Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
अनिता रश्मि की कहानी 'बंद दरवाज़े के पार'

अनिता रश्मि जी यह कहानी अजनबीयत और अकेलेपन से शुरू होती है, और अपनेपन तथा संवेदनाओं से साथ ख़त्म। कहानी क्या है, हमारे दौर में पनपती एक अजीब-सी संस्कृति का चित्र खींचा है रचनाकार ने और बताने का प्रयास किया है कि इस 'गैप' को कैसे भरा जा सकता है। संवेदनाओं से, अपनत्व से लेकिन बिना जज किये, बिना बात बनाए, केवल मज़बूरी को समझते हुए। दरअसल शहरी कल्चर में सबकी एक कहानी है और वह कहानी शायद लज्जा अथवा उपहास के डर से हमें अलग-थलग किए दे रही है। यह कहानी इसी अलग-थलग पड़ते समाज को जोड़ने की कोशिश में एक 'टूल' थमाती है हमारे हाथों में। संवेदनशीलता का टूल।

सुशांत सुप्रिय की कहानी 'एक उदास सिम्फ़नी'

सुशांत सुप्रिय हिन्दी कथा-कविता में अपनी एक अलग और अलहदा जगह रखते हैं। अलग शैली और अलग तरह की भाषा के ज़रिए वे अपनी रचनाओं में एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहाँ सबकुछ धुँधला-सा लेकिन एकदम स्पष्ट होता है। ये दुनिया अपने समानांतर कहानी की दुनिया से बहुत अलग दिखती है और पाठक को पूरी तरह बाँध के रखती है। इनकी काव्यात्मक भाषा आकर्षित ही नहीं, सम्मोहित भी करती है।

कहानी 'एक उदास सिम्फ़नी' एक बेरोज़गार युवक का प्रेम और कैरियर के बीच का द्वंद्व लिए हुए है, जहाँ प्रेम बाक़ी तमाम मुश्किलों पर भारी पड़ता दिखता है। यहाँ एक-दूसरे में गडमड दो प्रेमी हैं, जो कविता के ज़रिए जुड़े हैं और अपने प्रेम को कविता की ही तरह जीते हैं। कहानी अपने समय और जीवन की जीवंत तस्वीर बुनती है, जिसमें एक देश को खोखला व परेशान करते सभी क़िस्से हैं। इन तमाम क़िस्सों पर, तमाम दुविधाओं पर प्रेम का रंग सुकून की चादर तान देने का प्रयास करता है।

- के० पी० अनमोल

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'एक तितली का जीवन'

मैंने और आन्या ने जैसे ही तारा के आँगन में प्रवेश किया, तारा को व्हीलचेयर पर बैठकर कमरे की ओर जाते हुए देखा। आन्या की चीख निकल गयी। आश्चर्यचकित मैं भी थी। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था कि तारा से क्या कहूँ? मुझे और आन्या को देखकर एक अपरिचित-सी मुस्कान लिए तारा अपने कमरे में चली गयी।

शुभदा मिश्र की कहानी 'वह कोहिनूर'

इतना ज़रूर जानती हूँ कि जिनके भीतर यह कोहिनूर दमकता रहता है, वह कुछ न कुछ कर गुज़रते हैं। यह मेरा अनुभूत सत्य है कि जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ थीं, उन्हें जब बड़ी ज़िम्मेदारियाँ मिलीं तो संभाल नहीं सके। लड़खड़ा गये। गिर गये। जिनके पास ऐसी भारी डिग्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने सुमेरू हथेली में उठा लिया। उनके भीतर उस कोहिनूर का प्रकाश था।