Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'एक तितली का जीवन'

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'एक तितली का जीवन'

मैंने और आन्या ने जैसे ही तारा के आँगन में प्रवेश किया, तारा को व्हीलचेयर पर बैठकर कमरे की ओर जाते हुए देखा। आन्या की चीख निकल गयी। आश्चर्यचकित मैं भी थी। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था कि तारा से क्या कहूँ? मुझे और आन्या को देखकर एक अपरिचित-सी मुस्कान लिए तारा अपने कमरे में चली गयी।


"मम्मी, मैं बैंक जा रही हूँ। समय हो गया है। ओके....बाय।" कहती हुई मेरी बेटी आन्या ने स्कूटर स्टार्ट किया और गेट के बाहर निकल गयी। आन्या के जाने के पश्चात सहसा मुझे ध्यान आया कि कल शाम को तारा का फोन आया था कि वो आज आन्या से मिलने घर आएगी। यह बात मैंने आन्या से कल बता दी थी। आज भी बता देती तो ठीक रहता। आन्या इतनी हड़बड़ी में रहती है कि उसे यह बात इस समय स्मरण होगी या नहीं, कुछ नहीं कह सकती। हड़बड़ी इसलिए कि आन्या की नौकरी मात्र दो माह पुरानी है। वो बैंक में एडजस्ट कर रही है बल्कि कर चुकी है। किन्तु हड़बड़ाहट अभी भी बनी रहती है कि कहीं देर न हो जाए। कोई बात नही। अभी आन्या बैंक जाकर मुझे अपने पहुँच जाने की सूचना देगी, उसी समय तारा के आने की बात उसे पुनः स्मरण करा दूँगी।

आन्या ने मुझे फोन किया तो मैंने उसे शाम को तारा के आने की बात भी बता दी। तारा के आने की बात से मुझे बहुत खुशी हो रही थी। कितने दिनों के पश्चात तारा आज आएगी। उसके जीवन में, उसकी सफलता में आन्या का कितना योगदान है, सोचकर मुझे अपनी बेटी पर गर्व हो रहा था। किन्तु उससे अधिक गौरवान्वित तो मैं ये सोचकर हो रही हूँ कि तारा ने कितने साहस-परिश्रम से अपने जीवन को उन ऊँचाईयों तक पहुँचाया है, जिन पर अच्छे-अच्छे लोग भी कठिनाई से पहुँच पाते हैं।

घर के काम करते-करते मैं स्मृतियों के उन शुष्क जंगलों में विचरण करने लगी, जिनसे होकर मेरा और तारा का परिवार गुज़रा है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो घने कोहरे वाले दिन थे, जिसमें चारों ओर अंधकार-सा छाया था। ऐसा महसूस होता था कि वो कोहरा कभी छँटेगा भी या नही। ये संशय की स्थिति लगातार बनी रही? कितने कठिन दिन थे वे! बस स्मृतियों में वो दिन बने हुए हैं। मेरे नेत्रों के समक्ष तारा और आन्या के बचपन के वो दिन सजीव होने लगे।
"मम्मी, मैं स्कूल जा रही हूँ। तारा आ गयी है।" मेरी बेटी आन्या ने थोड़ी तेज आवाज़ में मुझसे कहा ताकि उसकी आवाज़ रसोई में मुझ तक पहुँच सके। आन्या की आवाज़ मुझ तक आयी और मैं पल्लू में हाथ पौंछती हुई बाहर आँगन में आ गयी। आन्या की सहेली तारा बैग लेकर आँगन में बिछी तख़्त पर बैठी थी।
"ठीक है, तुम दोनों ध्यान से जाना। लंच कर लेना।" मैंने कहा।
दोनों बच्चियाँ एक साथ बाहर निकलीं। प्रतिदिन की भाँति मैं उन्हें गेट तक छोड़ने आयी। दोनों को एक साथ जाते हुए दूर तक देखती रही। इसी सड़क के उस पार कुछ दूर उनका काॅलेज है। मेरे घर के पास-पड़ोस के अधिकांश बच्चे वहाँ पढ़ते हैं। काॅलेज तक पैदल आराम से आते-जाते हैं। वो काॅलेज एक इण्टर काॅलेज है। तारा मेरे पड़ोस में रहती है।

