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मनोज शुक्ल 'मनुज' मनोज शुक्ल 'मनुज'
निवास लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
भाषा gola_manuj@yahoo.in

जन्मतिथि- 04 अगस्त, 1971
जन्मस्थान- लखीमपुर-खीरी
शिक्षा- एम० कॉम०, बी०एड
सम्प्रति- लोक सेवक
प्रकाशित कृतियाँ- मैंने जीवन पृष्ठ टटोले, मन शिवाला हो गया (गीत संग्रह)
संपादन- सिसृक्षा (ओ०बी०ओ० समूह की वार्षिकी) व शब्द मञ्जरी(काव्य संकलन)
सम्मान- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश द्वारा गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' पुरस्कार
नगर पालिका परिषद गोला गोकरन नाथ द्वारा सारस्वत सम्मान
भारत-भूषण स्मृति सारस्वत सम्मान
अंतर्ज्योति सेवा संस्थान द्वारा वाणी पुत्र सम्मान
राष्ट्रकवि वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्यिक प्रकाशन समिति, मन्योरा-खीरी द्वारा राजकवि रामभरोसे लाल पंकज सम्मान
संस्कार भारती गोला गोकरन नाथ द्वारा साहित्य सम्मान
श्री राघव परिवार गोला गोकरन नाथ द्वारा सारस्वत साधना के लिए सम्मान
आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह द्वारा सम्मान
काव्या समूह द्वारा शारदेय रत्न सम्मान
उजास, कानपुर द्वारा सम्मान
यू०पी०एग्री०डिपा०मिनि० एसोसिएशन द्वारा साहित्य सेवा सम्मान व अन्य सम्मान
उड़ान साहित्यिक समूह द्वारा साहित्य रत्न सम्मान
प्रसारण- आकाशवाणी व दूरदर्शन से काव्य पाठ, कवि सम्मेलनों व अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता
निवास- जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ (उ०प्र०)
मोबाइल- 6387863251


छन्द (5 रचनाएँ)

मनोज शुक्ल 'मनुज' के छन्द

ज्ञान, धन ,रूप,यश प्रेम के समक्ष गौण,ईश भक्ति में भी प्रेम ही अमूल्य तत्व है।प्रेम से विहीन व्यक्ति अनुरक्ति से विमुक्त,प्रेम सत्य सुंदर है जीवन का सत्व है।दंभ...

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मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के घनाक्षरी छन्द

एक प्रेम लाँघ जाता देश प्रेम सह लेता दण्ड,प्रेम जाति बंध तोड़ प्रेम को निभाता है। प्रेम धर्म से परे है प्रेम रूढ़ियों से मुक्त,प्रेम वाहे गुरु, राम, अल्लाह को...

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मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के छन्द

नव वर्ष दिव्यता दे दीप्त यह जीवन हो , ज्ञान, मान, यश नित्य - नित्य बढ़ता रहे ।   अभिमान टूटे पिण्ड छूटे दुष्ट पापियोंं से,  मन  की  &nbsp...

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मनोज शुक्ल 'मनुज' के मनहरण घनाक्षरी

रण दया, क्रूरता के मध्य छिड़ ही गया है,देव वृत्ति का समूल हो रखा क्षरण है।क्षरण है पुण्य, सद्वृत्तियों, विनम्रता का,चाटुकारिता का,झूठ, पाप का वरण है।वरण है...

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मनोज शुक्ल 'मनुज' के घनाक्षरी छन्द

छन्द- एक बंदरों के कूदने से भागता नहीं है  शेर,सर्प बाज के समीप भूल के न आते हैं। मूर्ख डींग हाँकते हैं झाँकते हैं हर  ओर,बुद्धि के लपेटे में जो...

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इरा वेब पत्रिका में मनोज शुक्ल 'मनुज' की रचनाएँ