Ira Web Patrika
जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

निशा भास्कर की लघुकथाएँ

निशा भास्कर की लघुकथाएँ

खाने की प्लेट टेबल पर रख वह लैपटॉप के सामने आकर बैठ गई। खुली खिड़की के सामने अमलतास की घनी छायादार शाखाएँ लहरा रही थीं। अपने दांपत्य जीवन का शुभारंभ मैंने पति महेश के साथ इस पौधे को लगाकर किया था। आज यह विशाल वृक्ष बन गया है। किन्तु फूल...?

आँचल में बसंत

पाँच साल हो गये, नई बहुरिया के आये हुए। पर अब तक कोई ख़ुशख़बरी...? रमिता प्रश्नात्मक दृष्टि से सुमन को देखती हुई बोली।
"अरे जीजी! आजकल के बच्चे नौकरी और कैरियर के चक्कर में बच्चे पैदा करना भूल जाते हैं।" मुँह बिचकाकर सुमन बोली।
'वर्क फ्रॉम होम' कर रही रमा लंच के लिए रसोई में जाते वक्त रमिता काकी और अपनी सास की बातें सुन, चेहरे पर बिखरी लटों को पीछे झटक कर, इस तरह रसोई की ओर बढ़ी, जैसे उसे इन बातों से कुछ फ़र्क नहीं पड़ने वाला। लेकिन उसके चेहरे की रंगत और आँखों की नमी कुछ और ही बयां कर रही थी।

खाने की प्लेट टेबल पर रख वह लैपटॉप के सामने आकर बैठ गई। खुली खिड़की के सामने अमलतास की घनी छायादार शाखाएँ लहरा रही थीं। अपने दांपत्य जीवन का शुभारंभ मैंने पति महेश के साथ इस पौधे को लगाकर किया था। आज यह विशाल वृक्ष बन गया है। किन्तु फूल...?

विवाह के दो साल के बाद फेमिली प्लानिंग के बारे में हमने सोचना शुरू कर दिया। डॉक्टर से इलाज भी ले रहे हैं। अब क्या करें? स्वयं से बातें करते हुए हृदय की वेदना आँसू बनकर टप-टप टपक पड़े। जिसे साफ कर उसने बेपरवाही से बिखरे बालों का जूड़ा बना लिया। सामने पसंदीदा लंच मटर-मशरूम की सब्जी और चपाती रखा था, जिसे देखकर उसका जी मिचलाने लगा। वह खड़ी हुई, किन्तु अचानक चक्कर आने के कारण उसका हाथ टेबल पर रखी प्लेट से जा टकराया।

कुछ गिरने की आवाज़ सुनकर रमिता काकी और सुमन कमरे में दौड़ी आईं। रमा बेहोश पड़ी थी। कुछ देर बाद रमा ने आँखें खोलीं तो सामने डॉक्टर और रमिता काकी ने मुस्कुराकर कहा, "बहुत-बहुत बधाई रमा!"
सुमन अपनी बहू का सिर सहला रही थी। उसका माथा चूमकर बोली, "जुग-जुग जियो।"

ख़ुशी से अवरुद्ध उनका कंठ और आँखों से झरते आँसू देखकर रमा को समझते देर न लगी कि वह माँ बनने वाली है। वह सँभल कर बैठी और खिड़की के बाहर देखकर मुस्कुरा उठी। अमलतास का वृक्ष वैसे ही लहरा रहा था, जैसे फूलों के आने की ख़बर उसे मिल गई हो।

 

 

आस्था

अम्मा जी को पूजा की डलिया सजाते देख, रोज़ की भांति भानु अपनी तोतली बोली में बोला, "अम्मा! भानु भी जाएगा मंदिल।"

अच्छा-अच्छा ज़रूर चलना बेटा, कहते हुए अम्मा जी ने बहू को इशारा किया कि भानु को दूसरे कमरे में ले जाए। ताकि वह जब मन्दिर जाएँ तो भानु उन्हें जाते देखकर जाने की ज़िद न करें। अम्मा जी पास के शिव मन्दिर में प्रतिदिन पूजा करने जाती हैं। साथ में अपने तीन वर्षीय पोते भानु को भी ले जाती थी। कल पूजा करने के बाद भगवान की मूर्ति के सामने भानु ने प्रणाम करने के लिए सिर झुकाया तो वह मूर्ति पर चढ़ाए हुए प्रसादस्वरूप केले को मुँह में दबाए खड़ा हो गया। बच्चे की बाल सुलभ क्रीडा को देख कुछ श्रद्धालुजन हँसने लगे। तो कुछ श्रद्धालू उसके अधिक शरारती होने और पूजा में विघ्न डालने की शिकायत करने लगे।