मेरी बेटी आन्या और तारा प्रारम्भ से एक ही क्लास में पढ़ती हैं। पहली कक्षा से ही दोनों एक साथ आते-जाते मित्र बन गयी हैं। कभी तारा को आने में विलम्ब हो जाता है दो-चार मिनट तो आन्या उसे बुलाने चली जाती है। कभी आन्या को तैयार होने में कुछ मिनट का विलम्ब हो जाता है तो तारा मेरे घर आ जाती है। मुझे भी आन्या और तारा के एक साथ आने-जाने में बहुत सुकून मिलता है। किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती है। मैं जानती हूँ कि वे दोनों एक साथ आती-जाती हैं तो एक-दूसरे का ध्यान भी रखती हैं।

दोनों इस वर्ष आठवीं कक्षा में हैं। बच्चियाँ है। शरीर थोड़ा बड़ा अवश्य हो जाता है किन्तु मन में एक बच्चा बना रहता है। तारा की मम्मी भी बहुधा मेरे घर आकर तारा की पढ़ाई के बारे में आन्या से पूछती रहती हैं।
"आण्टी, तारा की मैथ्स थोड़ी वीक है। बाकी सारे सब्जेक्ट्स में उसका मन लगता है।" मेरी बेटी आन्या तारा की मम्मी से बताती।
दोनों ने इस वर्ष आठवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। आज परीक्षा परिणाम का रिपोर्ट कार्ड मिलने वाला था। आन्या प्रतिदिन से पूर्व ही स्कूल जाने के लिए आज तैयार होने लगी।
"मम्मी, मेरी चोटी कर दो। आज रिजल्ट मिलने वाला है। तारा तैयार होकर आ रही होगी।" आन्या कंघी और रिबन लेकर मेरे पास आकर खड़ी हो गयी।
"लाओ, तुम्हारी चोटी कर दें। अभी स्कूल जाने में बहुत समय है।" कहकर मैं आन्या की चोटी बनाने लगी। मैंने भी सोचा कि अभी बनाऊँ या दस मिनट बाद, चोटी बाँधने का काम मुझे ही करना है तो कर दूँ।
"आन्या बिटिया.....आन्या बिटिया, कहाँ हो?" मैं आन्या की चोटी बना ही रही थी कि तारा की मम्मी की आवाज़ सुनकर मेरी बेटी अधबनी चोटी पकड़कर बाहर निकल गयी।
"क्या बात है आण्टी?" आन्या ने तारा की मम्मी से पूछा।
"आज तारा स्कूल नहीं जाएगी बेटा। उसे बुखार है। तुम उसका रिपोर्ट कार्ड ले लेना। मैंने क्लास के वाट्सएप ग्रुप में डाल दिया है कि तारा का रिपोर्ट कार्ड आन्या को दे दिया जाए। ठीक है बेटा।" तारा की मम्मी ने कहा।
"जी आण्टी, ले लूँगी।" आन्या ने कहा।
तारा की मम्मी चली गयीं। तारा के न जाने से आन्या के चेहरे पर थोड़ी निराशा आ गयी थी। उसे आज अकेले जो स्कूल जाना पड़ेगा।

"मैं गेट पर खड़ी हो जाती हूँ। कई लड़कियाँ इस मुहल्ले से स्कूल जाती हैं। तुम बैग लेकर आओ। मैं उन्हें रोकती हूँ। तुम साथ में निकल जाना।" कहकर मैं गेट पर आकर खड़ी हो गयी। मुझे खड़े हुए दो मिनट भी न हुए थे कि उसी स्कूल की दो लड़कियाँ एक साथ मुझे जाती दिखाई दीं।
"अरे बेटा, रूको इसको भी साथ लेती जाओ।" मैंने रोकते हुए उन लड़कियों से कहा।
"हाँ आण्टी, आओ आन्या चलो।" उनमें से एक लड़की ने कहा।
"तुम लोगों ने बैग नही लिये हैं?" उन दोनों के हाथ में बैग न देखकर मैंने पूछा।
"नहीं आण्टी। आज बैग लेकर नहीं जाना है। आज रिपोर्ट कार्ड बाँटकर छुट्टी हो जाएगी।" उस लड़की ने कहा।
"तुमने इतना भारी बैग क्यों ले लिया है?" आन्या के कंधे पर बैग देखकर उस लड़की ने कहा।
"एक काॅपी या एक पाॅलीथीन ले लो। उसी में रिपोर्ट कार्ड रख लेना।" उनमें से एक लड़की ने सुझाव दिया।
मैं तीव्र कदमों से भीतर गयी और एक पाॅलीथीन लेकर आन्या को लाकर दिया। आन्या उनके साथ जाने को तत्पर हुई।
"तारा का रिपोर्ट कार्ड ले लेना।" मैंने आन्या से कहा।
"ठीक है मम्मी। याद है।" कहती हुई आन्या उन लड़कियों के साथ स्कूल की ओर जाने लगी। मैं कुछ देर खड़ी रहकर प्रतिदिन की भाँति उसे जाते हुए देर तक देखती रही।

