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मोहित नेगी 'मुंतज़िर' की कविताएँ

मोहित नेगी 'मुंतज़िर' की कविताएँ

युवा रचनाकार मोहित नेगी 'मुंतज़िर' की इन कविताओं में पहाड़ी जीवन और विस्थापन की कसक मन कचोटती है। यह कसक न केवल वहाँ के लोगों की है, बल्कि पहाड़, नदी, गधेरे तथा उन तमाम जगहों की भी है, जो अपने रहवासियों के लिए छटपटाते हैं। मोहित की ये कविताएँ विस्थापन से उपजी पीड़ा का मार्मिक दस्तावेज़ हैं।

विलय

पगडंडियाँ जंगलों को
लौटा दी गई हैं।
वे पूरा कर चुकी हैं
अपना काम।

नहरों का पानी नदियों को
लौटा दिया गया है।
सदियों से खेत सींचती हुई
नहरों को कर दिया गया है
सेवानिवृत्त।

इमारतों के पत्थर
स्वतः ही
अपने मूलस्वरूप में
ज़मीन में वापस मिलने
जा रहे हैं।

खेतों को,
उन खेतों को
जो उपजाते थे
बारह अनाज
उन्हें
जंगली घासों के हवाले
कर दिया गया है

गाँव
सौंप दिये गये हैं
जंगली जानवरों को वापस

इंसान पहाड़ों से
चला गया है
मैदानों की ओर
शायद बन्दर से
मनुष्य बनने की और
यह कोई क़दम हो।

********


अपने हिस्से का पहाड़

अल्पायु में ब्याही गयी
उनकी माएँ
उन्हें छोड़ने आयी हैं सड़क तक।
सुबह की पहली बस से,
वे नवयुवा जा रहे हैं
रोज़गार की तलाश में
शहरों की ओर।

वे जा रहे हैं छोड़ कर
अपने चारों ओर के
ऊँचे पहाड़,
गहरी नदियाँ,
सर्पिलाकार पगडंडियाँ,
उफनते गधेरे,
सीलन भरी घाटियाँ,
पिताओं के सीढ़ीदार खेत

मगर वे ले कर जा रहे हैं
अपने अंदर
अपने हिस्से का पहाड़

जब वे
दिनभर की थकन से
चूर होकर
लौटेंगे
अपने काम से
अपने किराए के कमरों की ओर
और निढाल होकर लेटेंगे अपने बिस्तर पर
तब बंद करते ही आँखें
उन्हें नज़र आएगा
अपने हिस्से का पहाड़,
उसके गगनचुंबी शिखर,
उफनते गधेरे,
और ढलानों पर गीत गातीं
घसियारिनें
और फिर वे रो पड़ेंगे
उस घुप्प अँधेरे में
बहुत देर तक
और न जाने कब
उन गर्म आँसुओं की तपन से
वे खो जाएँगे
नींद के आगोश में

सुबह उठने पर वे फिर ढोएँगे
अपने हिस्से का पहाड़

काश! वे लौट पाएँ
वापस
अपनी जड़ों की ओर
अपने घरों की ओर
वरना वे किसी दिन
ढोते हुए मर जाएँगे
अपने हिस्से का पहाड़।

********


घसियारिनों के गीत

लग गया है
चौमास
कोहरे से ढकी हैं
चोटियाँ।
पहाड़ी झरने बहा कर
ले जा रहे हैं पत्थर।
नम ज़मीन पर पेड़ों के नीचे
उग आए हैं जंगली कुकुरमुत्ते
घुटनों तक उग आई है
घास
दूर से सुनाई दे रहे हैं
घसियारिनों के
बाजूबन्द गीत।

गीत?
नहीं!

