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इलाहाबाद और छायावाद- यश मालवीय

इलाहाबाद और छायावाद- यश मालवीय

छायावाद के शीर्ष पुरुष और हिन्दी कविता के स्वाभिमान स्वयं निराला, इलाहाबाद की पुण्यभूमि पर मुग्ध भाव से यह गीत सुनते रहे। गीत जब समाप्त हुआ तो बोले, "एक काम करो! अपना यह गीत मुझे दे दो। मेरा नया गीत संग्रह आ रहा है, उसमें एक गीत कम पड़ रहा है। तुम यह गीत मुझे दे दोगे तो मेरा संग्रह सम्पूर्ण हो जाएगा।"

साहित्य-तीर्थ- इलाहाबाद लगभग सारे साहित्यिक आंदोलनों का प्रारम्भ से ही केन्द्र बिन्दु रहा है। प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, छायावाद, नयी कविता आंदोलन, नवगीत आंदोलन, इन सभी काव्यात्मक प्रवृत्तियों के कल्ले पहले-पहल यहीं फूटे। यहाँ की मिट्टी, परिवेश और पर्यावरण में जाने क्या बात रही है कि जो लिखा यहाँ रोपा गया, वह कालान्तर में एक भरे-पूरे बरगद के ही रूप में सामने आया। यह एक तपस्थली जैसी ही रही है। गंगा-यमुना के संगम में लुप्त सरस्वती, साहित्य के सघन रूप में यहीं उजागर हुई है। इलाहाबाद और काशी यह दो शहर साहित्य-कला-संस्कृति की दो आँखें जैसे ही हैं। इलाहाबाद को ‘माइनस' कर दें तो पचास प्रतिशत से अधिक ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास' अलिखा ही रह जाएगा। यहाँ साहित्य की आत्मा बसती है, यह साहित्यिक आत्माओं का शहर है।

जहाँ तक छायावाद का संदर्भ है तो महाप्राण निराला, कविवर सुमित्रानन्दन पंत और महीयसी महादेवी की छायावाद की त्रिवेणी यहीं किसी सपने की तरह साकार हुई है। छायावाद के महाकवि जयशंकर प्रसाद काशी की काव्य गंगा हैं, तो पंत, निराला, महादेवी इलाहाबाद की गंगा-यमुना-सरस्वती हैं। निराला और पंत के बीच महादेवी जी सरस्वती की तरह ही सजती थीं। इन चारों स्तम्भों से मिलकर ही छायावाद एक रूपाकार लेता है। छायावाद की अंतिम कड़ी की शक्ल में सुकवि डॉ० रामकुमार वर्मा की रचनाभूमि भी इलाहाबाद ही रही है। डॉ० वर्मा को भुवनेश्वर की ही तरह हिन्दी एकांकी का जनक भी कहा जाता है। छायावाद के मर्मज्ञ कीर्तिशेष गंगा प्रसाद पाण्डेय ने यहीं रहते हुए छायावाद की मुखर मीमांसा की। छायावाद को उन्हीं की तरफ से एक आलोचक की सार्थक एवं मर्मस्पर्शी आँच मिली। वह महादेवी जी के प्रिय बसंत थे। महादेवी जी उन्हें 'बसंत' सम्बोधन देकर ही पुकारा करती थीं। पांडेय जी की कालजयी कृति 'महीयसी महादेवी' में स्वयं महादेवी जी ने ही उन्हें यह विशेषण दिया है। पांडेय जी की एक और अन्यतम कृति ‘महाप्राण निराला', तो बकौल प्रसिद्ध नवगीतकार डॉ० शम्भुनाथ सिंह ‘समय की शिला' पर ही अंकित है। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम निराला को ‘महाप्राण' और महादेवी को ‘महीयसी' की संज्ञा दी, जो कालान्तर में इन दोनों काव्य विभूतियों के नामों का ही हिस्सा हो गई। आचार्य नन्द दुलारे वाजपेई और प्रोफेसर नामवर सिंह, छायावाद के विषय में उनके अवदान को मुक्त मन से स्वीकार करते हैं।

