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कानपुर का नव जागरण भाग दस- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

कानपुर का नव जागरण भाग दस- पं० लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

सन् 1921में गाँधी जी के आवाहन पर असहयोग की बलिवेदी पर कानपुर ने अपनी पूरी भेंट चढ़ाई। ख़िलाफत आन्दोलन को गाँधी जी का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण नगर के मुसलमानों ने भी हिन्दुओं से कंधा से कंधा भिड़ाकर कांग्रेस का साथ दिया।


असहयोग आन्दोलन शुरू

सन् 1921में गाँधी जी के आवाहन पर असहयोग की बलिवेदी पर कानपुर ने अपनी पूरी भेंट चढ़ाई। ख़िलाफत आन्दोलन को गाँधी जी का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण नगर के मुसलमानों ने भी हिन्दुओं से कंधा से कंधा भिड़ाकर कांग्रेस का साथ दिया। कानपुर में कांग्रेस का सदस्य संख्या इन दिनों बढ़कर सहस्त्रों में पहुँच गई थी। डा० मुरारीलाल ने रायसाहबी त्याग दी थी, प० बालकृष्ण शर्मा, प० उमाशंकर दीक्षित, प० रामभरोसे त्रिपाठी, ला० प्यारेलाल अग्रवाल, श्री बलखण्डीदीन सेठ, श्री हनुमान प्रसाद जी आदि ने विद्यालयों का परित्याग कर संघर्ष के मोर्चे पर आ डटे थे। प० जगजीवनराम तिवारी वकालत में लात मारकर 'कांग्रेसी जज ' बन कर नगर और देहातों के झगड़े सुलझाते थे। नगर कांग्रेस द्वारा गठित 'उपसमिति' ने विदेशी वस्त्र बहिष्कार की धूम मचा दी और उसने विदेशी माल बेचने वाले व्यापारियों के कपड़ों की गाँठों पर अपनी सील लगाकर कपड़े को बिकने से रोक दिया था। कुछ व्यापारियों ने चोरी से उन गाँठो को बेचना आरंभ किया। इस पर इस कमेटी ने उन व्यापारियों पर जुर्माने किए और मुख्यत: उसी धनराशि से तिलक मेमोरियल सोसाइटी ने तिलक हाल का निर्माण करवाया। प० उमाशंकर दीक्षित के पिता प० रामस्वरूप दीक्षित दलाल, बाबू इकबाल कृष्ण कपूर, ला० लल्लूमल दलाल, श्री राजेन्द्र नाथ भार्गव आदि जिस समय कांग्रेस कार्यालय से बड़े उत्साह के साथ राष्ट्रीय गीत गाते , झूमते हुए नगर मे धरना देने के लिए निकलते थे तो वह दृश्य अदभुत होता था। नगर ने मुक्तहस्त होकर 'तिलक स्वराज्य फंड' में अपना योगदान किया था।
कताई-बुनाई कार्यक्रम के अन्तर्गत श्री परशुराम मेहरोत्रा की अवधानता में तीन हज़ार रुपये की लागत से चर्खा बनवाने का कार्य आरम्भ हुआ और ए.बी. रोड में जहाँ अब मिडलैंड साइकिल की दुकान है, कांग्रेस कमेटी की संरक्षता में और रामनाथ टंडन की निगरानी मे 'स्वदेशी स्टोर्स लिमिटेड' की स्थापना हुई और फिर कई खद्दर भंडार खुल गए। खादी व्यवसाय के प्रमुख उन्नायक श्री रामनाथ टंडन, श्री ब्रजमोहन त्रिपाठी, श्री फूलचन्द जैन, मुंशी भगवतीप्रसाद, प० जग नारायण अवस्थी द्वारा स्थापित स्वराज्य आश्रम खादी उत्पादन मे जुटा हुआ था। बाद में अवस्थी जी इसके संचालक पद से हट गये। कांग्रेस कार्यकर्ता खद्दर के थान कंधों पर डालकर जब बेचने निकलते थे, नगर तुमुल ध्वनि से इन सपूतों का स्वागत करता था। नगर निवासियों ने और व्यापारियों ने तथा विशेष रूप से लल्लूमल दलाल ने इस आन्दोलन मे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब कानपुर में राजनैतिक चेतना मुखर हो गई थी।
इस आन्दोलन मे सर्वप्रथम श्री नारायणप्रसाद अरोड़ा, प० रामप्रसाद मिश्र, प० रामलाल शर्मा बन्दी बनाए गए थे। बाद में प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की मीटिंग के अवसर पर इलाहाबाद से कानपुर के डा० मुरारीलाल, डा० जवाहरलाल, प० बालकृष्ण शर्मा, प० उमाशंकर दीक्षित और अहमदाबाद में मो० हसरत मोहानी पकड़े गए थे। कानपुर में श्री कृष्णदत्त पालीवाल, प० रघुवरदयाल भट्ट, ला० प्यारेलाल अग्रवाल, ब्रजविहारी मेहरोत्रा आदि ने धूम मचा दी थी। इस आन्दोलन में कानपुर में सामुहिक गिरफ्तारियाँ नहीं हुई थीं। जन आन्दोलन की इस वेगवती सहस्त्रधारा को गाँधी ने १९२२ मे चौरी-चौरा काण्ड के कारण अनायास रोक दिया। कानपुर मे गाँधी जी के इस कार्य के प्रति सभी मे बड़ा तीव्र रोष था जो 'नवीन जी' की इन पंक्तियों में पूर्णरूप से अभिव्यक्त हुआ था।

