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जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

लाल्टू की कविताएँ

लाल्टू की कविताएँ

कवि लाल्टू की कविताएँ अपने समय के संदर्भों तथा सरोकारों पर स्वयं से ही संवाद करती हैं। ऐसा संवाद, जिसमें प्रश्न भी हैं और उत्तर भी। फ़िक्र भी है और उम्मीद भी। ये कविताएँ एक आईने के अक्स की मानिंद हैं, जो हमें अपने दौर के सच से मुख़ातिब करती हैं। डराती हैं। लेकिन सचेत भी करती है।

दिन भर

दिन भर क्या किया? क्या पढ़ा? क्या लिखा?
एक ख़त लिखा। एक कहानी पढ़ी। सोचा, बहुत सोचा।
नहीं मारा किसी को।
नहीं की नफ़रत किसी से।
नहीं किया लालच।

आसमान देखा।
देखे पेड़ों पर चढ़ते बच्चे।
देखी लाल चोंच वाली चिड़िया।
कल भी हो ऐसा ही जीवन, ओ मन!

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एक सौ छठी बार

आज मैं
एक सौ छठी बार
बच्चा बन जाऊँगा

सबको चिढ़ाऊँगा
जीभ मोड़ कर
आँखें झपक कर

जब सब हँसते रहेंगे
खयालों में उनकी तस्वीरें
बना, रख लूँगा

रात को
जब सब सो जाएँगे
खोल लूँगा
अपने औजारों का बक्सा

चुन-चुन
उनकी तस्वीरें
क्षत-विक्षत कर दूँगा
चीखते हुए

क्यों चुप हो?
क्यों चुप हो?

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उगना है

उगना है
जहाँ बंजर है
न हवा,
न धूप, न पानी है
बे-हवा बेहया लहलहाना है
अँधेरे से रोशनी खींचनी है
पत्थरों से पानी निचोड़ना है
हर हाल में उगना है
कि वह बीज है।

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मुख़ालफ़त

उसने पूछा कि मैं अंग्रेज़ी के खिलाफ़ क्यों हूँ
मैंने कहा कि चूंकि अंग्रेज़ी मेरे ख़िलाफ़ है
उसने कहा कि पर आपको तो अंग्रेज़ी आती है
मैं हँसा
हँसकर ही उसे समझा सकता था कि
अंग्रेज़ी बोलता मैं दरअसल अपने ही ख़िलाफ़ हूँ

उसने कहा कि आप राजा जी के ख़िलाफ़ हो
यह आसान बात थी
गोकि ख़ुद को बचाने का तरीक़ा हो सकता था
मैं उसे कहूँ कि अबे, भाग!
पर मैंने निहायत शराफ़त से उसे कहा कि
आप बड़े सुंदर आदमी हैं

तंग आकर वह बोला-
आप तो हर बात की मुख़ालफ़त करते हो
खैर आप तो कवि हो।

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दिल्ली में भी पेड़

दिल्ली में भी पेड़ हैं।
पेड़ के नीचे लेट जाऊँ तो बादल दिखेंगे।

कोई चाकू लेकर डराता है तो डराता रहे,
मैं पेड़ के नीचे की ज़मीं पर उतना ही लेटा रहूँगा
जितना आदिवासी जंगलों में बसे हैं।

मेरे बादल साथ रहेंगे,
आ जाए पुलिस अगर आती है तो।

जिसे नहीं दिखता आदमी,
उसे पेड़ और बादल क्या दिखेंगे।

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डर

मैं सोच रहा था कि उमस बढ़ रही है
उसने कहा कि आपको डर नहीं लगता
मैंने कहा कि लगता है
उसने सोचा कि जवाब पूरा नहीं था
तो मैंने पूछा- तो!

