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संवेदना का नया रूपाकार : शब्द बहुरुपिए हो गए- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

संवेदना का नया रूपाकार : शब्द बहुरुपिए हो गए- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

संग्रह की कुछ कविताएँ पाठक से लगातार संवाद करती हैं। यह संवाद जीवन संपृक्ति का भी है और जीवन राग का भी है। इन कविताओं में कहीं भी तृष्णा, क्रोध, बदला जैसे भावों को दूर-दूर तक स्पर्श नहीं किया है। अपनी बात कहने की एक लय है।

शब्द बहुरूपिए हो गए हैं मुक्ता जी का नया काव्य संग्रह है। हिंदी साहित्य में मुक्ता जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपनी किसी भी रचना में उन्होंने अपने आपको दोहराया नहीं है। इस कविता संग्रह में भी यही बात लागू होती है। ज़िंदगी के संबंध में यहाँ नए परिप्रेक्ष्य हैं, जो बहुत विस्तृत और विशाल हैं। ज़िंदगी को समझने की कोशिश इन कविताओं में लगातार संघर्ष करती रहती है। इन कविताओं में संवेदनाएँ हैं, संवेदनाओं की बुनावट है और पाठक के मन में संवेदना उपस्थित करने की चाहत है। ये संवेदनाएँ अपने सूक्ष्म से सूक्ष्मतर रूप में पाठक के भीतर प्रवेश कर जाती हैं। संवेदना इन रचनाओं में जितनी अंतर्मुखी हैं, उतनी बहिर्मुखी भी हैं। संवेदना के इन दोनों पक्षों को साथ में लेकर वह चली भी हैं और सफलता भी प्राप्त की है।

संग्रह की पहली कविता 'प्रसव' शीर्षक से है, जो यह बताती है कि मुक्ता की दृष्टि सर्वप्रथम माँ, स्त्री और उसकी संवेदना पर है। संग्रह की दूसरी कविता प्रसव को कविता को जन्म देती है, जिसका शीर्षक है 'महासमर में'। मुक्ता जी कहती हैं-

महासमर में
एक चित्कार पर टिका है
यह अनंत विस्तार

मुक्ति और संघर्ष इस कविता संग्रह में अपने संपूर्ण परिवेश, परिदृश्य के साथ उपस्थित रहा है। मुक्ता जी बार-बार ऐलान करती हैं कि

हाथों को ऊपर उठाकर वह ऐलान कर रहा था
अपनी मुक्ति का
हम पृथ्वी का ककहरा उसे समझाने पर तुले हुए थे

इन कविताओं में मुक्ता जी के इतिहास, पुराण मिथक और लोकजीवन के विभिन्न ज्ञान अनुभवों के तंतु, शब्दों के माध्यम से बिखरे हुए हैं। पौराणिक आख्यानों में पहली कथाओं के माध्यम से यथार्थ की अभिव्यक्ति का नया माध्यम मुक्ता जी ने तलाशा है। बच्चों की आवाज़, मूक यात्रा जैसी कविताएँ पाठक को समृद्ध करती हैं।

नशे में तैरती, अंधी मछलियाँ कसमसाती हैं
कंकड़ों में उठते हैं गर्म बुलबुले
हवा में घुटता है मछलियों का दम
लक्ष्य बेध की ये आदी हैं
अर्जुन का लक्ष्य बेध
द्रौपदी के स्वयंवर में
बे-मतलब मरी
इन मछलियों के
अंधेपन की मूक यात्रा है।

संग्रह की कुछ कविताएँ पाठक से लगातार संवाद करती हैं। यह संवाद जीवन संपृक्ति का भी है और जीवन राग का भी है। इन कविताओं में कहीं भी तृष्णा, क्रोध, बदला जैसे भावों को दूर-दूर तक स्पर्श नहीं किया है। अपनी बात कहने की एक लय है। अपनी बात कहने की एक सहजता है, जो इन कविताओं को अन्य रचनाकारों से अलग पंक्ति में खड़ा करती हैं-

मैं बातें करती हूँ पेड़ों से
पेड़ों की डालियाँ झुक आती हैं
कानों के पास
दे जाती हैं उपहार सुनहरे पत्तों का
मैं बातें करती हूँ बादलों से
बादल आते हैं उमड़ते-घूमड़ते
बरसा जाते हैं बूँदें आँगन में