इलाहाबाद और छायावाद को रचनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखना बेहद रोमांचकारी है। साहित्य का इतिहास तो इलाहाबाद के नाम से ही जाना जाएगा। पौराणिक संदर्भों में भले ही इसे ‘प्रयागराज' कहा जाए, साहित्य की चेतना तो इसे इलाहाबाद ही कहेगी, छायावाद इस नाम की छाया में ही फला-फूला है। पंत, निराला, महादेवी की कविताओं में, गीतों में जो सांस्कृतिक चेतस हैं, वो यहीं साँस लेता है। महाप्राण निराला ने ‘पल्लव' की भूमिका में अपनी तरह से छायावाद की व्याख्या की है। वह छायावाद को रहस्यमयता से निकालकर 'नवता' की परिकल्पना करते हैं, तभी तो वह अपनी सरस्वती वंदना में खुलकर अपना नव स्वर अनुगुजित करते हुए कहते हैं-

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कण्ठ नव, जलद मंद रव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दें!

उनकी ‘नवता' की यह पुकार कुबूल होती है और छायावाद को मिलते हैं नए अर्थ-क्षितिज।

इसी इलाहाबाद में रहते हुए निराला ने यह भी लिखा-

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर

यह रचते हुए वास्तव में वह छायावाद के मंगलद्वार से बाहर आते हुए दिखाई देते हैं। जब वह कहते हैं, 'आज मन पावन हुआ है, जेठ में सावन हुआ है', तो वह छायावाद का सावन तो होता ही है, उससे आज के नवगीत की आहट मिलनी भी शुरू हो जाती है। मुझे लगता है निराला की ‘नवगति' ही आज के नवगीत की पीठिका भी बनी है।

इस प्रसंग में बरबस एक संदर्भ याद आता है। मेरे नवगीतकार पिता उमाकांत मालवीय इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में निराला जी से मिलने जाया करते थे। यह संस्मरण कभी पिता से ही सुना था, जब वह निराला जी को याद करते हुए यह वाकिया सुनाते थे तो उनका चेहरा स्मृतियों के आलोक से दिपने लगता था। पिता ने एक गीत रचा था-

सुधि साँकल कसमस प्राण कसे
ओ अन्तर्यामी किस गाँव बसे

छायावाद के शीर्ष पुरुष और हिन्दी कविता के स्वाभिमान स्वयं निराला, इलाहाबाद की पुण्यभूमि पर मुग्ध भाव से यह गीत सुनते रहे। गीत जब समाप्त हुआ तो बोले, "एक काम करो! अपना यह गीत मुझे दे दो। मेरा नया गीत संग्रह आ रहा है, उसमें एक गीत कम पड़ रहा है। तुम यह गीत मुझे दे दोगे तो मेरा संग्रह सम्पूर्ण हो जाएगा।"

यह सुनते हुए पिता की आँखें छलछला आई थीं। बजाय यह कहने के कि तुमने मेरे स्तर का गीत रचा है। एक नए रचनाकार के उत्साहवर्द्धन का ऐसा तरीका कि स्वयं निराला एक नए गीतकार से उसका गीत माँग रहे हैं। पिता ने निराला के पाँव पकड़ लिए थे। उसी क्षण निराला ने पिता से पूछा, "क्या अभी तक तुम्हारा कोई काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ?" पिता ने मायूसी से कहा था, "यह अभी तक सम्भव नहीं हो पाया। दलबंदी के दलदल में भला कौन किसे पूछता है।" यह सुनकर निराला जी के चेहरे पर एक अमर्ष-सा उग आया था। उन्होंने पिता से लगभग ललकारते हुए कहा था, "दलबंदी के इस दलदल में समझो निराला किसी बड़े पत्थर की भाँति पड़ा है, रखो वक्ष पर पाँव और आगे बढ़ जाओ।"

आज तो दलबंदी का दलदल और भी गहराया है, पर निराला जैसा आश्वस्ति का स्वर ही कहीं खो गया है।

