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डॉ. अशोक गुजराती की लघुकथाएँ

डॉ. अशोक गुजराती की लघुकथाएँ

डॉ. अशोक गुजराती की लघुकथाएँ हमारे समाज और राजनीति के खोखले ढकोसलों पर बड़े सलीक़े से चोट करती हैं। ये बहुत बारीकी के साथ अपनी रचनाओं की बुनावट करते हैं और जहाँ ज़रूरत होती हैं, वहाँ कटाक्ष कर मार्मिक प्रहार करते हैं। इनकी लघुकथाओं में हमारा समय अपने भले-बुरे दोनों पक्षों के साथ चित्रित होता है। प्रस्तुत रचनाएँ रचनाकार के सामर्थ्य को पूरी तरह उजागर करती हैं।

- के० पी० अनमोल

युयुत्सा

टी.वी. के एक चैनेल पर युद्ध की ख़बरें लगातार आ रही थीं। दोनों दुश्मन देश की सेनाएँ एक-दूसरे पर आधुनिक हथियारों से वार-प्रतिवार करने में मुब्तिला थीं।
पति ग़ुस्से में पत्नी को डांट रहा था- "तुमको इतने सारे ‘फ्रेंड्स’ फ़ेसबुक पर बनाने की क्या ज़रूरत है?"
पत्नी पलटवार कर रही थी- "ये मेरी अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी है। मैं लेखिका हूँ तो दोस्त- चाहे पुरुष हो या स्त्री- बनेंगे ही।"

दूसरे दिन भी टेलीविज़न वही समाचार पूरे जोशो-ख़रोश से प्रसारित करने में लगा हुआ था। इस देश के इतने ज़ख़्मी हुए, उस देश के इतने मारे गये- इत्यादि।
पत्नी आग-बबूला थी- "मैंने तुम्हारे मोबाइल पर देख लिये हैं सारे संदेश। ये कौन-कौनसी औरतें हैं, जो तुम्हारे संपर्क में बनी हुई हैं?"
पति ने तुरंत कुछ क्रोध में प्रत्युत्तर दिया- "ये मेरे ही अधीन कार्य करने वाली हमारी कंपनी की प्रतिष्ठित महिलाएँ हैं। मुझे अपने काम के लिए इनके साथ फ़ोन-मैसेज में लगा रहना होता है।"

एक पखवाड़ा बीता। सभी चैनेलों पर यही दोहराया जा रहा था- 'युद्ध-विराम घोषित हो गया है।'
पति-पत्नी की ऊँची-ऊँची आवाज़ें आपस में गड्डमड्ड हो रही थीं-
"तुम कल उसके साथ लंच पर..."
"मैंने भी तुम्हें आज कार में उसके संग..."
"तुम लंच के बाद होटल में क्यों रुकी रही..."
"तुम उसे कार में उसके घर ले जाने पर भीतर दो घण्टे तक..."

 

 

वाइड का चौका

उस देश में सब कुछ ठीक चल रहा था। सत्ताधारी दल सरकारी वित्तीय एवं जाँच एजंसियों के माध्यम से चुन-चुन कर विपक्ष के ज़्यादा मुखर व प्रभावी नेताओं-कार्यकर्ताओं-अधिकारियों पर कार्रवाई कर रहा था। कई विपक्षी नेता तो इस डर से सत्तारूढ़ पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर अपने-आपको बचा ले रहे थे। कितने ही नेताओं को कस्टडी में दिन गुज़ारने पड़ रहे थे। उनके ख़िलाफ़ लगे आरापों की सुनवाई धीरे-धीरे अदालतों के प्रांगण में पहुँच रही थी।

अचानक देश भर में हुए चुनावों ने चमत्कार कर दिया। सत्ता में बैठी पार्टी पटखनी खाकर चारों ख़ाने चित हो गयी थी। अब सत्ता विपक्ष के एक पुराने दल के हाथों में आ गयी।