लगभग एक घंटे के पश्चात् आन्या स्कूल से घर आ गयी। अपना रिपोर्ट कार्ड मुझे दे दिया।
"इसी हाथ से तारा का रिपोर्ट कार्ड उसके घर देकर आ जाओ। फिर भोजन आदि करो।" मैंने आन्या से कहा।
आन्या लगभग दौडती हुई तारा के घर गयी। मेरे घर से दो घर छोड़कर तारा का घर है। तारा के घर उसका रिपोर्ट कार्ड देकर पाँच मिनट में आन्या घर आ गयी।
"मम्मी, तारा को बहुत तेज बुखार है। इस समय वह सो रही थी। मैंने उसकी मम्मी को रिपोर्ट कार्ड दे दिया और चली आयी।" मेरे पूछने से पूर्व ही आन्या ने सारी बातें मुझे बता दीं।
"ठीक है। एक-दो दिन में ठीक हो जाएगी। वैसे स्कूल कब से जाना है?" मैंने आन्या से कहा।
"दो दिनों के अवकाश के पश्चात स्कूल खुल जाएगा। मैं और तारा दूसरे क्लास मतलब नौवीं कक्षा में जाएँगे।" आन्या ने खुश होते हुए कहा।
"चलो ठीक है। दो दिनों में तारा का बुखार भी ठीक हो जाएगा। तुम अपनी नयी बुक्स, काॅपी के साथ बैग तैयार कर लेना।" मैंने आन्या का रिपोर्ट कार्ड देखते हुए कहा। आन्या के नम्बर अच्छे आये थे। नौंवी कक्षा में उसे अपनी रूचि के विषय लेने होंगे। उसकी जिसमें रूचि होगी, वो विषय लेकर आगे की पढ़ाई
करेगी। नयी कक्षा का बैग-बस्ता तैयार करने में ही आन्या के दो दिन बीत गये।

"कल से स्कूल जाना है। नौवीं का क्लासरूम आठवीं वाली क्लासरूम से अच्छा है। कल से हमें वहीं बैठना होगा।" आन्या ने खुश होते हुए कहा।
"ठीक है। किताबें-काॅपियाँ सब पूरी आ गयी हैं।" मैंने आन्या से कहा।
"जी मम्मी।" आन्या ने कहा।
"पेन, पेन्सिल, कलर बाक्स, ड्राईंग की काॅपी सबकुछ है?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा।
"ओ मम्मी! आप भी! मैं छोटी बच्ची हूँ क्या, जो आधा सामान काॅलेज नही ले जाऊँगी? अब मैं काॅलेज में चली गयी हूँ।" कहकर आन्या भी हँस पड़ी।
अगले दिन आन्या जाने के लिए तैयार होेने लगी। ड्रेस, जूते-मोजे आदि पहनकर पूरी तरह तैयार होकर रिबन और कंघी लेकर मेरे पास आयी।
"मम्मी, चोटी बना दो।" आन्या ने कंघी मुझे पकड़ते हुए कहा। उसकी बात सुनकर मैं मुस्करा पड़ी।
"मैं समझ गयी कि आप क्यों हँस रही हैं। यही न कि मैं नौवीं क्लास में गयी और अपनी चोटी नही बना रही हूँ। इस बार की छुट्टियों में मैं चोटी बनाना सीख लूँगी।" आन्या ने मासूमियत भरे गुस्से में कहा।
"नही, मैं रोज़ चोटी बना दिया करूँगी।" मैंने कहा।
"तारा आयी नहीं, मैं ही चली जाऊँ क्या उसके घर? हो सकता है उसे तैयार होने में कुछ समय लग रहा हो?" आन्या ने मुझसे पूछा।
"चली जाओ। टाइम हो गया है। बच्चे तो स्कूल जाते हुए दिखने लगे हैं।" मैंने कहा।
"ठीक है।" कहकर आन्या चली गयी।
मैं शीघ्रता से घर के काम करने में जुट गयी। दस मिनट भी न हुए थे कि आन्या वापस आ गयी।
"तारा को बुखार ठीक नही हुआ है। उसकी मम्मी बता रही थीे कि इतना तेज बुखार है कि उससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा है। उसे डाॅक्टर के यहाँ दिखाने लेकर जा रहे हैं।" तारा ने कहा।
"मम्मी, मुहल्ले की लड़कियाँ जा रही हैं, मैं उनके साथ निकल जा रही हूँ। उन्हीं के साथ वापस भी आ जाऊँगी। आप फिक्र न कीजिएगा।" कहते हुए आन्या ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखा।
"ठीक है जाओ।" मैंने कहा।
"मम्मी, आप तारा के घर जाकर उसकी तबियत पूछ सकती हैं? वो स्कूल नहीं जा रही है तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।

