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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

मिटने से पहले सबको जता देती है कि मेरे पास अब लम्हे सिमट रहे हैं। सब अपने घर को लौट चलो। पक्षी अपने बसेरों पर चल देते हैं। पशु अपने घर की ओर लौट चलते हैं और गाय जब गले में रुनझुन घंटी की गूँज के साथ अपने टापों से धूल उड़ाती हुई घर की ओर लौटती हैं। अहा! अपनी माँ को रँभाते हुए वो नन्हें-नन्हें छौने उनके बछड़े और घर वापसी को बेकरार भागती हुई माँ। जब धूल के गुबार आकाश को छूते हैं, कितना सुंदर मंज़र होता है! वो साँझ की ख़ूबसूरती होती है, जो जताती है कि छोटी-सी ज़िंदगी भी कितनी ख़ूबसूरत हो सकती है।"

दवा के असर से गहरी नींद में बेसुध सोई शर्मिष्ठा की आवाज़ एक मधुर आवाज़ से खुली।
"चाय पीती हैं आप?"
इस मीठी आवाज़ को सुन, शर्मी हड़बड़ा कर उठी।
"जी आप..! और मैं यहाँ?"
"मैं अनन्ता। दोपहर को आपको मैं मम्मी के पास छोड़कर गयी थी। वहाँ अचानक आपकी तबीयत काफ़ी ख़राब हो गयी थी। बेहोश हो गयीं आप। आप शायद ठीक से कुछ खाती-पीती नहीं हैं। काफ़ी दुबली-पतली हैं। अब मम्मी के साथ रहेंगी, मम्मी आपको एकदम गोलगप्पा कर देंगी। पहले मैं भी बहुत पतली थी। अब देखो मम्मी ने कैसा गोलू-मोलू कर दिया मुझे। ओह! मैं अपनी कहानी सुनाने बैठ गयी। हाँ, तो जब आप बेहोश हो गयीं फिर मम्मी ने आपको डॉक्टर को दिखाया। वो आपको कुछ मेडीसिन दे गये थे, जिसके असर में आप अभी तक सो रहीं थीं मोहतरमा।" मीठी आवाज़ अपनी मोहक मुस्कान लिए फिर गूँजी।
"ए लो, बातों में भूल गयी। मम्मी ने आपको चाय का पूछने को कहा है। शाम हो रही है। मम्मी ने कहा अब आपको उठा दूँ। मम्मी कहती हैं दिन मिले कभी नहीं सोते। दिन मिलना समझीं आप। नहीं समझी होंगी। रुकिए मैं समझाती हूँ। दिन मिलना माने जब गोधूलि हो। गोधूलि समझती हैं आप? वो भी नहीं। जानती हैं जब दिन और संध्या का ख़ूबसूरत मिलन होता है, भले ही वो पल भर को हो। भोर से लेकर दोपहर और दोपहर के बाद फिर साँझ! पूरे दिन के शिद्दत के इंतज़ार के बाद जब यह दोनों मिलते हैं, आकाश में सुरमई रंग बिखर जाते हैं। सूरज नारंगी कपड़े पहन बादलों की गोद में जाने को बेकरार होता है। संध्या को पता होता है, कुछ पलों के बाद वो रात के गहन अँधकार में डूब जाएगी। बस यही कुछ पल उसके मिलन के हैं और देखिए इन छोटे-से पलों को भी वो ख़ूबसूरती से जी लेती है। मिटने से पहले सबको जता देती है कि मेरे पास अब लम्हे सिमट रहे हैं। सब अपने घर को लौट चलो। पक्षी अपने बसेरों पर चल देते हैं। पशु अपने घर की ओर लौट चलते हैं और गाय जब गले में रुनझुन घंटी की गूँज के साथ अपने टापों से धूल उड़ाती हुई घर की ओर लौटती हैं। अहा! अपनी माँ को रँभाते हुए वो नन्हें-नन्हें छौने उनके बछड़े और घर वापसी को बेकरार भागती हुई माँ। जब धूल के गुबार आकाश को छूते हैं, कितना सुंदर मंज़र होता है! वो साँझ की ख़ूबसूरती होती है, जो जताती है कि छोटी-सी ज़िंदगी भी कितनी ख़ूबसूरत हो सकती है।"

शर्मिष्ठा बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी। वो भी देव के जीवन की साँझ ही थी लेकिन वो साँझ भी कहाँ बन सकी? कहाँ देव के जीवन को थोड़ी देर को भी सुंदर बना पायी! और न ही ख़ुद उन लम्हों को जी पायी।
"ओह! मैंने पूरा दर्शन झाड़ दिया। आप बोर हो गयी होंगी।"
आने वाली काफ़ी बातूनी लगती थी। कुछ दिन पहले तक वो भी ऐसी ही बातूनी हुआ करती थी। देव की संगत में दिन-रात कितने ख़ूबसूरत हो गये थे। उसकी चहक से पूरा हॉस्टल गूँजता रहता। देव उसे 'वॉकी-टॉकी डॉल' कहते थे। ओह देव! कहाँ चले गये आप! "उदासी ने गोरी रंगत ढलते सूरज के जैसी ही फिर पीली कर दी। अनन्ता हैरानी से धनक रंगों को पीली रंगत में बदलते देख रही थी। मन हुआ उससे पूछने का लेकिन देवयांक की हिदायत याद आते ही यह इरादा छोड़ दिया।

