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भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप- डॉ० मिथिलेश दीक्षित

भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप- डॉ० मिथिलेश दीक्षित

आस्था का मार्ग निर्भयता, दृढ़ता, साहस और निष्ठा का मार्ग है, जिसमें व्यवधान भी आ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी आ सकती हैं, संघर्ष भी करने पड़ सकते हैं परन्तु अन्त में सत्य ही विजयी होगा, इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। सामान्य जन में धैर्य की कमी होती है।

भारतीय संस्कृति सृष्टि की अखंडता और पूर्णता का बोध कराने वाली संस्कृति है। यह संस्कृति मानवता के हितार्थ जीवन का श्रेयस्कर मार्ग प्रशस्त करने वाली भावधारा है। इसका मूल तत्व आस्था है। आस्था मानव की मूल प्रकृति और सहज प्रवृत्ति है। आस्थाबोध से मानव के हृदय में गुणात्मक परिवर्तन होता है, जिससे श्रद्धा, करुणा, प्रेम आदि भाव उत्पन्न होते हैं, मन में निश्छलता और बुद्धि में प्रखरता आती है। आस्थापरक भारतीय संस्कृति के मूलभूत विषय हैं- अध्यात्म, धर्म, दर्शन, साहित्य, कला आदि तथा ज्ञान-विज्ञान के अन्य अनेक क्षेत्र।आस्था के कारण ही स्वयं के तथा अन्य के अस्तित्व का बोध होता है। आस्था के कारण ही मानव मानव है, अन्यथा अन्य प्राणियों और उसमें अंतर ही क्या हो सकता है! आस्था का सम्बन्ध केवल चरित्र से नहीं, आचरण और व्यवहार से भी है। आस्था ही समग्र प्रगति का कारण है। यह प्रगति चाहे भौतिक क्षेत्र में विज्ञान आदि के द्वारा हो अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में ज्ञान और अनुभूति के द्वारा हो अथवा साहित्य, कला, धर्म आदि के द्वारा हो।

वर्तमान समय में अतिभौतिक सोच, यांत्रिकता का बढ़ता प्रभाव, फैशन और पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण सभी प्रकार के मानवीय नैतिक मूल्यों का विघटन,साहित्य में अध्ययन और गंभीर चिंतन का अभाव, मीडिया का बढ़ता प्रभाव, शिक्षा का व्यावसायीकरण आदि आस्थावान साहित्य साधक, चिंतक, कलाधर्मी, आध्यात्मिक संत को व्यथित कर रहे हैं। अनास्था के कारण व्यक्तित्व खंडित हो रहे हैं। वर्तमान पीढ़ी को इस विघटनकारी स्थितियों से बचाने का कार्य सच्चे साहित्य धर्मी और समाज सेवी कर सकते हैं ताकि भविष्य की पीढ़ी का चरित्र निर्माण हो सके। आज की पीढ़ी सरलता और सुगमता का मार्ग तलाशती है।

आस्था का मार्ग निर्भयता, दृढ़ता, साहस और निष्ठा का मार्ग है, जिसमें व्यवधान भी आ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी आ सकती हैं, संघर्ष भी करने पड़ सकते हैं, परन्तु अन्त में सत्य ही विजयी होगा, इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। सामान्य जन में धैर्य की कमी होती है। समाज के अनेक क्षेत्रों में ढोंग, कुरीतियाँ, जातिवाद,भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अन्याय, बेईमानी आदि का बोलबाला है। इन सबके निवारण के लिए आस्थापरक चिंतन और उसके क्रियान्वयन की आज बहुत आवश्यकता है।

अध्यात्म, धर्म, सत्साहित्य- ये परस्पर सापेक्ष हैं। जितने भी मानवीय मूल्य हैं, सभी का समावेश अध्यात्म, धर्म और साहित्य में होता है। साहित्यकार पर समाज का बड़ा दायित्व होता है। वह भविष्य के समाज की संघटना का भी जिम्मेदार सर्जक होता है। एक आस्थावान रचनाकार ही सजग होकर अपने दायित्वों का निर्वहन निष्ठापूर्वक कर सकता है क्योंकि लेखन कोई व्यापार नहीं होता। यह चमत्कार या मनोरंजन का साधन भी नहीं होता। लेखन एक दिव्य कर्म है, सच्चे साहित्य साधक द्वारा यह अभिव्यक्ति पाता है।

आज भारतीय संस्कृति के पुरोधा चाहते हैं कि हमारा साहित्य, हमारी संस्कृति का श्रेष्ठ संवाहक बने और सम्पूर्ण विश्व को मानवीय नैतिक मूल्यों के लिए प्रेरित कर सके। हमारी सांस्कृतिक चिंतनधारा सदैव धर्म सापेक्ष रही है। मानव जीवन के लिए जो भी श्रेष्ठ है, मन- वचन- कर्म से जो भी सर्वोच्च और श्रेष्ठ कार्य, कर्तव्य या आचरण है, वही धर्म है। आज धर्म का अभिप्राय पंथ, मज़हब या सम्प्रदाय से लिया जा रहा है, जो उचित नहीं है। हम पंथ निरपेक्ष हो सकते हैं, दल निरपेक्ष हो सकते हैं, सम्प्रदाय निरपेक्ष हो सकते हैं लेकिन धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि की सर्वोत्तम उपलब्धियों का नाम धर्म है। हम धर्म से निरपेक्ष होकर अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान खो देंगे।