"नये क्लास में तो एक दिन भी उसकी अटेण्डेंस नहीं लगी।" लगभग सप्ताह भर ही हुए थे स्कूल खुले कि आन्या ने मुझसे कहा।
"मैं आज ही शाम तक उसके घर जाकर उसका हालचाल ले आऊँगी। किन्तु तुम्हें तो कोई परेशानी नही है अकेले जाने में?" मैंने आन्या से पूछा।
"नहीं मम्मी, मुझे तो अपने घर के दरवाजे से ही मुहल्ले की लड़कियाँ आती-जाती मिल जाती हैं। मैं उनके साथ आराम से चली जाती हूँ।" आन्या ने कहा।
"ठीक है। मैं आज शाम तक उसके घर जाऊँगी।" मैंने आन्या से कहा।
मेरी बात से संतुष्ट होकर आन्या अपने पढ़ने वाले कक्ष में चली गयी। काॅलेज खुले सप्ताह-दस दिन भी नहीं हुए कि उनकी टेस्ट की डेट बता दी गयी है। अतः आन्या स्वतः थोड़ा मन लगाकर पढ़ रही है। उसे पढ़ने के लिए किसी को कहने की आवश्यकता नही है।

शाम को मैं तारा के घर गयी।
"बैठिए बहन जी।" कहते हुए तारा की मम्मी रोने लगीं।
"तारा की तबियत अधिक खराब है क्या?" उनको चुप कराते हुए मैंने कहा।
"हम तो जीते जी मर गये बहन जी। अब हमारी बेटी कभी स्कूल नही जा पाएगी।" कहते हुए तारा की मम्मी अपने मुँह को साड़ी के आँचल से दबाकर रोने लगी।
वे बार-बार उस कमरे में देख रही थीं, जिसमें तारा लेटी थी। उनकी बात तारा सुन न ले, इस कारण धीरे-धीरे बताने लगीं।
"बहन जी, अब मेरी तारा कभी चल नहीं पाएगी। डाॅक्टर बता रहे थे कि उसके पैरों में पोलियो जैसी कोई बीमारी हो गयी है। अब वो चल पाएगी भी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। इलाज चलेगा।" कहकर तारा की मम्मी धीरे-धीरे सिसक कर रोने लगीं। ताकि तारा सुन न सके।
"बहन जी, साहस से काम लीजिए। तारा का उपचार चल रहा है। वो ठीक हो जाएगी। आपको परेशान देखकर वो भी परेशान हो जाएगी। सब ठीक हो जाएगा बहन जी।" कहते-कहते मैं तारा की मम्मी के गले लग गयी। मेरे भी अश्रु बहने लगे।