वैमनस्य की राजनीति की परिपाटी डाली जा चुकी थी। नयी सरकार भला क्यों अपना अधिकार छोड़ती! उसने भी वही खेल शुरू कर दिया। इस बार पहले की सरकार के मंत्री-संत्री सारे उनके निशाने पर थे। उनके अपने पूर्व-आरोपित नेताओं में कुछेक जो प्रारंभिक चरण में थे अथवा जिन पर कोर्ट में केस दाख़िल होने को थी, वे तो आराम से रिहा हो गये। लेकिन कई नेता जिन पर तारीख़ें पड़ रही थीं या ज़मानत पर फ़िलहाल बाहर भी थे, भविष्य में उनके आरोपों की सच्चाई उन्हें भयंकर मुसीबत में डाल सकती थी। दूसरी ओर हारी हुई पार्टी से संबद्ध नेता आदि क्रमशः क़ानून के भंवर में फँसते जा रहे थे। इस दहशत ने निश्चित ही समूचे देश में भ्रष्टाचार की जड़ें भी ज़रा खोखली की ही थीं।

इस प्रकार कई भ्रष्ट लोगों की पोल खुल रही थी, चाहे वे इस दल के हों या उस दल के। राजनीतिक दुश्मनी के इन दाँव-पेचों के चलते अनेक बेईमानों को उनके कुकृत्यों की सज़ा मिलने जा रही थी, अन्यथा तो वे छुट्टे सांड की तरह इतराते हुए समाज का भला करने के बजाय ख़ुद का घर भरने में लगे हुए थे। आम आदमी के लिए यह प्राप्ति क्रिकेट में मिले वाइड के चौके के सदृश प्रसन्नता लाने वाली साबित हो रही थी।

 

 

विश्वास की मिठास

मैंने देखा कि बहुत सारे फल थे उसकी ठेली पर। मैं रुका और पपीते की क़ीमत पूछी। वह बोला, "साब, आपसे ज़्यादा थोड़े न लूँगा। सिर्फ़ तीस रुपए किलो।"
मैंने कहा, "बराबर लगाओ और एक छोटा पपीता तौल दो।"
उसने एक पपीता निकाला। वज़न डेढ़ किलो के क़रीब था। मैंने पूछा, "कितना हुआ?"
उसने हिसाब लगाया- "सर, पैंतालीस हुआ पर आप चालीस दे दो।"
मुझे अच्छे की पुष्टि करनी थी- "भैया, मीठा तो है?"
वह तुरंत बोला, "काट कर दिखा देता हूँ।"
मैंने उसे रोका- "नहीं। मैं भरोसे पर लेता हूँ। भरोसे को मत काटो।"
पता नहीं क्या हुआ कि उसने उस पपीते को रख दिया और दूसरा एक पपीता देते हुए केवल पैंतीस रुपए की माँग की। मैंने दे दिये।
घर आकर खाया तो पपीता वाक़ई बेहद स्वादिष्ट था, बेईमानी को ईमानदारी में बदलने की तरह।

 

 

आक्रोश

संगीता बहुत उलझन में थी। अल्फ़ाज़ से उसके प्यार की वे तमाम यादें उसे मुसलसल व्यथित करती रहती थीं। देखा जाए तो ऐसा कुछ भी बेहद गंभीर उनके बीच नहीं गुज़रा था कि एक झटके में समूचे सम्बन्ध, सारी क़समें, सभी वादे ख़त्म हो जाते। बस, थोड़ी-सी ग़लतफ़हमी और सब अभिन्नता औपचारिकता की सीमा के भीतर कुलबुलाने को विवश हो गयी थी।

कितनी ही शामें, धुंधलके के वे आलिंगन, एक-दूजे के वास्ते जान न्योछावर करने का अक़ीदा कहाँ जाकर गुम हो गये, वह समझ नहीं पायी। अल्फ़ाज़, उसके भाई मदिर का दोस्त, बचपन से ही जब-तब घर आता रहता था, माँ ने उसे अपना दूसरा बेटा मान लिया था। उसे भी वह मदिर की बड़ी बहन का दर्ज़ा हमेशा देता रहा। फिर एक दोपहर वे दोनों अकेले अनायास बातों-बातों में आपसी अंतरंगता के तानों-बानों में उलझे जाने कैसे मंज़िल-दर-मंज़िल आगे बढ़ते चले गये, वे क़तई नहीं जान पाये।