ये गीत नहीं हो सकते
ये हैं उनकी अंतरात्मा का रुदन
उनके दिलों में जमा दुःख
जो गीत बनकर फूट रहा है बाहर
जैसे फूट रहे हैं
पहाड़ी झरने
चारों ओर।

वे उलाहना दे रही हैं
अपने उस पिता को
कि उसको क्यों ब्याहा गया
इस मुल्क
जहाँ काम से टूटी जाती है कमर
जहाँ घास के लिए भटकना पड़ता है
मीलों।

वे उलाहना दे रही हैं
अपने उस भाई को
जो इस बार नहीं आया
भेंटोली लाकर
उसके पास
और उसकी सास
इस बात पर
देती रही उसे उलाहने।

वे काटते हुए घास
और गाते हुए गीत
देखती हैं पल-पल में राह
कहीं कोई मैती
आए लेने उसे
और वो घास काटने में व्यस्त
उसे देख ही न पाए।

दोपहर हो गयी है
घसियारिनें जा रहीं हैं घर की ओर
लिए घास के बोझ
एकदम शांत
जैसे गाकर बाजूबन्द
उतर गया हो मन का बोझ।
दूर एक गधेरे में
एक घसियारिन
अब भी गा रही है
बाजूबन्द
आवाज़ तेज़ है
शायद उसका दुःख हो
और प्रगाढ़।

शाम हो गयी है
जंगल भी ख़ाली हो गया है
मग़र अब भी
गूँज रहे हैं
वहाँ बाजूबन्द।
कई सदियों पहले से
आज तक के गाये हुए
चोटियों पर
घाटियों में
गधेरों में।

********


पिंडर

तुम केवल
बहा के ले जाती हो
लकड़ी, रेत, मिट्टी, पत्थर
कभी-कभी कोई पूरा खेत
और जब कभी
हो जाती हो और विकराल
तो ले जाती हो वो सब
जो पड़ता है
तुम्हारी ज़द में।

पिंडर
किसी दिन
बहा के ले जाओ ना!
यहाँ के ग़रीबों के दुख,
उनकी पीड़ा,
घसियारियों का संघर्ष,
मज़दूरों का पसीना,
किसानों के आँसू
और ले जाकर उड़ेल दो गंगासागर में।

तुम कर दो वो काम
जो नहीं कर पाए
सदियों से चले आ रहे
राजतन्त्र
जनतंत्र
और भी
तमाम
सत्ताएँ

मगर
मैं जानता हूँ
तुम ऐसा नहीं करोगी
क्योंकि
शायद
ये काम नहीं है
तुम्हारे जॉब चार्ट में।

********


बाँध

जब मैं पढ़ रहा था
फ्लुइड मैकेनिक्स के जटिल सूत्र
और बाँधों के बनाने के सिद्धांत
तो तभी मेरी कल्पना में आया
बाँध बनने के बाद का
विशाल जलाशय
जलाशय में डूबी भूमि
और भूमि के विस्थापित बाशिंदे

मैं पढ़ रहा था
अर्थं फिल डैम बनाने के सिद्धांत
और मुझे ध्यान आया टिहरी
और उसका वो अंतिम दिन
जब उसके लोग
ढो रहे थे अपना सामान
और देख रहे थे
आख़िरी बार अपने घरों को
जो थीं उनके पिताओं की
उनको सौंपी गई
आख़िरी जागीरें

जिस दिन मैंने
सीखी निकालनी
बाँध की सेंटर ऑफ ग्रेविटी
उस रात मेरे सपने में आये
टिहरी के
वो डूबे हुए गाँव
जो थे बाँध की
सेंटर ऑफ ग्रेविटी पर

अगले दिन
मैंने अध्यापक से पूछा
जिन्होंने गढ़े डैम बनाने के सिद्धांत
क्या उन्होंने गढ़े हैं
विस्थापितों के
दुख कम करने के सिद्धांत!
उन्होंने यह कह कर
कि विस्थापित नहीं हैं
हमारे सिलेबस का हिस्सा,
चुप करा दिया मुझे
वैसे ही
जैसे इतिहास में बने
तमाम बाँधों के विस्थापितों को
कर दिया गया था चुप