कुछ देर तारा के घर बैठने के पश्चात् मैं घर आ गयी। उस वर्ष तारा काॅलेज नहीं गयी। मेरी बेटी को मैथ्स पसन्द था अतः उसने नौवीे क्क्षा में अन्य विषयों के साथ मैथ्स भी रखा। उसे पता चल गया था कि तारा अस्वस्थ है। इस वर्ष वह काॅलेज नहीं जाएगी। आन्या को यह बात पता थी किन्तु आन्या यह नहीं जान पायी कि उसका चलना-फिरना कठिन हो गया है। जब भी वो तारा से मिलने गयी, वो उसे बेड पर बैठी मिली। न मैंने आन्या को तारा के बारे में कुछ अधिक बताया, न कदाचित् तारा की मम्मी ने बताया होगा। नौवीं कक्षा में आन्या अच्छे अंकों में उत्तीर्ण हो गयी। मैथ्स में मेरी आशा से अच्छे नम्बर आये थे।
"ठीक है। अब तुम दसवीं कक्षा में चली गयी। इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा होगी।" मैंने खुश होते हुए आन्या से कहा।
"हाँ मम्मी, पता है। मुझे मन लगाकर और मेहनत करनी है, ये भी पता है।" आन्या की बात सुनकर मैं मुस्करा पड़ी।

अप्रैल महीने की पहली तारीख से नये सत्र का प्रारम्भ हो गया था। पहले दिन आन्या काॅलेज चली गयी।
"मम्मी, तारा इस वर्ष भी काॅलेज नहीं जाएगी क्या?" आन्या ने स्कूल के लिए निकलने से पहले मुझसे पूछा।
"मुझे नहीं पता बेटा। अभी काॅलेज जाओ। जब शाम को आना तब पूछते हैं उसकी मम्मी से।" मैंने आन्या से कहा।
शाम को आन्या काॅलेज से घर आयी और कहने लगी कि मम्मी मेरी फ्रैण्ड तारा को उसकी कुछ सहेलियाँ पूछ रही थीं। अभी चल के उससे पूछ लें कि वो कब से काॅलेज जाएगी?
"ठीक है चलो। वहाँ से आकर ड्रेस चेंज कर हाथ-मुँह धोना। मुझे वापस आकर शाम के भोजन की तैयारी करनी है।" मैंने आन्या से कहा।
"ठीक है मम्मी, जल्दी चलते हैं। उससे पूछकर आ जाऊँगी। रूकूँगी नहीं।" आन्या ने कहा।

मैंने और आन्या ने जैसे ही तारा के आँगन में प्रवेश किया, तारा को व्हीलचेयर पर बैठकर कमरे की ओर जाते हुए देखा। आन्या की चीख निकल गयी। आश्चर्यचकित मैं भी थी। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था कि तारा से क्या कहूँ? मुझे और आन्या को देखकर एक अपरिचित-सी मुस्कान लिए तारा अपने कमरे में चली गयी। मैं सोच रही थी कि तारा अब कुछ ठीक हो गयी होगी। और दीवार आदि पकड़कर धीरे-धीरे चल ले रही होगी। हम लोगों की आवाज़ सुनकर तारा की मम्मी तुरन्त कमरे से बाहर आती दिखाई दीं।
"आइए, बैठिए बहन जी।" कहते हुए प्लास्टिक की दो कुर्सियाँ लेकर आयीं।
"आप भी बैठिये।" कहते हुए हम दोनों बैठ गये।
तारा की मम्मी वहीं पर बिछे तख्त पर बैठ गयीं।
"अब कैसी है तारा की तबियत।" मैंने पूछा।
"डाॅक्टर कह रहे हैं कि उसके पैरों की नसों में खून नहीं जा पा रहा है। नसें सूख रही हैं।" कहते-कहते तारा की मम्मी रोने लगी। हमारी बातें आन्या सुन रही थी। वह चुप थी। उसके चेहरे पर दुःख के भाव थे। उसके लिए तारा का ये रूप नया था। आन्या को इतना सब नहीं पता था। नया तो मेरे लिए भी था ये सबकुछ। मुझे नहीं पता था कि तारा अब चल नहीं पाएगी। मैं नाहक ही आन्या को यहाँ लेकर आयी। वो तो ऐसे बैठी थी, जैसे रो पड़ेगी। कुछ देर और बैठने के पश्चात हम चले आये।

