Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

मिटने से पहले सबको जता देती है कि मेरे पास अब लम्हे सिमट रहे हैं। सब अपने घर को लौट चलो। पक्षी अपने बसेरों पर चल देते हैं। पशु अपने घर की ओर लौट चलते हैं और गाय जब गले में रुनझुन घंटी की गूँज के साथ अपने टापों से धूल उड़ाती हुई घर की ओर लौटती हैं। अहा! अपनी माँ को रँभाते हुए वो नन्हें-नन्हें छौने उनके बछड़े और घर वापसी को बेकरार भागती हुई माँ। जब धूल के गुबार आकाश को छूते हैं, कितना सुंदर मंज़र होता है! वो साँझ की ख़ूबसूरती होती है, जो जताती है कि छोटी-सी ज़िंदगी भी कितनी ख़ूबसूरत हो सकती है।"

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सत्रहवीं कड़ी

विवाह के बाद के इतने सालों में शिखा ने पहली बार समीर को इतने क्रोध में देखा। उनके बोलने से लग रहा था कि जल्द से जल्द बहू-बेटे घर से चले जाएँ।सार्थक के ऐसा क़दम उठाने से समीर बहुत आहत हुए थे।

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

"इसे देव के कमरे में पहुँचा देना। अगर यह कुछ सामान लाई हो तो वो भी वहीं रखवा देना। न लाई हो तो जब यह उठ जाए, इससे पूछ इसकी ज़रूरत का सामान किसी को भेज या तुम ख़ुद जाकर बाज़ार से ले आना। ये अब से यहीं रहेगी।"

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सोलहवीं कड़ी

सार्थक शिखा के पास आकर बैठ गया तो शिखा बोली थी- सार्थक, ख़ुश रहो बेटा। तुम्हारे पापा और मेरे विचार इस विषय में एक ही हैं। ख़ैर अब छोड़ो। अपने कमरे में जाकर रेस्ट करो। तुम्हें कल निकलना भी है। अपना सब सामान देख लेना बेटा। नई नौकरी में जल्दी आना नहीं होगा। मेरी कहीं ज़रूरत हो तो बता देना। मदद को आ जाऊँगी।