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जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

जगदीश पंकज के नवगीत

जगदीश पंकज के नवगीत

नवगीत जैसी मुखर विधा के अग्रणी हस्ताक्षर जगदीश पंकज अपनी गीति रचनाओं में जिस महीनता से अपने समय, अपने परिवेश को बुनते हैं, वह दर्शनीय है। ये अपनी रचनाओं में अपने युग के शब्द-चित्र प्रस्तुत करते हैं। इनके यहाँ कथ्य जितना ज़रूरी है, शैली उतनी ही गंभीर। प्रस्तुत रचनाएँ हमारे ही मन की छटपटाहट का शाब्दिक अनुवाद हैं।

अंकित हूँ समय पर

तुम गुफा, निर्जन वनों में
खोजना मत
मैं परत दर परत
अंकित हूँ समय पर!

टैंकर के पास लाइन में लगा हूँ
बाल्टी, दो बाल्टी
आ जाए हिस्से
कभी राशन की किसी दूकान पर मैं
सुन रहा हूँ भूख के
असहाय किस्से

इस तरह अमृत मिला
ऊँचे शिखर से
हो न पाऊँ जो
कभी मैं आत्मनिर्भर!

हूँ जुलूसों में, कभी हूँ रैलियों में
भर रहा हुंकार
सच की देहरी पर
कर दिया मुझको बहिष्कृत साधनों से
सिर्फ निर्भर कर दिया हूँ
चाकरी पर

मैं तुम्हारी मार
खाकर भी रहूँ चुप
अब नहीं स्वीकार
होगा मुझे पल भर

रोज़ रोजी के लिए आकर खड़ा हूँ
चौक की हर भीड़ का
मैं अंग बनकर
धर्म, मज़हब, जातियों की साँकलों को
तोड़ता तुमको मिलूँगा
खड़ा तनकर

मत कुचलते ही
रहो आक्रोश मेरा
वह उठेगा फिर विकट
प्रतिरोध बनकर।

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ख़बरें बरस रहीं धरती पर

खबरें
बरस रहीं धरती पर,
आसमान बोझिल-बोझिल है
जाने-पहचाने
चेहरों पर
कुछ भी कह पाना मुश्किल है

कानाफूसी में
उलझी हैं
इतनी आदमक़द अफवाहें
चलती-फिरती
दीख रही हैं
दीवारों की कुटिल निगाहें

सच को कितना
कहाँ खंगालें
सब प्रायोजित है, झिलमिल है

विज्ञापन तो
विज्ञापन हैं
शीर्ष-कथा की तरह परोसा
शंका उभरे
नहीं कहीं से
टूट न जाए कहीं भरोसा

पर जो दिखलाया
निखारकर
वह भी दीख रहा पंकिल है

इतना घटाटोप
छाया है
लगता सब कुछ धुंध भरा है
महाबौद्धिक
शोध कर रहे
कहाँ-कहाँ, क्या-क्या बिखरा है

फिर भी दीख रहा
साजिश में
कौन, कहाँ, कितना शामिल है

कितना जनमत
को भरमाना
यह ख़बरों पर आधारित है
क्या कुछ
ब्रेकिंग-न्यूज़ बनाएँ
निर्देशों पर अवलंबित है

समाचार तो
सिर्फ माध्यम
सिंहासन असली मंजिल है

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यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है

शब्द को
मिलकर तपाएँ
ताप को मिल गुनगुनाएँ
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है

जहाँ अत्याचार की
शब्दावली को
घृणा के विष में डुबोया जा रहा है
आज के आहत विषय
पीछे हटाकर
बस विगत का बोझ ढोया जा रहा है

क्रूर कटुता
को दिखाएँ
क्रुद्ध जनमत को बताएँ
बंद किन अलमारियों में घुटी लय है
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है

सूचना के नाम पर
अफवाह देकर
अटकलों पर तन्त्र का खंभा टिका है
हो रहा गदगद
मिले विज्ञापनों से
मीडिया की किस जगह क्या भूमिका है

भूख को
कितना छिपाएँ
किस अघाये को दिखाएँ
लोक में जब फैलता हर ओर भय है
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है

बढ़ रही है
धमनियों में सरसराहट
रक्त की भी कसमसाहट चढ़ रही है
यह हमारे दौर की
निरुपाय पीढ़ी
अब विकल्पों के चयन को बढ़ रही है

