चाचाजी भी बार-बार पूछ रहे थे पर मेरे पास उन्हें जवाब देने के लिए कुछ भी नहीं था। तब शिखा ने उसके बालों में हाथ घुमाते हुए कहा- "मेरी वजह से परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें। मैं अभी ख़ुद समर्थ हूँ। मैं इसी घर में रहूँगी और जब भी मुझे लगेगा कोई ज़रूरत है, मैं तुमसे ज़रूर बात करूँगी।"

शिखा सार्थक से अभी कुछ भी कहने की मानसिक स्थिति में नहीं थी। वह सब कुछ समय के हाथों छोड़कर चलना चाहती थी। शिखा ने सार्थक से कहा- "जाओ सार्थक, अपनी पैकिंग करो बेटा! वापस चक्कर लगाना। हम बात करते रहेंगे। कोई भी बात हो ज़रूर बताना।"
अपनी बात बोलकर शिखा अपने बिस्तर पर लेट गयी। समीर के यूँ अचानक चले जाने से सब बिखर गया था। पर नियति को स्वीकारने के अलावा किसी के भी पास कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं होता।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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