Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
अंततः ढह जाते हैं 'बिना दीवारों के घर'– के० पी० अनमोल

बिना दीवारों के घर के ज़रिए लेखिका ने हमारे समाज की उन मनोवृत्तियों को उजागर किया है, जिनका शिकार कामकाजी महिलाएँ अपने ही घर में होती हैं। पति के द्वारा उसका साथ न देना, छोटी-बड़ी बात पर चरित्र पर शक करना, ख़ुद से आगे निकलने की ईर्ष्या और पुरुष का झूठे अहंकार के चलते बार-बार उसे अपमानित करना, ये सभी वे यातनाएँ हैं, जिनके मारे पढ़ी-लिखी महिलाएँ या तो घर चुनती हैं या नौकरी।

'प्रेमाश्रम' वास्तव में सपनों के भारत की एक कल्पना है- के० पी० अनमोल

इस उपन्यास को 'गोदान' की पूर्व-पीठिका कहना पूरी तरह सही जान पड़ता है। दोनों में एक स्पष्ट अंतर दोनों के अंत में है। प्रेमाश्रम, जहाँ आदर्शोन्मुखी यथार्थ पर ख़त्म होता है और अंत में सब सकारात्मक होता है, वहीं गोदान, त्रासद यथार्थ पर समाप्त होता है और शायद इसीलिए वह प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति साबित होता है।

कानपुर का नवजागरण (भाग- दस)- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

सन् 1921 में "प्रताप" ने रायबरेली के ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह के अत्याचारों का विवरण, शर्मा जी के इस शीर्षक के साथ छपा था,क्या सूबे मे आग लगाने का इरादा है?"

कानपुर का नव जागरण भाग दस- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

सन् 1921में गाँधी जी के आवाहन पर असहयोग की बलिवेदी पर कानपुर ने अपनी पूरी भेंट चढ़ाई। ख़िलाफत आन्दोलन को गाँधी जी का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण नगर के मुसलमानों ने भी हिन्दुओं से कंधा से कंधा भिड़ाकर कांग्रेस का साथ दिया।