Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप- डॉ० मिथिलेश दीक्षित

आस्था का मार्ग निर्भयता, दृढ़ता, साहस और निष्ठा का मार्ग है, जिसमें व्यवधान भी आ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी आ सकती हैं, संघर्ष भी करने पड़ सकते हैं परन्तु अन्त में सत्य ही विजयी होगा, इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। सामान्य जन में धैर्य की कमी होती है।

दूर्वा-संस्कृति का आख्यान- डॉ० शिव कुमार दीक्षित

सदाशिव के जटा सम्भार से हहराकर उतर आयी सितफेन गंगधार के स्पर्श से दूर्वा भूमण्डल पर हरित होकर ऐसी फैल जाती है मानों वह उन वनस्पतियों को चिढ़ा रही हो जिनके शिखर पुष्प देवांगनाओं के धम्मिल पाश में रत्नाभूषण बन गए हैं।

राजेन्द्र वर्मा का ललित निबंध 'प्रकृति, परिवेश और हम'

माना जाता है कि ये पञ्च तत्त्व हमारे शरीर में उसी मात्रा में विद्यमान हैं जिस मात्रा में ब्रह्माण्ड में हैं। इस दृष्टि से अपने शरीर को हम चलता-फिरता लघु ब्रह्माण्ड मान सकते हैं। हमारे भीतर गुण-अवगुण और हमारी चेतना का स्तर इन पंचतत्त्वों के व्यवहार से नियंत्रित होता है। 

बनन में, बागन में अब काहे बगरयो नहीं बसंत है- प्रेम गुप्ता ‘मानी’

इस नई पीढ़ी को यह भी नहीं पता कि ऋतुएँ छः होती हैं- शरद, हेमंत, शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा। अपने-अपने स्तर पर इन सभी ऋतुओं का महत्व है। अगर ये ऋतुएँ न होतीं तो यह जीवन भी न होता। जल, वायु, भोजन, मकान व अन्य वस्तुएँ जैसे हमारे जीवन में बदलाव लाकर उसे संतुलित रखती है, वैसे ही ये ऋतुएँ भी हैं, जो कभी सुख तो कभी दुःख देकर जीवन के मायने समझाती हैं। जीवन और मृत्यु, रात और दिन को जैसे हम स्वीकार करते हैं, उसी तरह इन ऋतुओं को भी स्वीकार करते हैं।