मन्दिर का पुजारी एकदम से भड़क कर बोला, "बहन जी, यह बच्चा बहुत शरारती है। आप इसे लेकर मन्दिर न आएँ। देखो! इसने आज भगवान का भोग ही जूठा कर दिया। पूजा के साथ-साथ लोगों की आस्था और मन्नतों का चढ़ावा होता है।" पुजारी जी ने अम्मा की ओर मुखातिब होकर, उन्हें हिदायत देते हुए कहा, "माफ़ी माँगो भगवान से और उस व्यक्ति से भी जिसने यह प्रसाद भगवान को भोग लगाया था।"

अम्मा जी सकुचाती हुई हाथ जोड़े, उस व्यक्ति को मूकदृष्टि से ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी कि देखा अठ्ठाईस-उनतीस साल की एक विवाहिता भानु को गोद में बिठाकर स्नेह से केला खिला रही थी। वह महिला पुजारी जी से मुखातिब हो कर बोली, "आप किस तरह के पुजारी हैं? जो बच्चे की निश्छलता पर मुग्ध नहीं हो सकता, वह ईश्वर के प्रति आस्था कैसे रख सकता है? एक बच्चे से प्रेम कर नहीं पाते और ईश्वर से प्रेम का ढोंग दिखाया जा रहा है!" और अम्मा जी की तरफ देखकर बोली, "माँ जी आपको किसी से क्षमा माँगने की जरूरत नहीं है। मैं ख़ुश हूँ, बहुत अच्छा महसूस कर रही हूँ। आज मेरे द्वारा चढ़ाए भोग को ईश्वर ने बालरूप में आकर स्वीकार किया है।" अम्मा जी ने भगवान की मूर्ति के सामने सर झुका कर क्षमा याचना की। पोते के लिए दुआएँ की। फिर उस महिला की गोद से भानु को लेते हुए कहा, "बेटी, तुम्हारे प्रेम और आस्था से प्रसन्न होकर शीघ्र ही ईश्वर तुम्हारी मनोरथ पूर्ण करेंगे।"

उस महिला ने मुस्कुराकर अम्माजी के पाँव छू लिए।

 

 

ठिकाना

"पूरे एक साल बाद अपने ठौर पर आप वापस आई हो। कुछ ख़बर भी नहीं मिलती थी कि आप किसके पास हो? बेटे के पास हो कि बेटी के पास?" पड़ोसन की आवाज़ से मिलने की ख़ुशी और मन की व्याकुलता का स्पष्ट पता चल रहा था।

"अरे बेटे के होते बेटी के यहाँ, इतने महीने क्यों रहना? मैं तो अपने बेटे-बहू और पोते के साथ थी। पता ही नहीं चला कि एक-एक महीना कैसे बीत गया और साल हो गया।" मैं अपने चेहरे पर झूठी हँसी का लेप चढ़ा कर बोली।

"हाँ, मैं तो यूँ ही पूछ ली। ख़ाली पड़ोस अच्छा नहीं लग रहा था। अब आप आ गई तो ठीक है।" उसने मेरे लिपे-पुते चेहरे को गहरी नज़रों से देखा और मेरी आँखो के भीतर झाँकने लगी।

मैं असहज हो, उससे नज़रें चुरा कर बोली, "मैं आपके लिए कुछ खाने के लिए लेकर अभी आती हूँ।"
मैं बैठक से उठकर कमरे की तरफ जाने लगी। कमरे से बेटे मोहित की आवाज़ आ रही थी। वह अपने जीजू से बोल रहा था। क्या हुआ यदि माँ आपके पास रहती है। उनके रहने का आधा ख़र्च, हर महीने मैं आपको देता तो हूँ। उनका मन अपनी बेटी-दामाद में लगा रहता है और वह वहाँ ख़ुश भी रहती है।

"वह खुश नहीं रहती है मोहित! वह हमारे पास रहती जरूर है, पर उनके प्राण अपने बेटे-बहू और पोते में अटका रहते हैं। फिर मेरी भी मजबूरी समझो, मेरे भी माता-पिता गाँव में अकेले रहते हैं। उन्हें भी सेवा की जरूरत है। उनके प्रति भी तो मेरा कर्तव्य है।"
मोहित झल्लाकर बोला। अरे यार! यह कर्तव्य बेटों को ही क्यों निभाना है? बेटियों को क्यों नहीं?