अपनी कहानियों में तो मुक्ता जी स्त्री विमर्श के दायरे को तोड़ती ही हैं, अपनी कविताओं में भी वह वही रूपक तैयार करती हैं। 'शब्द बहरूपिए हो गए' की कविताओं में स्त्री, माँ, स्त्री जीवन, स्त्री वजूद पाठकों के सम्मुख उपस्थित होता है। इन कविताओं में स्त्री अस्मिता को सामने लाने की कोशिश की गयी है पर यह संग्रह स्त्री विमर्श के दायरे में नहीं रखा जा सकता। स्त्री विमर्श के रूढ़ प्रतिमान इन कविताओं पर लागू नहीं होते हैं। इन कविताओं में स्त्री है, स्त्री की पीड़ा है, स्त्री पर हो रहे अन्याय हैं, अत्याचार हैं परंतु पुरुष का अत्याचारी रूप यहाँ नहीं है। पुरुष वर्ग का दृष्टिकोण भी नहीं है। इन कविताओं को मैं मन की अभिव्यक्ति के रूप में देखने की पक्षधर में रहूँगी ना कि स्त्री विमर्श के सीमित दायरे में। इन कविताओं में स्त्री मन, स्त्री पुरुष के सनातन संबंधों को देखने की कोशिश करता हुआ प्रतीत होता है। स्त्री की अस्मिता, स्त्री का अस्तित्व अपनी तमाम जटिलताओं और विसंगतियों की पैनी पकड़ के साथ यहाँ पर उपस्थित हुआ है।

कविता में उपस्थित स्त्री अपने भीतर देखती ही नहीं है बल्कि स्वयं से बातें करती है। उसके सामने खुला आसमान है और पंख भी हैं। कहीं-कहीं इन पंखों के उजड़ने और नोचने के साक्षी उपस्थित हैं परंतु स्त्री कहीं थकती नहीं है, हारती नहीं है बल्कि अपनी अदम्य जिजीविषा से जीवन को सौंदर्य पूर्ण बनाने के लिए आगे बढ़ती ही रहती है। स्त्री शोषण कोई नई बात नहीं है। बलात्कार की अमानवीयता पर कविताओं में बहुत कुछ लिखा गया है। मुक्ता जी भी इस अमानवीयता पर अपनी क़लम चलाती हैं।

मुक्ता जी के शब्दों में औरत क्या है, इसको महसूस करने के लिए 'उठी उंगली', 'समुद्र की शक्ति' के साथ 'औरत' जैसी कविताओं को साहित्य की बड़ी आवश्यकता है। औरत और प्रकृति के माध्यम से स्त्री यथार्थ को प्रस्तुत करते हुए वह कहती हैं कि

पुरुषों की दुनिया में
औरत
धरती और समुद्र की
शक्ति के साथ
अपने श्रम के पसीने को धारण कर
खड़ी है मजबूती के साथ।

स्त्री पर लिखी गयी कविताएँ मुक्ता के भीतरी मन की कविताएँ कही जा सकती हैं। इन कविताओं में अर्थ नए हैं। बारीकी है, जो पाठक को नए आयाम प्रस्तुत कराती है। स्त्री की नियति, उसकी छटपटाहट, उसके उभरने का प्रयास और सामाजिक संरचना की व्यवस्था यह सभी तथ्य इस संग्रह में ही नहीं, इससे पहले भी उनकी रचनाओं में शामिल हुए हैं। उनके विरुद्ध कविता अपनी मुखरता के इसी प्रभाव की कविता है।

मुझे प्रतीत हुआ सीमाओं के पार
तुम एक नये संसार की संरचना में तन्मय हो
तुम्हारी छाया तले
मैं घोषणा करना चाहती हूँ
विश्व की औरतों के लिए
हिंसा से मुक्त दुनिया

जब औरत हिंसा मुक्त हो जाएगी तो उसकी वास्तविक शक्ति सबके समक्ष प्रस्तुत हो जाएगी, क्योंकि

औरत के अंदर
अठखेलियाँ कर रहा है समुद्र
औरत की बाँहों में उड़ रहा है आकाश
औरत समेट लेने को आतुर है
'शिशु-पृथ्वी' को अपने गर्भ में।

मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के संगी हैं। प्रकृति के बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं है। स्त्री और प्रकृति के संबंध को मुक्ता जी अपनी इन पंक्तियों में बड़ी संवेदना के साथ व्यक्त करती हैं। वह कहती है कि

वह औरत समेट लेती थी नदी को आँचल में
गाँव-घर से विस्थापित वह
बनी रही नदी के आसपास
जीवन पर्यंत
ऐसा प्रतीत होता था
इस पार नदी, उस पार नदी
एक नदी का अनुवाद दूसरी नदी
वह औरत ओझल हो चुकी है दृश्य से