"यह इतनी उदास क्यों हैं आप? मुस्कुराइए। मम्मी कहती हैं कि मुस्कुराने से परेशानियाँ आधी रह जाती हैं।" शर्मिष्ठा हैरानी से उसको देखने लगी।
"आप मुझे अनन्ता कह सकती हैं। मम्मी की ख़ास मेहमान लगती हैं इसलिए आप भी इस घर के बाक़ी सदस्यों के जैसे अनी भी कह सकती हैं। मैं समझ रही हूँ आप सोच रही हैं, कितना बोलती है अनी! वो पापा को बेटी का बहुत चाव था। देवयांक के बाद मम्मी को कुछ कॉम्पलीकेशन हो गये थे। बेटी न होने का कष्ट मम्मी-पापा दोनों को कचोटता रहा। बस मम्मी ने ठान लिया था कि बोलने वाली गुड़िया ही लानी है देवयांक के लिए। और बस मैं इस घर में आ गयी और ख़ूब बोलती हूँ।"
शर्मिष्ठा उसकी बातें सुन इतनी उदासी में भी मुस्कुरा दी।

"साथ में ही वॉशरूम है। आप फ्रेश हो जाइए। मैं चाय भिजवाती हूँ। पीकर थोड़ी तरो-ताज़ा हो जाएँगी।"
"जी।" शर्मिष्ठा ने फौरन हाँ कर दी। उसे चाय की ज़रूरत बहुत शिद्दत से महसूस हो रही थी।
अनन्ता चाय लाने का कहकर चली गयी। शर्मी ने अब कमरे में चारों ओर देखा। कमरे में देव का सामान देख, वो फिर फूट-फूट कर रोने लगी। देव के कमरे में आई भी तो देव के जाने के बाद। चाहतें यूँ भी पूरी होती हैं सबकुछ ख़त्म कर। रोने की आवाज़ सुन बगीचे की ओर जाती देवयानी के क़दम ठिठक गये। वो मुड़ कर देव के कमरे में चली आयी।

"अपने को सम्हालो शैना।"
"शैना….!" शर्मिष्ठा ने हैरानी से देवयानी को देखा।
इस नाम से तो उसे देव बुलाते थे। शर्मिष्ठा ने पलभर को देवयानी की आँखों में झाँका। देव के अथाह प्यार का सागर वहाँ ठांठे मार रहा था। तो क्या इस कदर देवयानी में बसे थे देव? इसीलिए शर्मिष्ठा को वहाँ पनाह मिल गई थी। सच कहते थे देव। देवयानी उन्हें बहुत चाहती हैं।"

"कहाँ खो गयीं शर्मी। देव के बिना ही अब जीना सीखना होगा तुम्हें भी और मुझे भी। मुझे लग रहा है तुमने कुछ भी नहीं खाया। डाॅक्टर ने कहा है कि तुम बहुत कमज़ोर हो। मैं कुछ खाने को भिजवाती हूँ। पहले कुछ खा लो और हाँ खा ज़रूर लो। मैं बाहर हूँ। देवयांक-अनन्ता कल ही आये हैं। मैं अभी तुम्हारे साथ ज़्यादा देर नहीं रह पाऊँगी। अनन्ता जो भी भिजवाये, वो खा लेना। और देखो प्लीज़ रोना मत। तुम तो जानती ही हो, देव को किसी के आँसू बर्दाश्त नहीं होते। फिर तुम्हारे कैसे होंगे?"

शर्मी कुछ सोचने-समझने की ताक़त खो चुकी थी। चारों ओर शून्य के सिवाय कुछ नज़र नहीं आ रहा था। थोड़ी देर में फिर वही प्यारी-सी लड़की चाय और स्नैक्स लेकर आ गयी। न जाने कौनसी अदृश्य ताकत ने उसे टोस्ट खाने पर मज़बूर कर दिया। बे-मन से चाय का कप होंठों से लगाया। सामने की दीवार पर देव की बड़ी-सी तस्वीर लगी हुई थी। दूसरी दीवार पर देव की तस्वीरों का कोलाज था। हँसते-मुस्कुराते देव। कहीं बेसाख्ता खिलखिलाते देव। कमरे में चारों ओर जैसे देव विराजमान थे। उसके अपने देव। बरबस ही आँखों की कोरें भीगने लगीं। तभी देवयानी का कहा याद आया, "प्लीज़ रोना नहीं। देव को किसी के आँसू बर्दाश्त नहीं थे। देव के साथ बिताये पल शर्मिष्ठा की आँखों के आगे चलचित्र से गुज़रने लगे।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597