इसके बाद आया वह दंगे-फ़साद का दौर। कहीं धर्म रुकावट बना उन्हें अलगाता रहा और जब मुमानी जान- जी हाँ, यही संबोधन था संगीता का अल्फ़ाज़ की अम्मी की ख़ातिर- का किसी हिन्दू ने मज़हब के जोशो-ख़रोश में क़त्ल कर दिया, फ़ासला बढ़ता गया। भला इसमें कहाँ तो दोषी थी संगीता, मदिर या उसका धर्मनिरपेक्ष परिवार। कटे हुए पर मरहम-पट्टी का असर भी नहीं हुआ। हाँ, वह मदिर से कालेज में अक्सर- उखड़ी-उखड़ी सही- बातचीत करने लगा था। फिर माँ से कभी-कभार मिलने आने लगा। एकांत मिलते ही संगीता ने उसे समझाने का प्रयास किया लेकिन अल्फ़ाज़ का यह नपुंसक अंदेशा कि बेमतलब है यह प्रेम, जिसे मंज़िल तक कट्टरता कभी जाने न देगी, उसे भी विचलित कर गया। आख़िर वह एक लड़की थी!

अल्फ़ाज़ की बेरुख़ी की वजह से वह भी धीरे-धीरे विपरीत दिशा में सोचती चली गई। घनिष्ठता के तंतु एक बार विघटित हुए और चुंबक के सम ध्रुवों की तरह विकर्षित होते चले गये। तभी किसी रईस जाने-माने हिन्दू खानदान के पढ़े-लिखे लड़के का उसके लिए रिश्ता आया, जो माँ-पिताजी-मदिर सबको बेहद पसंद आया। बावजूद, कहीं कोई संभावना की धूसर किरण थी या जीवन के प्रति उसकी बढ़ती उदासीनता, उसने इनकार कर दिया।

और उस दिन! अल्फ़ाज़ और मदिर कहीं बाहर से साथ-साथ आकर बैठक में बैठ गये। घर के सब लोग टीवी पर ख़बरें देख रहे थे। पता नहीं माँ ने जानते-बूझते या ऐसे ही टी.वी. बंद करते हुए संगीता के वास्ते आये विवाह के संदेश का ज़िक्र छेड़ दिया। संगीता ने नज़रें चुराते वीतराग अल्फ़ाज़ की तरफ़ देखा, उसकी उपस्थिति को महसूस किया और बेखटके ऊँची आवाज़ में माँ के ज़िद्दी सवाल का जवाब फ़ौरन दे दिया- "मैं तैयार हूँ, माँ!"

 

 

चक्र

सुबह-सुबह किसलय अख़बार पढ़ रहा था। उसकी पत्नी राशि उसके पास आयी और बोली, "सुनते हो, पता नहीं क्या हो गया, आज सवेरे से मेरी कमर में बहुत दर्द हो रहा है।"

किसलय ने अख़बार में एक स्थान पर उंगली रख, एक नज़र राशि की तरफ़ देखा और व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा, "तुम ऐसा क्यों नहीं करती- सिर्फ़ बदन के उस हिस्से का नाम ले लिया करो, मैं समझ जाऊंगा कि उस दिन उस जगह दर्द है। रोज़-रोज़ पूरा वाक्य कहने की क्या ज़रूरत है?" और वह फिर अख़बार में डूब गया।

राशि मुँह लटकाए भुनभुनाती हुई रसोई में जा घुसी। तभी गिन्नी बाहर से दौड़ता हुआ आया। एक क्षण के लिए रुककर उसने अपने पिता को अख़बार में खोया हुआ देखा और किचन का रुख़ किया। मम्मी का आँचल खींचते हुए वह अपनी ही धुन में बोल पड़ा- "मम्मी-मम्मी, वह निशीथ कहता है कि गावसकर की चौंतीस सेंचुरीज़ हैं, आप बताओ- पैंतीस हुई हैं न?"

राशि ने एक झटके से अपनी साड़ी छुड़ाते हुए उसे डांटा- "तुझे और कोई काम नहीं है क्या क्रिकेट के सिवा? चल जा यहाँ से, मुझे रोटी बनाने दे।"

गिन्नी गुमसुम-सा रसोई की हद से बाहर आया। किसलय ने, जो उनकी बातें सुन ही रहा था, दरवाज़े से आँगन की ओर जाते गिन्नी को पुकारा- "गिन्नू, मेरे कमरे से मेरा पेन तो लाना!" लेकिन गिन्नी अनजान बना बाहर निकल गया। ग़ुस्से से भरे किसलय ने पुनः आवाज़ लगायी- "गिन्नी!" पर तब तक तो गिन्नी पड़ोस में अपने मित्र के घर पहुँच चुका था। किसलय, आँखें बंद किए आराम-कुर्सी से टेक लगाये, कुछ देर सोचता हुआ यूँ ही पड़ा रहा।