कभी छायावाद में प्रकृति का मानवीकरण करने की प्रवृत्ति हमें साहित्य में दिखाई दी थी। अब यह प्रवृत्ति साहित्य की सर्वोपरि विशेषता बन गई है। प्रकृति का मानवीकरण मुक्ता जी के यहाँ भी उपस्थित हुआ है। वह कहती हैं-

खनक रही है वाद्य यंत्रों की तरह
ठंडी पत्तियों की नसों में गुनगुनी धूप-सी

प्रेम के आंतरिक गुंफन के लिए भी वह प्रकृति का ही सहारा लेती हैं और कहती हैं-

सूरज बना जलता रहा
मन के कोटर में
ताप को अक्षर-अक्षर करता रहा प्रेम
विदा के बाद भी आँख की कोर में
पानी की बूँद-बूँद शेष रहा प्रेम

प्रकृति इन कविताओं का अभिन्न हिस्सा है, चाहे वह 'डफली बजाता आदमी' हो या 'वीणा के तार' कविता। प्रकृति ही मनुष्य के भीतर समाई हुई है। वह महसूस करती है कि

ढफली बजाते आदमी के गीतों पर
पग धरते उतर आते थे
पहाड़ी-झरने
पूरा जंगल सुर मिलाता था
ढफली बजाते आदमी के साथ
ढफली बजाते आदमी के अंदर बसता था पूरा जंगल

कोमल संवेदनाओं के साथ वर्तमान सच पर पूरी निगाह डालने का साहस कवि की सफलता को इंगित करता है। 'नस्ल बदल रही है' जैसी कविताएँ वर्तमान सच को ही नहीं प्रस्तुत करती हैं बल्कि रचनाकार के साहस की भी पुष्टि करते हैं। एक उदहारण देखिए-

धुएं का असर
होने लगा है धीरे-धीरे
बदल रही है
आदमी की नस्ल
विरोध में उठते थे हाथ हत्या के
हत्या के पक्ष में उठने लगे हैं हाथ

वर्तमान यथार्थ के लिए रचनाकार सजग है। इसीलिए 'आवाज़', 'धूसर आईने' जैसी कविताएँ पाठक को सचेत करती हैं और बताती हैं कि "आदमी को समझना होगा आज़ादी और आज़ादी का अर्थ।"

स्त्री का संवेदनशील पक्ष मुक्ता जी के कविताओं में अनायास ही उतर आया है। 'पृथ्वी की सबसे उदास लड़की' कविता भीतर तक झकझोंर देती है-

लड़की नहीं जानती मुस्कान का अर्थ
ऐसा प्रतीत होता है
लड़की के होंठ भींच दिए गए हैं
कोख में
लड़की की बुझी आँखों में
तैर रहे हैं अधबुने सपने

प्रेम जीवन का ऐसा पक्ष है, जिसे चाहे-अनचाहे हर रचनाकार ने अपनी क़लम से संवारा ही है। मुक्ता जी भी इससे अछूती नहीं रही है। परंतु इस संग्रह में प्रेम में वर्तमान प्रेम और जीवन का सत्य दोनों गुथे हुए रूप में प्रस्तुत हुए हैं। आज का यथार्थ किसी से छिपा नहीं है। इसीलिए वह कहती हैं कि

मौन, संवेदना का चरम है
प्रेम में जब यह प्रयोग हो रहा हो
अस्त्र की तरह
इसकी दुधारी मार
एक ओर घायल करती है रिश्तों को
दूसरा फलक छीन लेता है पूरा अस्तित्व
फूले गुब्बारें-सी खोखल अहमन्यता
करती है कितने ही आखेट
चिंदी-चिंदी उड़ जाते हैं सपने
मधुर रंगों पर बिछती जाती है चादर रेत की

वर्तमान समय युद्ध का है। हर देश दूसरे देश पर अपनी इच्छाओं, अपनी आकांक्षाओं को थोप रहा है, जिसका परिणाम इजरायल-ईरान युद्ध हो चाहे रूस और यूक्रेन इत्यादि देशों द्वारा किए जा रहे युद्ध हैं। 'उठी उंगली' कविता इन्हीं तथ्यों पर केंद्रित है-

शरीर का अंग-अंग
ढकता जा रहा है
घृणा, आक्रोश- उन्माद के छिलकों से चढ़ते जा रहे हैं
दोहरे दस्ताने हाथों में ऐसे समय में
उधड़ी सीवन के पार निकल आई है
एक उँगली
सीमा पर
बर्फ में दबे सैनिक की
आकाश की ओर उठी
उँगली
करती है निषेध
युद्ध का।

