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योगराज प्रभाकर की लघुकथा 'अदृश्य आघात' पर सीमा सिंह की मीमांसा

योगराज प्रभाकर की लघुकथा 'अदृश्य आघात' पर सीमा सिंह की मीमांसा

असली आघात वह है जो घर के भीतर, आत्मीयता के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले घेरे में घटित होता है। थकी-हारी पत्नी का दफ्तर से लौटना और अपने जीवनसाथी से सहानुभूति की अपेक्षा करना एक स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया है।

आज वह ऑफ़िस से देर रात घर लौटी थी-थकी-हारी और चेहरे पर हताशा के भाव लिये। दरवाज़ा खुला मिला। पति भीतर बैठा था- टी.वी. की रोशनी चेहरे पर पड़ रही थी; लेकिन आँखों में कोई प्रतीक्षा नहीं थी।
"आज बहुत देर हो गई।" वह बोली।
"हूँ।" रिमोट पर उँगलियाँ चलते हुए उसने कहा।
"लिफ़्ट ख़राब थी, सीढ़ियों से आना पड़ा। बहुत थक गई हूँ... ऊपर से ये कमर दर्द।"
"थक गई हो, तो जाकर आराम करो।"
"आज दफ़्तर में बहुत कुछ हुआ। मूड बिल्कुल ऑफ़ है..."
"ज़्यादा मत सोचो।"
वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, "आप एक बार पूछ तो सकते थे कि क्या हुआ?"
"तुम बताना चाहो तो बता दो... मैंने मना किया है क्या?"
वह फिर चुप हो गई। पूरा कमरा शांत हो गया- इतना कि पंखे की आवाज़ भारी लगने लगी।
"मुझे आज बहुत ज़्यादा मेंटली टॉर्चर किया गया..."
पति की नज़रें टी.वी. स्क्रीन से नहीं हटीं।
फिर वह धीरे-से बोली, "नए बॉस ने पूरी टीम के सामने मुझे जानबूझकर नीचा दिखाया।"
"अच्छा!" पति की ठंडी-सी आवाज़ आई।
"पता है, उस वक़्त मैं सिर्फ़ आपको याद कर रही थी कि घर जाकर सब कुछ बताऊँगी।"
वह पलटा नहीं। बोला, "ज़्यादा टेंशन मत लो... ये तो होता है... हर जगह।"
वह उसे देखती रही- जैसे किसी अजनबी से परिचय माँग रही हो।
"तुम्हें पता है... चोट तब नहीं लगती, जब कोई पराया कुछ कहे। चोट तब लगती है, जब कोई अपना ख़ामोश रहे।"
"तो क्या करूँ? जाकर उसका सिर फोड़ दूँ?" पति भड़का।
उसने कोई उत्तर नहीं दिया... बस अपनी नज़रों को पति के चेहरे पर गड़ा दिया। उसे यूँ एकटक ताकते हुए पति ने झुंझलाते हुए पूछा, "क्या देख रही हो?"
"उसे देख रही हूँ, जो न दुख बाँटता है, न आक्रोश जताता है, न गले लगाता है... बस देखता है... या अनदेखा करता है।"
"पर मैंने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं।"
उसने अपने कमरे की ओर जाते हुए वाक्य फेंका, "तुमने कुछ नहीं कहा... तुम्हारी यही 'कुछ नहीं' तो सबसे गहरे ज़ख़्म देती है।"