कविवर सुमित्रानंद पंत तो छायावाद की रेशमी छाया जैसे ही थे। ‘बाले तेरे लाल जाल में कैसे उलझा दें लोचन' रचने वाले प्रकृति के इस सुकुमार कवि की सर्जनात्मक वन ने छायावाद की वट वृक्ष जैसी छाया में धूप-किरणें रोप दी हैं। याद आता है, इलाहाबाद आकाशवाणी के बच्चों के लिए प्रसारित होने वाले ‘बालसंघ' कार्यक्रम के लिए उनसे कभी हम बच्चों ने एक लम्बा साक्षात्कार लिया था, मैंने शरारत से पूछ लिया था, “अच्छी कविता लिखने के लिए बड़े-बड़े बाल रखने के अलावा और क्या करना पड़ता है?' पंत जी प्रश्न सुनकर किसी बच्चे की तरह ही खिल उठे थे। उनका खिला हुआ चेहरा आज भी याद आता है। छायावाद को उन्होंने हिमालय जैसी ऊँचाइयाँ दी। उनकी कविताओं में देवदार की छाया है, तो हिमशिखरों की धवलिमा भी है। प्रकृति की गोद कौसानी से आकर साहित्य तीर्थ इलाहाबाद को उन्होंने और भी अतिरिक्त आभा दे दी थी। एक तरफ महादेवी जी, निराला जी को राखी बाँधती थीं, तो दूसरी तरफ पंत जी बड़े भाई की तरह महादेवी जी को डाँट भी लेते थे।

उन्हीं दिनों के इलाहाबाद में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘एकला चलो रे' की तर्ज पर महादेवी जी रच रही थीं, ‘पंथ रहने तो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला।' छायावाद की एक प्रतिनिधि पंक्ति के रूप में 'मैं नीर धरी दुख की बदली' को स्मरण किया जाता है। यह महादेवी का ही अंतस था कि वह लिख सकीं, ‘सब आँखों के आँसू उजले, सबके सपनों में सत्य पला।' वह हिन्दी कविता की 'दीपशिखा' हैं, छायावाद की धूप हैं, गीत के मन्दिर का जलता दिया हैं, वह कहती हैं-

यह मन्दिर का दीप, इसे नीरव जलने दो!

यह मन्दिर का दीप, इसे नीरव जलने दो! छायावाद के वृक्ष को इलाहाबाद की उर्वर धरती मिली, उसकी छतनार छायार में आगे आने वाली भविष्य की कविता का भी पथ प्रशस्त हुआ, यह हमारी हिन्दी के लिए अत्यन्त मंगलमय साबित हुआ। वह समय बीतकर भी आज बीता हुआ नहीं लगता। वह तो अन्वय अतीत है। अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि उसे कमलेश्वर के शब्दों हम सब परवर्ती रचनाकारों का 'आगामी अतीत' कहा जाए।

इलाहाबाद अपने इन शिखर रचनाकारों और छायावाद को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता है।

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रचनाकार परिचय

यश मालवीय

ईमेल : artiyash23@gmail.com

निवास : इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 18 जुलाई, 1962
जन्मस्थान- कानपुर
शिक्षा- इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक
साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन। प्रमुख रूप से नवगीत लेखन। कवि सम्मेलनों में भागीदारी के अतिरिक्त दूरदर्शन, आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से रचनाओं का प्रसारण, पत्र-पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन।
प्रमुख कृतियाँ- ‘कहो सदाशिव’, ‘उड़ान से पहले’, ‘एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में’, ‘बुद्ध मुसकुराए’, ‘कुछ बोलो चिड़िया’, ‘रोशनी देती बीड़ियाँ’, ‘नींद काग़ज़ की तरह’, ‘समय लकड़हारा’, ‘वक़्त का मैं लिपिक’, ‘एक आग आदिम’, (नवगीत-संग्रह); ‘चिंगारी के बीज’ (दोहा-संग्रह); ‘इंटरनेट पर लड्डू’, ‘कृपया लाइन में आएँ’, ‘सर्वर डाउन है’ (व्यंग्य-संग्रह); ‘ताक धिनाधिन’, ‘रेनी डे’ (बालगीत-संग्रह); एक नाटक ‘मैं कठपुतली अलबेली’ भारत रंग महोत्सव, नई दिल्ली में मंचित।
सम्मान- दो बार उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘निराला सम्मान’, संस्थान का ही ‘सर्जना सम्मान’ व ‘उमाकांत मालवीय सम्मान’, मोदी कला भारती मुम्बई का ‘युवा कविता सम्मान’, परम्परा का ‘ऋतुराज सम्मान’, ‘शकुतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार’।
संपर्क- ए-111, मेंहदौरी कॉलोनी, रामेश्वरम, उमाकांत मालवीय मार्ग, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)- 211004 
मोबाइल- 6307557229