हम अपने समय को देखें तो भारत-पाकिस्तान ही नहीं बल्कि विश्व के कई देश एक-दूसरे से परेशान हैं, जिसका समाधान वे युद्ध में देखना चाहते हैं। युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। युद्ध में सबसे ज़्यादा कष्ट पाता है आमजन, जिसका राजनीति से कोई सरोकार नहीं है बल्कि वह दो वक्त की रोटी के लिए परिश्रम करता रहता है। युद्ध की विभीषिका सबसे ज़्यादा औरत को सहन करनी पड़ती है। युद्ध की विभीषिका को बयां करती 'तनी हुई औरतें' कविता की दो पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-

विजय पताकाओं से नापी जाती रही हैं
सीमाएँ औरतों की देह की
किसी भी युद्ध में जिसे रौंदना सबसे आसान होता है
युद्ध के बाद, अपने अन्दर के भय को ढकने के लिए
औरतों की देह पर बढ़ाये जाते हैं वस्त्रों के बोझ
फिर भी नहीं कम होता है वहशी आँखों का नंगापन
औरतें, बच्चों को सीने में छुपाये देख रही हैं
आततायी बारूद का बढ़ता असर
तनी हुई औरतों के आगे झुकने लगती हैं संगीनें

वस्तुतः युद्ध सिर्फ स्त्री के लिए ही नहीं, पूरे मनुष्य जाति के लिए संहारक है, यह सभी जानते हैं। रचनाकार और पाठक दोनों जानते हैं कि

मैं जानती यह अंतिम युद्ध नहीं
इतिहास में दर्ज हो जाएगा एक और युद्ध
बिछी लाशों, उजड़े घरों का मंज़र
युद्ध का एक ग्रास भर है
युद्ध से मुक्ति में ही
मनुष्य की मुक्ति है

मुक्ता जी जितनी नवीन की समर्थक हैं, उतनी ही प्राचीनता का भी वह वर्णन करती हैं। नवीन विचारों, नवीन भावनाओं से युक्त होने के बावजूद वह पुरातन का पल्ला नहीं छोड़ती हैं। प्रकृति के पुरातन श्रृंगार को भी वे आज भी वर्णित करती हैं, जिनमें वही मधुरता है, वही संगीतात्मकता है, जो प्राचीन काव्य में हमें ध्वनित होते सुनाई देते थे-

औरत की देह झंकृत हो उठी है वीणा के स्वरों से
कानों में कर्णफूल बेला हार पारिजात के
गुड़हल ने रचा महावर, चमेली ने गूँथी पायल
हाथों में कंगना, महक उठे गुलाब-गुलाब
नाव खोल गंगा में उतर पड़ी है वह
महाश्मशान में बजने लगी है शहनाई

मुक्ता जी की कई कविताएँ एक से अधिक स्तरों का निर्माण करती हैं, जिनकी परत को खोलना आसान नहीं है। कभी-कभी जितनी बार वह कविताएँ पढ़ी जाती हैं, उतनी बार नया अर्थ, नया संदर्भ देती चली जाती हैं। 'श्रृंखलाएँ' इसी भांति की कविता है। उपमा के प्रयोग में मुक्ता जी बड़ी विलक्षण हैं, वे कहती हैं कि

बच्चों की आवाज़ घरों में बंद बूढ़ों के लिए
बन गई है बोरसी की आग

धर्म हमारे देश का एक महत्वपूर्ण विचार बिंदु है। मुक्ता जी धर्म में राजनीति का प्रवेश नहीं करती हैं बल्कि धर्म और वर्तमान स्थिति पर सटीक बयान देती हैं। आडंबर पर तमाम रुपए खर्च करने वालों को रोटी की पीड़ा नहीं महसूस होती है। इस पीड़ा को वह महसूस करती हैं और कहती हैं-

हमारे पूर्वजों ने की थी यात्राएँ नंगे पाँव
धर्म और श्रद्धा की नाव पर
संसाधन के अभाव में
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम
सुदूर पहाड़ों पर
स्थित देव स्थानों की
कुछ वापस लौटे, कुछ आस्था की भेंट चढ़े
आज भी मजदूर कर रहे हैं भूखे पेट
लंबी परिक्रमाएँ, रोटी के लिए

'जमती जा रही है बर्फ' जैसी कविताएँ राजनीतिक होते हुए भी राजनीति के रूढ़ मानदंडों की कविताएँ नहीं हैं। यहाँ पर कुछ संकेत हैं, जिन्हें पाठक स्वयं ही राजनीति से जोड़ लेता है। यह राजनीति जैसी नहीं है बल्कि यथार्थपरक समाज का आईना है। वह कहती हैं-

