Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

कानपुर का नवजागरण भाग आठ- प० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

कानपुर का नवजागरण भाग आठ- प० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

लखनऊ अधिवेशन से लौटते हुए भारतीय क्रान्ति के ज्वालामुखी, महान देशभक्त, उद्भट विद्वान महाराज तिलक का कानपुर में ऐतिहासिक आगमन हुआ। कानपुर के लिए लज्जा और कलंक की बात है कि स्टेशन पर गणेश जी, अरोड़ा जी के अतिरिक्त और कोई उन्हें लेने नहीं गया था।

26 दिसम्बर 1916 को श्री अम्बिकाचरण मजूमदार की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ, जिसमे तिलक और गाँधी जी ने भी भाग लिया और कांग्रेस पुन: एक हो गई। इसी अधिवेशन में विषय समिति के सदस्य के चुनाव में गाँधी जी हारकर भी तिलक द्वारा विजयी घोषित किए गये थे। तिलक ने देश के भावी कर्णधार को पहचान लिया था। इसी अधिवेशन मे तिलक के नेतृत्व में युवा उग्रवादी पीढ़ी की विजय हुई थी और कांग्रेस नए क्रान्तिकारी मार्ग पर अग्रसर हुई थी। कानपुर से काफी संख्या में लोग डेलीगेट, दर्शक, अथवा स्वयंसेवक के रूप में गए थे और कानपुर में इस अधिवेशन का बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा था। लखनऊ अधिवेशन से लौटते हुए भारतीय क्रान्ति के ज्वालामुखी, महान देशभक्त, उद्भट विद्वान महाराज तिलक का कानपुर में ऐतिहासिक आगमन हुआ। कानपुर के लिए लज्जा और कलंक की बात है कि स्टेशन पर गणेश जी, अरोड़ा जी के अतिरिक्त और कोई उन्हें लेने नहीं गया था। यही नहीं देश के इस अमूल्य रत्न को कानपुर में कोई भी अपने यहाँ ठहराने के लिए तैयार नहीं हुआ और कानपुर के सभी लक्ष्मीपुत्र, कर्णधार रायबहादुर गीदड़ों की तरह नगर छोड़कर भाग गये और उन्हें पुरानी स्टेशन के समीप ग्वालियर धर्मशाले में टिकना पड़ा। कानपुर के पुरानी पीढ़ी के नेता कायर निकले, लेकिन यहाँ जागरुक जनता ने परेड के मैदान में उनका अभूतपूर्व स्वागत और सम्मान किया। परेड की इस विशाल सभा में जब कानपुर में कोई सभापति बनने को तैयार न हुआ और नगर की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी तो सरकारी पेंशंन प्राप्त अवकाश प्राप्त राजकीय स्कूल के हेडमास्टर पंडित विशम्भरनाथ शुक्ल स्वयं कुर्सी पर आ बिराजे और उन्होने लोकमान्य से सम्बोधन करने के लिए आग्रह किया। क्या कभी कानपुर अपने इस कलंक को धोने के लिए श्री शुक्ल जी का समुचित स्मारक बनवायेगा ? कहते हैं दूसरे दिन कलेक्टर ने उन्हें बुलाया, किन्तु उन्होंने अपनी विधि से समझा-बुझा दिया।
सन् 1916 तक कानपुर कांग्रेस का न तो कोई संगठन ही था और न कोई कार्यालय। कानपुर कांग्रेस अभी तक कुछ नगर के महापुरूषों, पं. पृथ्वीनाथ चक,"पूर्ण" जी, बाबू नारायणप्रसाद अरोड़ा, पं. देवीप्रसाद शुक्ल, भगत देवीदास, बाबू नारायणप्रसाद निगम, देवीदास, पं.जयनारायण बाजपेयी आदि के व्यक्तित्व पर ही जीवित थे। उसकी न कोई स्थायी कार्यसमिति थी और न कार्यालय। जब गाँधी जी भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के रंगमंच पर नव प्रभात लेकर विहसे, एक अध्याय का समापन हुआ और भारत की भूमि पर संघर्ष का अनोखा विचित्र किन्तु मौलिक इतिहास रचा जाने लगा। देश ने नई करवट ली और उत्सर्ग, त्याग, बलिदान और आशा की नई हिलोरें जनमानस को उद्वेलित करने लगीं महात्मा जी ने संगठन को नया परिधान दिया और वह ग्राम, नगर, जिला कमेटियों से विधिवत सज्जित होने लगीं।

क्रमशः....

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी

ईमेल :

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

पण्डित अम्बिकाप्रसाद त्रिपाठी के पुत्र पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी जी का जन्म 20 अक्टूबर 1898 को कुन्दौली, कानपुर में हुआ था। सन् 1918 में क्राइस्टचर्च कालेज कानपुर से बी.ए.करने के बाद लक्ष्मीकान्त जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. इतिहास विषय मे उत्तीर्ण कर अध्यापन कार्य मे संलग्न हो गये। कानपुर के क्राइस्टचर्च कालेज मे दीर्घअवधि तक अध्यापन व इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे और एक वर्ष कान्यकुब्ज कालेज के प्रधानाचार्य भी रहे। आपके शोध निबंध सरस्वती, प्रभा, सुधा, माधुरी, प्रताप ,वर्तमान और दैनिक जागरण मे प्रकाशित होते रहते थे। आपने पटकापुर मे अपना निवास बनाया और यहीं पर सन १९४६ ई० बाबू नारायणप्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर कानपुर इतिहास समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व मंत्री आप बने। उसी वर्ष 1946 में आपने अपने भाई रमाकान्त त्रिपाठी के साथ मिलकर "कानपुर के कवि" और सन 1947 में कानपुर के प्रसिद्ध पुरुष  व 1948 में कानपुर के विद्रोही पुस्तक बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। सन 1950 में कानपुर का इतिहास भाग-1 व 1958 में कानपुर का इतिहास भाग-2  बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। राय देवीप्रसाद पूर्ण की कविताओं का संकलन व सम्पादन "पूर्ण संग्रह" के नाम से किया जो गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। 
    आपके दत्तक पुत्र डा.अनिल मिश्र (बब्बू)  डी. ए. वी. कालेज मे इतिहास के प्रोफेसर रहे। आपका निधन कठेरुआ मे वर्ष १९८१ मे हुआ। आप स्थानीय इतिहास के साथ साथ साहित्य संस्कृति राजनीति धर्म व समसामयिक विषयों पर निरन्तर लिखते रहते थे। आपका पटकापुर कानपुर का पाठागार बहुत ही समृद्ध था ।