Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
राजेश अरोड़ा की कहानी 'और फिर'

हमेशा जीवंत रहने वाली मेरी कॉलोनी की आवाज़ गुम हो गई थी। हाँ, लेकिन कोयल के बोलने के स्वर अब बिलकुल साफ सुनाई पड़ने लगे थे, बुलबुलें भी ज़्यादा आने लगी थीं। पार्क ख़ाली था, झूलों पर बच्चे नहीं थे, बेंच पर बूढ़े अख़बार नहीं पढ़ रहे थे। आज रामनवमी है, कहीं कन्या भोज का आयोजन नहीं हो रहा।

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की कहानी 'आख़िरी हँसी'

गँवई-गाँवों में ज़्यादातर लोगों के नामों के शुरुआती शब्दों को तोड़-मरोड़, काट-छाँटकर कहने- बोलने का चलन सदियों से है। दरअसल इससे कहने-बुलाने में बड़ी सुविधा और सरलता होती है और आत्मीय निकटता मानी-समझी जाती है। मसलन, राजेश को रज्जू, रमेश को रम्मू, बड़े बेटे को बड़कुर, बड्डू या बड़का, छुटके को लहुरा, छोटू या चुट्टू। लड़कियों के नामों की भी काट-छाँट कर दी जाती है। सीता- सितिया हो जाती है, पूर्णिमा- पुनिया और शीला- सिल्ली।

हंसा दीप की कहानी- बैटरी

प्रकृति के इस रूप का सामना करने के लिए इंसान को बहुत तैयारी करनी पड़ती। कभी-कभी जब इंसानी मस्तिष्क से चूक हो जाए तो लोग “आ बर्फ, मुझे जमा कर देख” की तर्ज पर सोफी की तरह जानबूझ कर बर्फीले मौसम को चुनौती देने की गलती कर बैठेते। सोफी का हठ कहें या फिर मजबूरी, वह इस जानलेवा मौसम में हाईवे पर है, गाड़ी में। कल उसे ज्वाइन करना है। जाना जरूरी है। 

शशि श्रीवास्तव की कहानी- घर

काश उसके पैदा होते ही माँ की बीमारी से वह भी संक्रमित हो जाती। दादी उसे बकरी का दूध पिला कर ना पालती, मरने देती। ना वह होती ना उसे घर की तलाश होती। घर जहां जिंदगी साँस लेती है। हँसती है। मुस्कुराती है। ऐसे घर की आरजू सबको होती है। पर मिलता किसी किसी को है।