धर्म सापेक्षता हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। क्षणिक स्वार्थ के लिए धर्म को लड़ाई का मुद्दा बना लेना निंदनीय है। धर्म की लड़ाई अधर्म से हो सकती है, धर्म से नहीं। हमारी संस्कृति में धर्म प्राणि सापेक्ष है, मानव सापेक्ष है। मानवता की अचारसंहिता है। धर्म के विषय में हमारी सोच इतनी व्यापक और इतनी उदार होनी चाहिए कि हम गर्व के साथ कह सकें कि धर्म का वास्तविक स्वरूप जीवनधारा की भाँति सतत प्रवहमान और पावन है। धर्म केवल ग्रंथो और पोथियों में ही अंकित नहीं होता, वह मानवता की उन्नति में निरंतर सहायक होता है और मानव के कल्याण के लिए एक गतिशील पवित्र साधन भी होता है। अध्यात्म मानव के श्रेष्ठ चरित्र का उन्नायक है और धर्म मानव के श्रेष्ठ आचरण का। इन दोनो का उद्घोषक और प्रचारक है श्रेष्ठ साहित्य।

भारतीय संस्कृति का ठोस धार्मिक और आध्यात्मिक आधार रहा है, इसीलिए इसकी गरिमा आज भी. सुरक्षित है। भारत की सनातन संस्कृति का विश्व के साहित्य पर प्रभाव रहा है। विश्व की प्राय:सभी भाषाओं में हमारे आर्ष ग्रंथों का अनुवाद हुआ है। हमारे श्रेष्ठ सर्जकों-विचारकों के प्रदेय पर शोधपरक कार्य हुए हैं।
इन सभी उपलब्धियों के. मूल. में है भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप और सर्वोत्तम मानवीय चिन्तन।

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रचनाकार परिचय

मिथिलेश दीक्षित

ईमेल : mithileshdixit01@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

नाम- डॉ० मिथिलेश दीक्षित
जन्मतिथि
- 1 सितम्बर, 1946नाम- डॉ. मिथिलेश दीक्षित
जन्म स्थान- इटावा ( ननिहाल ) उ. प्र. 
शिक्षा- एम . ए . हिन्दी ( प्रथम श्रेणी ), एम . ए . संस्कृत ( प्रथम श्रेणी ), पीएच.डी.। 
सम्बद्धता- अनेक संस्थाओं - संस्थानों की संरक्षक, ट्रस्टी, अध्यक्ष, सचिव, महासचिव, परामर्शक, आजीवन सदस्य, अनेक पत्र-पत्रिकाओं की संरक्षक, परामर्शक तथा आजीवन सदस्य।
प्रकाशन
1. निबन्ध, शोध, समीक्षा, सन्दर्भ, कोश, साक्षात्कार, काव्य आदि से सम्बन्धित पचहत्तर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित एवं अनेक प्रकाशनाधीन। 
2. पाँच हज़ार से अधिक लेख, निबन्ध, कविताएँ, साक्षात्कार आदि राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 3. अनेक पुस्तकों की भूमिकाएँ एवं समीक्षाएँ प्रकाशित। 
4. अनेक राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ-ग्रन्थों, इतिहास-ग्रन्थों, कोश ग्रन्थों में परिचय प्रकाशित। 
सम्पादन- अनेक पुस्तकों का सम्पादन। अनेक पत्रिकाओं का सम्पादन एवं विशेष अंकों का अतिथि संपादन।
समीक्षात्मक-शोधात्मक कार्य
1. डॉ. मिथिलेश दीक्षित की हाइकु रचनाधर्मिता को समर्पित 'हाइकु भारती' विशेषांक 2001 
2. डॉ. मिथिलेश दीक्षित की रचनाधर्मिता पर विभिन्न विद्वानों द्वारा आठ ग्रन्थ प्रकाशित। 
3- हाइकु साहित्य एवं क्षणिका साहित्य पर कतिपय शोधकार्य सम्पन्न।
अन्य- भाषा एवं साहित्य के उन्नयन एवं प्रचार प्रसार हेतु सात देशों की यात्राएँ। सोशल मीडिया में निरन्तर सक्रिय। 
सम्मान- भारत में 200 से अधिक सम्मान तथा अनेक मानव उपाधियाँ। मॉरीशस, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, वियतनाम में स्तरीय सम्मान। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पत्रकारिता में दो बार और समग्र साहित्य पर साहित्य भूषण (2 लाख की धनराशि सहित) सम्मान प्राप्त। 
सम्पर्क- जी- 91, सी, संजयगान्धीपुरम लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
पिन कोड- 226016
मोबाइल- 6389178793