"मम्मी, तारा कभी चल नहीं सकेगी?" घर आकर आन्या ने मुझसे पूछा।
"पता नहीं बेटा। उपचार तो चल रहा है। चलो तुम चेंज कर के नाश्ता आदि कर लो।" मैंने आन्या से कहा।
आन्या हाथ मुँह धोकर नाश्ते की मेज पर बैठ गयी थी।
"मम्मी तो क्या तारा की पढ़ाई छूट जाएगी?" आन्या अब तक तारा के बारे में ही सोच रही थी। मैं पुनः वही बात सोचने लगी कि मैं नाहक तारा के घर उसे लेकर गयी। आन्या के कोमल मन से उसकी याद नहीं जा रही है।
"तारा ठीक हो जाएगी। यदि नहीं भी चल पायी तो क्या व्हीलचेयर पर बैठकर लोग पढ़-लिख कर बड़ी नौकरियों में नहीं जाते हैं? तारा भी सब कर लेगी। बस उसे थोड़ा समय चाहिए।" मैंने आन्या का मन हल्का करने के लिए समझाते हुए कहा।

"मम्मी, तारा की पढ़ाई छूट जाएगी तो उसका जीवन तो कठिन हो जाएगा?" दो-तीन दिन स्कूल जाने के पश्चात एक दिन आन्या ने मुझसे कहा।
"हाँ, वो तो है। अब भगवान की इच्छा के आगे किसकी चलती है।" मैंने कहा।
"अच्छा बेटा, अब मैं तुम लोगों के कपड़े रखने जा रही हूँ।" कहते हुए मैं बच्चों के कमरे में कपड़े रखने चली गयी। मैं आन्या के पास से इसलिए भी हट गयी कि आन्या अक्सर तारा की बातें करने लगी थी। मैं जानती थी कि तारा आन्या की मित्र है। बचपन से ही दोनों एक साथ खेलती बड़ी हुईं। उनकी पढ़ाई भी एक साथ शुरू हुई। एक साथ स्कूल आना-जाना था। आन्या द्वारा उसकी चर्चा स्वाभाविक है। किन्तु मैं चाहती हूँ कि आन्या अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान दे। उसकी पढ़ाई बाधित न हो। इस वर्ष दसवीं की बार्ड की परीक्षा है उसकी। तारा के लिए उसके मन में संवेदना है, वो तो ठीक है। किन्तु इस उम्र में इतनी संवेदनशीलता ठीक नहीं है।

आन्या अब तारा की बात कभी-कभी करती। एक सप्ताह बीत गया। आज पुनः आन्या ने तारा के बारे में मुझसे बात की।
"मम्मी, मैंने अपनी मैडम को तारा के बारे में बताया। तारा का नाम काॅलेज से काट दिया गया है। दूसरा वर्ष हो गया, वह काॅलेज नहीं गयी। मम्मी, मैम बता रही थीं कि तारा जैसे विशेष बच्चों के लिए यहाँ एक काॅलेज है, जिसमें इन बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को विशेष ट्रेनिंग दी गयी होती हैं, जो इन्हें बौद्धिक और शारीरिक रूप से मजबूत करते हुए शिक्षित करते हैं।" आन्या की बातें मैं सुन रही थी।
"कहाँ है ऐसा काॅलेज?" मैने आन्या से पूछा।
"दूर नहीं है मम्मी। ये काॅलेज सिंगार नगर में है।" आन्या ने कहा।
"ठीक है। मैं इस बारे में उसकी मम्मी से बात कर लूँगी। उन्हें काॅलेज का पता आदि बता दूँगी। उन्हें भी तो बेटी के भविष्य की चिन्ता होगी। उसकी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए वो अवश्य कुछ न कुछ करेंगी।" मैंने आन्या को आश्वस्त करते हुए कहा।
"ठीक है मम्मी।" आन्या के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे।
"अब जाओ, तुम अपनी परीक्षा की तैयारी करो। आज अभी भोजन नहीं बनाया है। भोजन समय पर नहीं बनेगा तो तुम्हारा भाई बिना भोजन किये सो जाएगा। तुम तो जानती हो, नींद में रहता है तो उठाने पर उठता भी नहीं है। कल तारा के घर जाऊँगी।" मैंने आन्या से कहा।