दामाद जी समझाते हुए बोले, "देखो मोहित, अभी तुमने सुना, पड़ोस की चाचीजी से माँ ने क्या कहा? वे पूरा साल अपनी बेटी-दामाद यानी हमारे पास रहीं। लेकिन उन्हें यह बात बताने में शर्म आई।" उन्होंने कहा, मैं अपने बेटे के पास रहकर आई हूँ। वे थोड़ा ठहर कर बोले। मोहित तुम्हें शर्म नहीं आई, यह बात सुनकर? तुमने क्यों नहीं कहा कि नहीं, माँ मेरे पास नहीं, मेरी बहन निकिता के पास रहकर आई हैं। तब तो तुमने मुस्कुरा कर माँ की बातों को मौन स्वीकृति दी।

"हाँ, तो क्या कहता कि मेरी पत्नी, मेरी माँ की शक्ल भी देखना नहीं चाहती है।" उसने अपने दोनों हाथों को ज़ोर से ऊपर ले जाकर नीचे की ओर झटका और बोला, "माँ का क्या? वह तो आठ-दस साल में निकल लेगी। मेरा साथ तो मेरी पत्नी और मेरे बच्चे ही निभाएँगे।"

इससे ज़्यादा मैं सुन न सकी। मैं जिस दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी। वह हिल रही थी। सुनने की शक्ति ख़त्म हो गई थी। दामाद जी की भी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ रही थी। चारों ओर घोर सन्नाटा, मेरी आँखें पथराने लगीं कि पड़ोसन ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, "कोई बात नहीं जीजी! 'घर-घर देखा एक ही लेखा।'" मेरी उँगली थामे वह बैठक में आई।

मैं बेजान-सी सोफे पर बैठ गई। उसने मुझे सजल नेत्रों से देखा और टेबल पर रखे जग से गिलास में पानी डालकर मेरी ओर बढ़ा दिया।

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

निशा भास्कर

ईमेल : nisha.bhaskar71@gmail.com

निवास : नई दिल्ली

जन्मतिथि- 19 मार्च, 1971
शिक्षा- स्नातकोत्तर
सम्प्रति- दिल्ली शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत अध्यापन।
प्रकाशन- बारिश की बूँदें (लघुकथा-संग्रह), रवानगी (कहानी-संग्रह), पवित्र मिट्टी (कविता-संग्रह)
संपादन- लघुकथा : समकालीनों से संवाद (साक्षात्कार-संग्रह), स्पंदन (काव्य-संग्रह)
अन्य गतिविधियाँ- लघुकथा दर्पण मंच, इंदौर से मासिक कार्यक्रम भेंटवार्ता एवं लघुकथा संगोष्ठी की संयोजन एवं मंच संचालन।
सम्मान/पुरस्कार- भारत उत्थान न्यास मंच से विशिष्ट वक्ता पुरस्कार, गृहस्वामिनी अंतरराष्ट्रीय और वर्ल्ड राइटर्स फोरम द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में 'प्रतिभागी सम्मान' से सम्मानित। लेखन प्रतियोगिकथा दर्पण साहित्य मंच से संयोजक और संचालन हेतु सम्मानित। सिरसा, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच से श्रेष्ठ लघुकथा लेखन के लिए सम्मानित एवं प्रयागराज में सारस्वत साहित्य सम्मान- 2024 से सम्मानित, जयपुर साहित्य संगीति से 'रवानगी' कहानी संग्रह कृति सम्मान से सम्मानित।
सम्पर्क- आर ज़ेड एफ- 41A/26, साधनगर- 2, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली- 110045
मोबाइल- 9868533100