कथा मीमांसा
योगराज प्रभाकर जी द्वारा रचित लघुकथा 'अदृश्य आघात' समकालीन महानगरीय जीवन की उस भयावह विसंगति को उघाड़ती है, जिसे हम 'भावनात्मक संवेदनशून्यता अथवा 'मौन हिंसा' कह सकते हैं। यह कथा मात्र पति-पत्नी के संवाद का विवरण नहीं है, बल्कि आधुनिक संबंधों में गहराते उस शून्य का दस्तावेजीकरण है, जहाँ शब्दों की उपस्थिति तो है, परंतु संवेदना का पूर्ण अभाव है। शिल्प और भाषा की दृष्टि से यह लघुकथा अपनी संक्षिप्तता में अत्यंत मारक और प्रभावी बन पड़ी है। लेखक ने अत्यंत मितव्ययता के साथ उन सूक्ष्म तंतुओं को छुआ है, जो एक रिश्ते को जीवंत रखते हैं या उसके मृतप्राय होने की घोषणा करते हैं।
इस कथा का कथ्य 'अदृश्य आघात' के इर्द-गिर्द बुना गया है। यहाँ आघात शारीरिक नहीं है, न ही वह बॉस द्वारा किए गए अपमान तक सीमित है। असली आघात वह है जो घर के भीतर, आत्मीयता के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले घेरे में घटित होता है। थकी-हारी पत्नी का दफ्तर से लौटना और अपने जीवनसाथी से सहानुभूति की अपेक्षा करना एक स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया है। वह न केवल शारीरिक थकान (कमर दर्द) से जूझ रही है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना (मेंटली टॉर्चर) के बोझ तले दबी है। परंतु, यहाँ पति का चरित्र एक ऐसे यांत्रिक मनुष्य के रूप में उभरता है जिसकी दुनिया रिमोट कंट्रोल और टीवी की स्क्रीन तक सिमट गई है। वह सुनता है, पर समझता नहीं; वह उत्तर देता है, बोलता है परन्तु संवाद नहीं करता। यहीं से इस कथा की संवेदना का विस्तार होता है।
शिल्प की दृष्टि से यह लघुकथा 'न्यूनतम में अधिकतम' कहने की कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लेखक ने कथा का प्रारंभ ही एक भारीपन के साथ किया है। "दरवाज़ा खुला मिला" और "आँखों में कोई प्रतीक्षा नहीं थी" जैसे कथा पहले वाक्य से ही पाठकों को सचेत कर देती है कि यहाँ स्वागत का भाव लुप्त है। टीवी की रोशनी का चेहरे पर पड़ना और रिमोट पर उँगलियों का चलना पति की यांत्रिकता और बाह्य दुनिया के प्रति उसकी आसक्ति को दर्शाता है, जबकि उसकी अपनी संगिनी उसके ठीक सामने टूट रही है। यह दृश्य विधान अत्यंत प्रभावी है। कथा का परिवेश एक बंद कमरे का है, जहाँ "पंखे की आवाज़" का भारी लगना उस असहज सन्नाटे को ध्वनित करता है जो शब्दों के बीच अनकहा रह गया है।
प्रस्तुति के धरातल पर योगराज प्रभाकर जी ने प्रतीकों और बिम्बों का सटीक प्रयोग किया है। "अजनबी से परिचय माँगना" एक सशक्त बिम्ब है, जो यह स्पष्ट करता है कि साथ रहते हुए भी दो लोग कैसे एक-दूसरे के लिए अपरिचित हो सकते हैं। संवादों की बुनावट इस कथा की रीढ़ है। एक ओर पत्नी के संवाद हैं जो भावना, पीड़ा और उम्मीद से लबरेज हैं, और दूसरी ओर पति के संक्षिप्त, शुष्क और औपचारिक उत्तर है,"हूँ", "ज़्यादा मत सोचो", "अच्छा!"। ये छोटे-छोटे शब्द उस गहरी खाई को दर्शाते हैं जो दो व्यक्तियों के बीच निर्मित हो चुकी है। पति का यह कहना कि "मैंने मना किया है क्या?" उसकी उस बौद्धिक चालाकी को दर्शाता है जो जिम्मेदारी से बचने के लिए तर्कों का सहारा लेती है। वह सुनने को तैयार है, पर महसूस करने को नहीं।
कथा का सबसे मर्मस्पर्शी अंश वह है जहाँ स्त्री कहती है कि "चोट तब लगती है, जब कोई अपना ख़ामोश रहे।" यह वाक्य इस पूरी रचना का केंद्रीय बिंदु है। यहाँ 'मौन' एक हथियार के रूप में प्रयुक्त हुआ है। पति की चुप्पी और उसकी उदासीनता उस 'अदृश्य आघात' की रचना करती है जो किसी भी शारीरिक प्रहार से कहीं अधिक गहरा और स्थाई होता है। जब पति अंततः भड़कता है और कहता है, "जाकर उसका सिर फोड़ दूँ?", तो यह उसकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। वह यह समझने में असमर्थ है कि उसकी पत्नी को कोई योद्धा नहीं, बल्कि एक हमदर्द चाहिए था। उसे 'समाधान' नहीं, 'संवेदना' की तलाश थी।
भाषा की बात करें तो लेखक ने बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग किया है, जिसमें 'मूड ऑफ़', 'मेंटली टॉर्चर', 'टेंशन' जैसे शब्दों का समावेश आज के शहरी मध्यमवर्गीय परिवेश को यथार्थपरक बनाता है। यह भाषा कहीं भी बनावटी नहीं लगती, बल्कि पात्रों की सामाजिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप है। भाषा में एक प्रकार की ठंडी मार है जो पाठक के भीतर तक उतर जाती है। वाक्य विन्यास चुस्त है और कथा की गति को कहीं भी बाधित नहीं होने देता।
इस लघुकथा की एक बड़ी विशेषता इसकी मनोवैज्ञानिक गहराई है। लेखक ने पुरुषों के उस मनोवैज्ञानिक ढाँचे पर प्रहार किया है जो अक्सर भावनाओं को 'तर्क' की तराजू पर तौलते हैं। पति का यह कहना कि "ये तो होता है... हर जगह", दुःख का सामान्यीकरण (Generalization) करने की वह प्रवृत्ति है जो सामने वाले की विशिष्ट पीड़ा को खारिज कर देती है। यह 'अदृश्य आघात' उस स्त्री के लिए अधिक घातक है क्योंकि वह अपने बॉस के व्यवहार से लड़ सकती है, पर अपने पति की उदासीनता के सामने असहाय है।
कथा का अंत अत्यंत प्रभावोत्पादक है। स्त्री का अंतिम वाक्य,"तुम्हारी यही 'कुछ नहीं' तो सबसे गहरे ज़ख़्म देती है",रिश्तों की कड़वी वास्तविकता को उजागर करता है। यह वाक्य केवल उस स्त्री की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की पीड़ा है जो अपनों के बीच उपेक्षित महसूस करता है। यहाँ 'कुछ नहीं' केवल एक अभाव नहीं है, बल्कि एक सक्रिय प्रहार है। कथा के अंत में स्त्री का अपने कमरे की ओर लौट जाना उसकी हार नहीं, बल्कि उस सत्य की स्वीकारोक्ति है कि वह इस छत के नीचे अकेली है।
प्रस्तुति के शिल्प में लेखक ने 'दूरी' के तत्व को बहुत कुशलता से निभाया है। पति और पत्नी के बीच की शारीरिक निकटता और मानसिक दूरी का कंट्रास्ट (विरोधभास) पूरी कथा में बना रहता है। टीवी की स्क्रीन एक दीवार की तरह है जो दोनों के बीच खड़ी है। यह लघुकथा आज के 'डिजिटल युग' और ‘एकाकीपन के महोत्सव’ पर भी एक टिप्पणी है, जहाँ लोग एक ही सोफे पर बैठकर भी कोसों दूर होते हैं।जहाँ अकेले होना कोई सज़ा नहीं, आज़ादी है।
संक्षेप में कहा जाए तो 'अदृश्य आघात' अपनी संक्षिप्त कलेवर के बावजूद एक महागाथा जैसी पीड़ा समेटे हुए है। इसकी सफलता इसके कथ्य की ईमानदारी और शिल्प की सादगी में निहित है। योगराज प्रभाकर जी ने मानवीय संवेदनाओं के आवरण रूपी उस बारीक छिलके को हटाकर दिखाया है, जिसके नीचे संबंधों का सड़ता हुआ यथार्थ छिपा है। यह कथा पाठक को केवल मनोरंजन प्रदान नहीं करती, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए विवश करती है कि कहीं वह भी अपने आस-पास के रिश्तों में इस 'अदृश्य आघात' का सूत्रधार तो नहीं बन रहा। यह समकालीन लघुकथा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रचना है जो अपने कथ्य के साथ साथ भाषा, शैली और प्रस्तुति के समन्वय से एक अमिट प्रभाव छोड़ती है।