अगले दिन घर के आवश्यक काम खत्म करने के पश्चात दोपहर को मैं तारा के घर गयी। उसकी मम्मी से तारा का हाल पूछा।
"बस वैसी ही है मेरी बेटी। उपचार से कोई लाभ नहीं हो रहा है। अब तो वो किसी के सामने आने से भी डरती है। घबराती है। उसके अन्दर कदाचित हीनभावना आ गयी है। क्या करूँ? कितना समझाती हूँ उसे। किन्तु वो जिन्दगी की हकीकत को समझती है, इसलिए सामान्य नही हो पा रही है।" कहते-कहते
तारा की मम्मी सुबकने लगी।
"रोने से कुछ नहीं होगा भाभी जी। तारा के लिए कुछ करने का यही समय है। आन्या उसकी बहुत फिक्र करती है।" कहते हुए मैंने आन्या की बतायी सारी जानकारी तारा की मम्मी को दे दी।
"कल ही तारा के पापा को लेकर उस काॅलेज में चली जाइए। अच्छे काम में देर नहीं करनी चाहिए।" उस दिन तारा की मम्मी को समझाकर मैं चली आयी थी।

आज तारा के शिक्षिका बनने पर मैं, आन्या, तारा का पूरा परिवार, तारा के इस रूप को देखकर बहुत खुश थे। आन्या जो कि बैंक में जाॅब कर रही थी। उसकी खुशी तो सातवाँ आसमान छू रही थी। असमान से कोहरा छँट चुका था। सुनहरी धूप निकल आयी थी। शाम को तारा आयी और अपनी व्हीलचेयार पर बैठकर
आन्या के कमरे की ओर जाने लगी। आँगन में मुझे देखा तो रुक गयी।
"आण्टी, मुझे अपनी मित्र से बताना है कि यदि वो मुझे मार्ग न दिखाती तो मैं आज अपने जैसे विशेष बच्चों के लिए प्रेरणास्रोत कैसे बन पाती!" मैं और तारा की मम्मी एक-दूसरे के गले लगकर खुशी के अपने अश्रुओं को छिपा रहे थे। कोहरा सचमुच छँट चुका था। स्वर्ण किरणें चहुँओर बिखर चुकी थीं।

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

नीरजा हेमेन्द्र

ईमेल : neerjahemendra@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तरप्रदेश)

शिक्षा- एम०ए० (हिन्दी साहित्य), बी०एड
संप्रति- अध्यापन
प्रकाशन- कहानी संग्रह- 'बियाबानों के जंगल', 'धूप भरे दिन', 'मुट्ठी भर इच्छाएँ', 'माटी में उगते शब्द (ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ), 'जी हाँ, मैं लेखिका हूँ', 'अमलतास के फूल', 'पत्तों पर ठहरी ओस की बूँदें' (प्रेम कहानियाँ), '....और एक दिन'। आत्मकथा- 'पथरीली पगडंडियों का सफ़र'। उपन्यास- 'अपने-अपने इन्द्रधनुष ', 'उन्हीं रास्तों से गुज़रते हुए'। ललई भाई (एक राजनैतिक गाथा)। कविता संग्रह- 'मेघ, मानसून और मन', 'ढूँढ कर लाओं ज़िंदगी', 'बारिश और भूमि', 'स्वप्न'।
हिंदी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ, बाल सुलभ रचनाएँ एवं सम सामयिक विषयों पर लेख प्रकाशित। रचनाएँ आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी प्रसारित। हिंदी समय, विश्व गद्य कोश, विश्व कविता कोश, मातृभारती, प्रतिलिपि, हस्ताक्षर, स्त्रीकाल, पुरवाई, साहित्य कुंज, रचनाकार, हिंदी काव्य संकलन, साहित्य हंट, न्यूज बताओ डॉट कॉम, हस्तक्षेप, नूतन कहानियाँ आदि वेब साईट्स एवं वेब पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रदत्त विजयदेव नारायण साही नामित पुरस्कार, शिंगलू स्मृति सम्मान। फणीश्वरनाथ रेणु स्मृति सम्मान। कमलेश्वर कथा सम्मान। लोकमत पुरस्कार। सेवक साहित्यश्री सम्मान। हाशिये की आवाज़ कथा सम्मान। कथा साहित्य विभूषण सम्मान। अनन्य हिंदी सहयोगी सम्मान आदि।
पता- 'नीरजालय', 510/75, न्यू हैदराबाद, लखनऊ (उत्तरप्रदेश)- 226007
मोबाइल- 9450362276