********


टिहरी- 1

मैंने टिहरी नहीं देखा
मगर मैंने देखे
बाँध का पानी कम होने के बाद
उभर आये खेत
मोहल्ले और तिबारें
टूटी हुई
पगडंडियों के अवशेष

जो शायद
उभर आई हों
कहने को
अपनी व्यथा
अपना दुःख,
जताना चाहती हो
अपना प्रतिरोध
जो नहीं जता पाए
वहाँ रहते लोग
या जताने पर बंद कर दी गयी
उनकी आवाज़ें

वो आज हो गयी हैं मुखर
मुझ पर चिल्लाते खेत
कह रहे हैं कुछ
मगर मैं न समझ सका

सुनाई पड़ रहा है पगडंडियों का रुदन
वे मना रही हैं मातम
जैसे किसी जवान के मरने पर मनाती हैं
घर की औरतें,
टूटी हुई तिबारों के खम्भे
दरक रहे हैं
ऐसी आवाज़ कि जैसे
कहीं हुआ हो बज्रपात
उभर आई हिस्से में भरी है गाद

धीरे-धीरे पानी से उभर रहा है
पूरा क्षेत्र
उभर रही है एक संस्कृति की
कब्रगाह

********


टिहरी- 2

जब मैंने देखे
संग्रहालय में तुम्हारे अवशेष
तो लगा
देख रहा हूँ
सारनाथ में बुद्ध के अवशेष
फिर एक पल लगा
जैसे आया हूँ
समाधि पर
अपने पूर्वजों की

तुम्हारे तिबार के खम्बों से
सुनाई दे रही थीं
रियासत की राजाज्ञाएँ
दरबार की मन्त्रणाएँ

पीतल के गेडुओं से
पहाड़ी दालों की
अद्भुत सुगन्ध

तुम्हारी गाथा का
सस्वर वाचन करते
अनेकानेक धूल धूसरित ग्रन्थ

दिखाई दे रही थी
रँगमहलों के किवाड़ों से
बाहर झाँकती राजकन्याएँ

टिहरिया नथ बनाते
तुम्हारे सिद्धहस्त सुनार
भोजों में भात बनाते
तुम्हारे सरोला ब्राह्मण

सुनो टिहरी!
तुम्हारे अवशेष
मर चुकी मानवता के
अस्थिपंजर हैं।

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रचनाकार परिचय

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

ईमेल : kavi.mohitnegi123@gmail.com

निवास : सौंराखाल, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

शिक्षा- पीएचडी (शोधार्थी), स्नातकोत्तर (हिंदी, इतिहास एवं शिक्षाशास्त्र), सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा
सम्प्रति- सिविल इंजीनियर, लोक निर्माण विभाग (उत्तराखंड सरकार)
प्रकाशन- अक्षरम, किसलय, काव्यांकुर- 11 आदि साझा कविता संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। कविता कोश पर हिंदी एवं गढ़वाली रचनाएँ प्रकाशित। रेख़्ता पर उर्दू रचनाएँ प्रकाशित। गढ़वाली पत्रिका 'चिठ्ठी पत्री', 'रंत रैबार; कुमाउँनी पत्रिका 'आदलि कुशली', 'कुमगढ़' व हिंदी पत्रिकाएँ 'हिमप्रस्थ', 'नवल', 'हलन्त', 'जानकीपुल', 'अनुनाद', 'प्रेरणा अंशु', 'वृंदा' व 'साहित्य सेतु' में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान/पुरस्कार- पर्पल पेन संस्था, नई दिल्ली द्वारा 'साहित्य केतु सम्मान- 2019'
नवांकुर साहित्य सभा, नई दिल्ली द्वारा 'नवांकुर साहित्य सम्मान- 2024'
पर्पल पेन संस्था, नई दिल्ली द्वारा 'साहित्य साधक सम्मान- 2025'
स्थायी पता- ग्राम व पो०- सौंराखाल, ज़िला- रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)- 246475