वे बंद रखना चाहते हैं उन किताबों को
जिनके पन्ने मुक्ति के द्वार खोलते हैं
उनकी धमनियों में जमती जा रही है बर्फ
उनका गन्तव्य है नारे-परचम
सुनिश्चित गढ़ा हुआ देश
शतरंज की बिछी हुई बिसात में
तय करना है अपना पक्ष

राजनीति का यथार्थ उनके कुछ शब्दों में देखिए–

लोक को तंत्र से काटने के बाद
बच जाती हैं
पूँजी और सत्ता की दुरभिसंधियाँ
इतिहास गवाह है
जिन्होंने पहनाये ताज तानाशाहों को
उनके हाथ सबसे पहले कटे हैं

मुक्ता जी बनारस की हैं इसलिए बनारस उनकी कविता में आना सहज ही है। बनारस आज, आकाशदीप, ओझल हो गई काशी जैसी कविताएँ बनारस के घाट, आकाशदीप, कुआं, दूरबीन, ऐतिहासिक भवन, शिक्षा, संगीत, कला, बाबा विश्वनाथ इन कविताओं में घूमते रहते हैं। वर्तमान यथार्थ का साये ने बनारस को भी अछूता नहीं छोड़ा है परंतु कवयित्री की यह कामना है कि सिद्ध अड़ियों के मुहाने व्यवस्था कलश से बिद्ध हैं। काशीजन के नाभिनाल से जुड़ा-बना रहे बनारस। राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा बनारस उनके लिए विचार का विषय है। वह कहती है कि–

कीच-मैल भार से श्लथ गंगा
विभाजित हो गई
नहर बन गई अमरबेल
उत्तरवाहिनी बनती जा रही है दक्षिण वाहिनी
त्रिशूल, पताकाएँ, गुम्बद, मढ़ दिये गये स्वर्ण से रूद्राक्ष
हीरे के कवच से बाबा विश्वनाथ
औघड़दानी के दर्शन हो गये दुर्लभ
काशी जा रही है किस करवट कौन कहे? कौन बताये?

प्रसिद्ध आलोचक शिवकुमार मिश्र कहते हैं कि "मुक्ता की कविताएँ जीवन के प्रति राग की कविताएँ हैं। आदमी और कविता दोनों के भविष्य के प्रति आस्थावान मुक्ता के स्वर को सुनना निश्चय ही एक निहायत प्रीतिकर अनुभव है। मुक्ता की कविताओं से गुज़रना सचमुच में एक निहायत संवेदनशील रचनाकार मन की गहराइयों से गुज़रना है।" शिव कुमार जी की यह उक्ति मुक्ता जी की रचनाओ के वैशिष्ट्य को पूर्णत: अभिव्यक्त करती है। और अंत में यह दो पंक्तियाँ, जो रचनाकार की शक्ति को बताती हैं और ये शब्द, जो इस संग्रह को पढ़ने के लिए प्रेरित करते है, इन्हीं शब्दों के साथ विराम।

रचनाकार की देह का हिस्सा है क़लम
शब्द और शब्दों के पार
क़लम की जय-यात्रा में शामिल है पूरा विश्व

 

 

समीक्ष्य पुस्तक- शब्द बहुरुपिए हो गए
रचनाकार- मुक्ता
विधा- कविता
प्रकाशन- मोनिका प्रकाशन, जयपुर
मूल्य- 325 रुपए

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रचनाकार परिचय

शुभा श्रीवास्तव

ईमेल : shubha.srivastava12@gmail.com

निवास : वाराणसी (उत्तरप्रदेश)

शिक्षा- एम०ए०, बी०एड, पी०एचडी, नेट
सम्प्रति- प्रवक्ता, राजकीय क्वींस कॉलेज, वाराणसी (उत्तरप्रदेश)
प्रकाशन- असाध्य वीणा: एक मूल्यांकन (समालोचना), हिंदी शिक्षण (हिंदी व्याकरण), पाठक की लाठी (साझा कहानी संग्रह)
आजकल, पाखी, परिंदे, सोच-विचार, कथादेश, परिकथा, प्रेमचंद पथ, नागरी पत्रिका तथा दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि पत्रों में कहानी, कविता, ग़ज़ल, और लेख प्रकाशित
पुरस्कार- माँ धंवंतरी देवी कथा साहित्य सम्मान, चित्रगुप्त सम्मान, लोक चेतना सम्मान, कथादेश लघु कथा प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार
निवास- वाराणसी (उत्तरप्रदेश)
मोबाइल- 9455392568