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मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डाॅ० सुरंगमा यादव की कविताएँ

डाॅ० सुरंगमा यादव की कविताएँ

डाॅ० सुरंगमा यादव की प्रस्तुत कविताएँ हमारे समय में चटकते हुए संबंधों की मूक वेदना हैं, अस्तित्व का संघर्ष हैं और आस की बची हुई लौ हैं। इन कविताओं में हमारा वर्तमान और उस वर्तमान की चुनौतियाँ सहजता के साथ उपस्थित दिखती हैं। ये कविताएँ एक अनुभवी के परामर्श की भांति भी सहेजे जाने योग्य हैं।

- के० पी० अनमोल

अपने-अपने कमरों के बेताज बादशाह

ड्राइंग रूम में सजे शो पीस की तरह
मुस्कुराते हुए चेहरे
ड्राइंग रूम के इस पार
दबी आवाज़ें, घुटती साँसें, तनाव
और संवादहीनता का शोर

परिवार की सामूहिक हँसी
सुनने को तरसती दीवारें
बाहर नहीं जातीं कभी घर की आवाज़ें
यानी घर में है बहुत शांति
चुप्पियों के टूटने की
आस तकती बेचैन शांति

ऐसा नहीं है कि मुस्कुराते नहीं हैं लोग
हँसते हैं मोबाइल को स्क्रॉल करते हुए
चैट और वीडियो काॅल पर
घर में बस ‘हाँ-हूँ’ में उत्तर-प्रत्युत्तर है

अपने-अपने कमरों के बेताज बादशाह
अन्य की उपस्थिति असहज-असहनीय।

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रफ़्तार

मौसम बदलता है धीरे-धीरे
हवाओं में ठंडक और तपिश भी
घुलती है धीरे-धीरे
सूरज सिर पर चढ़ता
सिर से उतरता है धीरे-धीरे
ऐसे ही कोई रिश्ता
दिल में उतरता है धीरे-धीरे

चटपट के रिश्ते
झटपट बन जाते हैं खटपट
गेंद की तरह उछलकर
तेज़ी से वापस
दिल की नरम ज़मीन पर
बना देते हैं गहरे घाव

रफ़्तार अच्छी है, बहुत अच्छी है
मगर हर एक रास्ते पर
एक ही रफ़्तार में चलना मुमकिन नहीं
पहाड़ की चोटी छूनी है
तो संभलकर चलना होगा
दौड़कर चढ़ना
तय है खाई में गिरना।

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दायरे के लोग

टूटकर बिखरा अगर जो
दर्प का दर्पण किसी का
वक़्त के बदलाव से
या उभरती पीढ़ियों के अतिचार से
लपक उठे हाथ कितने
सहेजने को बिखरी किरचें

साध पूरी हो गई ज्यों
अब सुकूं है ऐसा मन में
मौक़ा-बेमौक़ा भी न देखें
चुभा देते दर्प किरचें

बरसों-बरस की ईर्ष्या का
हथियार-सा उसको बना के
कौन हैं ये
कर रहे जो काम ये तल्लीनता से!

और हैं कोई नहीं वे
ये हमारे दायरे के लोग हैं।

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मैं शिला पर रेख हूँ

दीप की मैं लौ नहीं हूँ
जो हवा दम-खम दिखाए
मैं लहर भी नहीं कोई
छू किनारा लौट जाए

और गोताखोर भी मैं वो नहीं जो-
हाथ ख़ाली लौट आए
मैं नहीं वो स्वाति-बिन्दु
विषधरों का विष बढ़ाए

काँच का टुकड़ा नहीं मैं
जो शिला से टूट जाए
मैं शिला पर रेख हूँ
आँधियों के बाद खिलती धूप हूँ

पीर पर्वत से प्रवाहित
मैं मृदुल रसधार हूँ
समय के चाबुक के आगे
जीत का संकल्प हूँ
मैं शिला पर रेख हूँ।

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कोशिशें

सिर्फ ऐलान से हालात बदलेंगे नहीं
कोशिशें भी तेज़ होनी चाहिए
पुरज़ोर होनी चाहिए

जा रही है नाव अपनी किस तरफ
हर घड़ी हर एक को ये इल्म होना चाहिए

तानकर चादर जो सोए बेख़बर
जागने के बाद होगा क्या?
उन्हें ये होश होना चाहिए

कब न जाने
आँधियों का रूप धर ले ये हवा
अपनी मिट्टी से पकड़
हर पेड़ की मजबूत होनी चाहिए।

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रचनाकार परिचय

सुरंगमा यादव

ईमेल :

निवास : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

नाम- डॉ0 सुरंगमा यादव
जन्मतिथि-
जन्म स्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा-
सम्प्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर- हिंदी विभाग
प्रकाशित पुस्तकें-
* वंशीधर शुक्ल का काव्य
* यादों के पंछी (हाइकु-संग्रह)
* विचार प्रवाह (लेख)
* भाव प्रकोष्ठ (हाइकु-संग्रह)
* संपादित पुस्तकें- 08
* प्रकाशित शोधपत्र- 35 से अधिक
आयोजन/प्रतिभाग- अनेक सेमिनारों एवं वेबिनारों का आयोजन एवं प्रतिभाग।
सम्मान एवं पुरस्कार- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उ0प्र0 का वर्ष 2021-22 का ‘रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (100000/- की धनराशि सहित) पुरस्कार तथा 5 सितम्बर 2021 को लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त सम्मान पत्र सहित अन्य अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित।
संपर्क- महामाया राजकीय महाविद्यालय, महोना, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मोबाइल- 800284735