चंद दिनों बाद राशि ने फिर शिकायत की- "मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है, किसलय. क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता।"
किसलय ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा- "तुम लेट जाओ, मैं बाम लगा देता हूँ। अभी दर्द उड़न-छू हो जाता है।"

थोड़ी देर बाद जब गिन्नी स्कूल से लौटा तो हमेशा की तरह एक सवाल के साथ। काम में व्यस्त राशि से उसने पूछा, "मम्मी, महाभारत’ में कृष्ण और उनके पिता दोनों को वासुदेव ही क्यों कहा गया है?"
हाथ में पकड़ा बेलन बाज़ू में रखते हुए राशि ने उसे अपने क़रीब खींचा और उसके बाल सहलाते हुए उत्तर दिया- "तुम्हारा ख़याल ग़लत है बेटे, कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था जबकि कृष्ण को अनेक नामों की तरह वासुदेव कहकर भी बुलाते हैं।"

तभी पापा की आवाज़ गिन्नी ने सुनी- "गिन्नी बेटा, ज़रा एक गिलास पानी देना।"
गिन्नी ने झट दौड़कर फ्रि़ज की बोतल से गिलास में ठण्डा पानी उंडेला और पापा को गिलास ले जाकर थमा दिया।

 

 

अंतर

बड़े बाबू ने चपरासी हरेलाल को आवाज़ देकर बुलाया। उसके पास आने पर वे खड़े हुए और ज़ोर से बोले, "सब लोग सुनो भाई!" उनका इतना कहते ही ऑफिस के शेष पाँचों कर्मचारी अपना काम रोककर उनकी दिशा में देखने लगे। पूरे हॉल में सूई-पटक सन्नाटा व्यापते ही बड़े बाबू ने अपना चश्मा कपाल पर चढ़ाते हुए भाषण की मुद्रा में अपना बोलना जारी किया- "आज हरेलाल जी का जन्मदिन है। उनको आप बधाई देंगे तो वे नाश्ता-पानी का इंतज़ाम ज़रूर करेंगे...।"

हरेलाल ने उनकी तरफ़ परेशान नज़रों से देखा। वे उसकी हताश अस्त-व्यस्तता को ताड़ गये। जेब से फ़ौरन सौ का नोट निकाल; उसकी ओर बढ़ाया- "हम हैं न, फ़िक्र क्यों करते हो!"

थोड़ी देर में एक गुलाब जामुन, एक समोसा और चाय की आधी-आधी प्याली सारे सहकर्मियों के आगे हरेलाल ने हाज़िर कर दी। हँसी-मज़ाक़ करते हुए यह छोटी-सी पार्टी चलती रही...।

ऑफिस से छुट्टी होने पर हरेलाल शाम को अपने घर जाने के लिए निकला। झोपड़पट्टी की तंग गलियों से गुज़र कर, उसने ज्यों ही खुले दरवाज़े की दहलीज़ पर क़दम रखा, अंदर कमरे में उसके दो दोस्त चारपाई पर बैठे दीखे। ये दोनों भी उसी की तरह अलग-अलग कार्यालयों में दरबान और सुरक्षाकर्मी की नौकरी करते थे और नज़दीक ही रहते थे।

हरेलाल को देखते ही वे उठे और बारी-बारी से गले मिलकर उसे सालगिरह की मुबारकबाद दी। हरेलाल ने अपनी पत्नी को उनके लिए चाय बनाने को कहा तो उनमें से एक बोला, "चाय रहने दे यार, आज तो मिठाई से तेरा मुँह मीठा करेंगे...।"

दूसरे ने साथ लाया डिब्बा खोला और हरेलाल के मुँह में एक बर्फ़ी देते हुए गाया, "तुम जियो हज़ारों साल...।"

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रचनाकार परिचय

अशोक गुजराती

ईमेल : muzsemiliye@gmail.com

निवास : नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

संपर्क- बी- 403, निहारिका ऐब्सोल्यूट, सेक्टर- 39-ए, खारघर, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)- 410210
मोबाइल- 9971744164