मार्ग कुछ
संभव बनाएँ
शब्द में प्रतिकार गाएँ
लोकमत की हो सकेगी तभी जय है
यह नहीं ठंडे विमर्शों का समय है

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चुप रहे हों जब अबोले शब्द

चुप रहे हों जब अबोले
शब्द आकर
ओठ तक लाकर, न कहना भी
घुटन की यातना है

चित्र है या शब्द जो आ
नयन पट की
भंगिमा के
मौन का अनुवाद करते
या तृषा के तृप्ति से
अद्भुत मिलन की
चाह लेकर
देह भाषा में उतरते

ग्रन्थि कोई बन नहीं
अभिशाप जाए
यत्न से शायद वही
संकेत की उद्भावना है

जिस जगह विश्वास
मरणासन्न होकर
व्यर्थ की आश्वस्तियों में
घिर गया हो
उस जगह पर
अंध-श्रद्धा के शवों पर
लग रहा संचित
सभी कुछ गिर गया हो

एक हिंसक सोच जो
विकसित हुई है
वह हमारे समय के, इस
सत्य की अवमानना है

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और न जाने क्या बदलेगा

बदल गया कुछ
बदल रहा कुछ
और न जाने क्या बदलेगा,
यह अपना गोलार्द्ध
न जाने
भटकन से कैसे संभलेगा!

एक उदारीकरण उछलकर
जा बैठा
पूँजी के घर में
किन्तु पुरातन सामन्तों-सा
सोच जमा
अब भी अंतर में

अर्थतन्त्र के
मकड़जाल से
लघु-निवेश कैसे निकलेगा!

अवसर सिकुड़ रहे हैं हर दिन
सेवाएँ
दम तोड़ रही हैं
गति के समीकरण उलझे हैं
यात्राएँ
पथ छोड़ रही हैं

अंतराल पीढ़ी का कहकर
किसको कौन
दिलासा देगा!

बहुदेशी हो गया प्रबंधन
निगमित हुई
व्यवस्था धन की
खड़ा भीड़ में व्यथित युवामन
खोज कर रहा
अधुनातन की

ताप बढ़ रहा धीरे-धीरे
शायद अब
लावा पिघलेगा।

वंचित रहे सदा साधन से
होता रहा
अनवरत शोषण
यह वित्तीय व्यवस्था किसका
करती रही
निरंतर पोषण

ज्वालामुखी घोषणाओं से
कब किसको
सौहार्द मिलेगा!

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घड़ियाँ वे रुक गयीं

घड़ियाँ वे रुक गयीं
जिन्हें युग
चाबी देकर चला रहा है।

जब भी संचित क्रोध
उबलकर
नई दिशाएँ पा लेता है
टूटी हुई
नाव के सपने
लाकर सागर को देता है
किसका परिचय,
कौन किसे दे
जब धीरज छलछला रहा है।

जहाँ भावनाएँ
आहत हो
लगा रहीं चिंतन पर ताला
अपराधों की
परिभाषा में
क्या धौला है, क्या है काला
निरपराध हैं
बंदीगृह में
अपराधी बलबला रहा है।

तिरस्कार, दुत्कार,
यातना
मिलती रही जनम की जिसको
आहत स्वाभिमान
को लेकर
वह दिखलाए जाकर किसको
यह किसका बे-मेल
प्रबन्धन
जाने क्यों झलझला रहा है!

अहंकार के नये
मठों में
लम्पट-कामी संचालक हैं
पाखंडी परिधान
पहनकर
कपटी चोर प्रजा-पालक हैं
गणित समय का
गड्ड-मड्ड है
घड़ियों को बरगला रहा है।

उँगली किसकी ओर
उठाएँ
चारों ओर झूठ का शासन
और सूचना तन्त्र
झूठ का
करता सुबह-शाम अभिवादन
युग भी बदल रहा है
करवट
ज्योति सत्य की जला रहा है।

चाह रहे हैं जो
अतीत को
वर्तमान पर थोप सजाना
और त्याग कर
वैज्ञानिकता
उल्टी बंशी रोज बजाना
समय-चक्र उनसे
पूछेगा
युग का कितना भला रहा है?