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रचनाकार परिचय

सीमा सिंह

ईमेल : libra.singhseema@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 30 नवम्बर 1973 
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा- लघुकथा एवं कहानी
शिक्षा- स्नातकोत्तर – (हिंदी साहित्य, मनोविज्ञान।) 
संप्रति- महासचिव,शक्ति ब्रिगेड सामाजिक एवम् साहित्यिक संस्था, सदस्य, सम्पादक मंडल, लघुकथा कलश (अर्धवार्षिक पत्रिका) एवं स्वतंत्र लेखन 
प्रकाशन- • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-28 (छह नवोदिताओं की छियासठ कथाएँ), लघुकथा-अनवरत संकलन (साझा संकलन), नई सदी की धमक (साझा संकलन), स्त्री-पुरुष सम्बन्धी लघुकथाएँ (साझा संकलन), उद्गार (सांझा संकलन) सहित चालीस से अधिक साझा संकलनों में सम्मिलित।
• लघुकथा कलश पत्रिका, शोध-दिशा पत्रिका, दृष्टि पत्रिका, साहित्य अमृत पत्रिका, मृगमरीचिका पत्रिका, चेतना पत्रिका, मरु गुलशन के साथ ही पंजाबी पत्रिका गुसाइयाँ में अनुवाद सहित विभिन्न पत्रिकाओं में। • दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान,अमर उजाला, महानगर मेल, लोकजंग सांध्य दैनिक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में। • yourstoryclub.com, openbooksonline.com, laghukatha.com, pratilipi.com वेबसाईट, तथा सेतु (Pittsburgh), हस्ताक्षर, अटूट बंधन सहित कई अन्य वेब पत्रिकाओं में
प्रसारण- बोल हरियाणा, रेडियो पर रवि यादव द्वारा लघुकथाओं का पाठ।
सम्मान/ पुरस्कार- कलश लघुकथा गौरव सम्मान - 2017
ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा - महादेवी वर्मा सम्मान - 2017 आशा किरण समृद्धि फाउंडेशन द्वारा - शिक्षा गौरव सम्मान - 2017
रोटरी क्लब इलीट द्वारा - हिंदी भाषा सेवा सम्मान - 2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा - विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान - 2018 रोटरी क्लब कानपुर इलीट द्वारा - वीमेन अचीवर सम्मान - 2019भारत उत्थान न्यास सम्मान - 2019
पुरस्कार: प्रतिलिपि कथा सम्मान प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2017
साहित्य सृजन संवाद कहानी प्रतियोगिता - विशिष्ट कहानी पुरस्कार - 2017
सेतु लघुकथा प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2018
संपर्क- रॉयल नेस्ट टेक ज़ोन -iv, ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर,(उत्तर प्रदेश)-201306
मोबाईल- 8948619547 / 7303311942