"वर्दी फटी ह्रदय घायल, मुख पर कारिख क्या वेश बना?
आँखें सकुच रहीं, कायरता के पंकिल से देश सना।
अरे पराजित ओ रणचंडी के कपूत हटजा हट जा,
अभी समय है कहदे, माँ मेदिनी जरा फटजा फट जा।
हन्त पराजय गीत आज क्या द्रुपद सुता का चीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता, है खाली तूणीर हुआ।"

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रचनाकार परिचय

पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी

ईमेल :

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

पण्डित अम्बिकाप्रसाद त्रिपाठी के पुत्र पण्डित लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी जी का जन्म 20 अक्टूबर 1898 को कुन्दौली, कानपुर में हुआ था। सन् 1918 में क्राइस्टचर्च कालेज कानपुर से बी.ए.करने के बाद लक्ष्मीकान्त जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. इतिहास विषय मे उत्तीर्ण कर अध्यापन कार्य मे संलग्न हो गये। कानपुर के क्राइस्टचर्च कालेज मे दीर्घअवधि तक अध्यापन व इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे और एक वर्ष कान्यकुब्ज कालेज के प्रधानाचार्य भी रहे। आपके शोध निबंध सरस्वती, प्रभा, सुधा, माधुरी, प्रताप ,वर्तमान और दैनिक जागरण मे प्रकाशित होते रहते थे। आपने पटकापुर मे अपना निवास बनाया और यहीं पर सन १९४६ ई० बाबू नारायणप्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर कानपुर इतिहास समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व मंत्री आप बने। उसी वर्ष 1946 में आपने अपने भाई रमाकान्त त्रिपाठी के साथ मिलकर "कानपुर के कवि" और सन 1947 में कानपुर के प्रसिद्ध पुरुष  व 1948 में कानपुर के विद्रोही पुस्तक बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा व श्याम विजय पाण्डेय के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। सन 1950 में कानपुर का इतिहास भाग-1 व 1958 में कानपुर का इतिहास भाग-2  बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा के साथ मिलकर लिखी व प्रकाशित कराई थी। राय देवीप्रसाद पूर्ण की कविताओं का संकलन व सम्पादन "पूर्ण संग्रह" के नाम से किया जो गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। 
    आपके दत्तक पुत्र डा.अनिल मिश्र (बब्बू)  डी. ए. वी. कालेज मे इतिहास के प्रोफेसर रहे। आपका निधन कठेरुआ मे वर्ष १९८१ मे हुआ। आप स्थानीय इतिहास के साथ साथ साहित्य संस्कृति राजनीति धर्म व समसामयिक विषयों पर निरन्तर लिखते रहते थे। आपका पटकापुर कानपुर का पाठागार बहुत ही समृद्ध था ।