*******


एक बिखरता हुआ आदमी

एक बिखरता हुआ आदमी
खोज रहा
टूटी पंखुड़ियाँ

अपने जैसों की तलाश में
लगा हुआ
कोशिश में दिनभर
साझा ध्वनियों के उच्चारण
परख रहा
रखकर कानों पर

कोई सूत्र कहीं मिल जाए
पिरो रहा
माला की लड़ियाँ

यह एकल व्यायाम नहीं है
ख़ुद ही मुद्गर
रहो घुमाते
या रिश्तों के तरणताल में
तैर अकेले
रहो नहाते

सामूहिकता से चोटी पर
चढ़ पाएँगे
लेकर छड़ियाँ

हर युग के कुछ यक्ष-प्रश्न हैं
उत्तर देता रहा
समय भी
फिर भी हर अस्तित्वबोध में
छिपा रहा
कोई संशय भी

जीवन चलता रहे निरंतर
जोड़ें मिलकर
साझी कड़ियाँ

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महापतन की इस वेला में

महापतन की इस वेला में
काँप रहे
संदर्भ समय के

इन्द्रप्रस्थ में कोलाहल है
कुरुक्षेत्र-सा
व्यूह रचा है
कितना खोया है विवाद में
कितना अपने
पास बचा है
कल्पित आशंकाएँ लेकर
चिपके चित्र
अराजक भय के

महाबौद्धिकों को चिंता है
किस-किस का
इतिहास मिटाएँ
अपना नायक जहाँ न कोई
किसको अपना
कह चिल्लाएँ
हर चौराहा रंगमंच है
दृश्य बदलते
हैं अभिनय के

नफरत की नारेबाजी में
शोर मचाता
भीड़तंत्र है
टकराहट के महाघोष में
दबा प्रेम का
बीजमंत्र है
मर्यादा के रखवालों से
प्रवचन मिलते हैं
विस्मय के

जो साझी संपदा मिली थी
कहाँ बेच दी
किसे बताएँ
कितनी बची रह गयी अब तक
जिसको अपना कह
इतराएँ
रोज ढीठता नाच रही है
गाकर नीच गान
आशय के

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रचनाकार परिचय

जगदीश पंकज

ईमेल : jagdishjend@gmail.com

निवास : साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद (उ०प्र०)

मूल नाम- जगदीश प्रसाद जैन्ड
जन्मतिथि- 10 दिसम्बर 1952
जन्मस्थान- पिलखुवा (उ०प्र०)
शिक्षा- बी० एससी
सम्प्रति- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ प्रबन्धक के पद से सेवानिवृत्त एवं स्वतंत्र लेखन।
प्रकाशित कृतियाँ- 'सुनो मुझे भी', 'निषिद्धों की गली का नागरिक', 'समय है सम्भावना का', ‘आग में डूबा कथानक’, ‘मूक संवाद के स्वर’, 'अवशेषों की विस्मृत गाथा', 'प्यास की पगडंडियों पर', 'हँसो, स्वयं पर हँसो', 'आक्रामक श्रद्धा के युग में', 'वर्तमान टूटे कन्धों पर', 'शिलाखंड पर खिचीं लकीरें', ‘साक्षी हैं हम समय के’ तथा ‘बन्द कपाट, लगी है साँकल‘ (नवगीत संग्रह), 'द्रोह असहमत इच्छाओं का' (कविता संग्रह)
प्रकाशन/प्रसारण- अनेक समवेत संकलनों में नवगीत तथा कविताएँ प्रकाशित। समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, मधुमती, इन्द्रप्रस्थ भारती, गगनांचल, वीणा, बनास जन, वागर्थ, विभोम स्वर आदि विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं/वेब पत्रिकाओं में गीत, नवगीत, समीक्षाएँ एवं कविताएँ प्रकाशित। केन्द्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली के विभिन्न कार्यक्रमों में काव्य-पाठ तथा आकाशवाणी दिल्ली से काव्य-पाठ का प्रसारण।
सम्पादन- साहित्यिक पत्रिका 'संवदिया' के नवगीत-विशेषांक का सम्पादन
विशेष-
1. 'हिन्दी नवगीत परंपरा और जगदीश पंकज : एक आलोचनात्मक अध्ययन' विषय पर जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा पीएच० डी० प्रदान की गयी है।
2. ‘जगदीश पंकज एवं यतीन्द्रनाथ राही के नवगीतों का तुलनात्मक अध्ययन‘ विषय पर बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पीएच० डी० प्रदान की गयी है।
तथा कई अन्य विश्वविद्यालयों में नवगीतों पर पीएच० डी० के लिए शोधकार्य पंजीकृत।
संपर्क- सोमसदन, 5/41, सेक्टर- 2, राजेन्द्र नगर, साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद (उ०प्र०)- 201005
मोबाइल- 8860446774