Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
रंजना जायसवाल की कहानी 'लड़के की माँ'

कुछ दिनों पहले ही नाडी ने पड़ोसी के मुख्य द्वार पर बनी सूखी नाली में बच्चे दिए थे शायद नाडी अपने बच्चों को छोड़कर खाने-पीने की तलाश में निकली थी। उसके बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे और माँ की तलाश करते-करते सड़कों पर निकल आए थे। वह कुटकुट के शरीर के पास ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे किसी बच्चे की गुल्लक अचानक से टूट गई हो और सिक्के सड़क पर बिखर गए हों। कुटकुट के लिए वह गुल्लक के सिक्के ही तो थे, जो उसे ख़ुशी दे गए थे। कुटकुट मुझे जिस तरह से देख रही थी कि मेरा मन भर आया।

उर्मिला आचार्य की कहानी "शुद्धिकर्म"

शहर, भीतर-भीतर घना हो रहा था। घास के मैदान गायब होते जा रहे थे। अब तो साहबों के बंगले पर या खेल के मैदान तक ही रह गए थे जिसके कारण शहर से तीन चार किलोमीटर दूर जाकर साइकिल पर चारा लाना ले जाना पुन्नू के लिए कठिन हो गया था।

विनीता शुक्ला की कहानी 'विश्रांति'

स्मृतियाँ अपने कपाट फटफटाने लगीं। संध्या का झुटपुटा उनको जकड़ने लग गया। जान पड़ा मानों कल की कुहरीली सांझ, पुनः जीवंत होकर; अभिशप्त परछाइयों के पंजे फैला रही हो। उस दुर्घटना को 24 घंटे भी न बीते होंगे। इसी क्लब हाउस के चौराहे से बमुश्किल सात फीट की दूरी पर वह अप्रत्याशित काण्ड हुआ था। एक लापरवाह-सा नौजवान, अपनी बेकाबू हो चुकी बाइक को लेकर रंधीर की कार से जा भिड़ा। ग़लती उस युवक थी; फिर भी अपराधी वे बने।

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'अमलतास के फूल'

वाश वेसिन के शीशे में स्वयं को देखते हुए मैं सोचने लगी कि घर से बैंक और बैंक से घर की दिनचर्या में समय कब इतना आगे बढ़ गया? मुझे आभास तक न हुआ कि मैं उम्र की तिरपन सीढ़ियाँ पार कर चुकी हूँ। उफ्फ! तिरपन वर्ष? यह तो समय की एक बड़ी अवधि है।