बढ़ती उमस में सिर भारी हो रहा था
उसने विस्तार से बात की-
नहीं, जैसे ख़बर बढ़ी आती है कि
लोग मारे जाएँगे।
मैंने कहा- हाँ।

मैं उमस के मुखातिब था
यह तो मैं तब समझा जब उसने निकाला खंजर
कि वह मुझसे सवाल कर रहा था।

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दिन गर्म है लू चली

दिन गर्म है, लू चली है गला काटती हुई
सेंक बाँटते सूरज में उत्साह है अतिरेक
कमरा तपा हुआ है

बेघर छाया ढूँढते फिर रहे लू की थपेड़ों में जो
कोई ईश्वर से कहो कि दया करे उन पर
कोई कहो कि रात आ जाए ठीक अभी
कोई कमाल हो जाए किसी विज्ञान-लोक में
चले जाएँ सभी कुदरत के मारे

ताप की तड़प जानता हूँ
कोई ईश्वर नहीं, जो बेघर लोगों के साथ है
इंसान ही है, जो कहीं लड़ता कि
दुनिया में सबके सिर पर छत हो

पानी पीता हूँ कि आँसू सूख न जाएँ
गर्म हवा में निकलता हूँ ढूँढता
जिसे मेरे आँसू चाहिए
दिन गर्म है, लू चली है गला काटती हुई।

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कौन-सा ईश्वर

यह जो जंग छिड़ी है छत्तीसगढ़, काश्मीर या पाकिस्तान में
इस जंग में कौन-सा ईश्वर लड़ रहा, किस ईश्वर के ख़िलाफ़

एक ईश्वर, जो चेहरा नहीं दिखाता
एक ईश्वर, जो कपड़े नहीं उतारता

एक ईश्वर, जिसके बारे में दावा किया गया है कि
वह हुसैन से नाख़ुश घूम रहा है

चलो शामिल हों पुरज़ोर ईश्वरवादी बहसों में
और मूँद लें आँखें इस आँकड़े से कि
तैंतीस करोड़ धन चार या पाँच ईश्वरों वाले इस मुल्क में
इससे भी ज़्यादा तादाद में लोग हैं भुखमरी के शिकार
दो सौ की दारू की बोतल ख़रीद घर वापस चलते हुए
रिक्शा वाले को डाँटें कि वह दो रुपए ज़्यादा क्यों माँगता है

नाराज़ हों कि साले मूड बिगाड़ देते हैं और गड़बड़ा देते हैं
लौट कर लिखनी थी कविता जो।

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ऐलान

कहीं कोई फौज-पुलिस नहीं है
लोग घरों में बंद हैं
बाज़ारों में रौनक नहीं है
कुत्तों का भौंकना रात के सन्नाटे को चीरता है
चाँद घबराता बादलों के बीच भागता है
क्या मैं धरती पर हूँ
या दिनों तक सोचने के बाद आखिर छलाँग लगा बैठा हूँ
किससे पूछूँ
कोई है भी नहीं
जैसे लहरों पर सवार किनारे से बहुत दूर आ पहुँचा हूँ
धरती पर कान लगाकर सुनता हूँ
कहीं कोई नगाड़ा बजता होगा
कोई फौज कूच कर चुकी होगी
कि आकाशगंगा में अपनी धाक जमा आए
कोई ऐलान करता है कि
हर चीज़ आखिर वहाँ पहुँच गई है
जहाँ होना तय था।

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बची आग

विदा कहने लायक भी छूट नहीं होगी
खेतों में फसलें छू आने के लिए
नहीं मिलेंगे दो पल
क्या सब कुछ जल चुका है
कहीं किसी ने दाने नहीं बचा रखे हैं
ये छोटी-बड़ी इमारतें, इंसानी ज़हन की करामात
सब वीरान हो जाएँगी
क्या सूरज की रोशनी सचमुच धीमी पड़ जाएगी
दूर वह जो इमारत दिखती है
कोई उसके अंदर ज़रूर होगा
जाते हुए एक बार उसे छू कर जाता हूँ
कहता हूँ कि बची हुई आग
सीने से लगाए रखना
मौसम दर मौसम आसमां देखते रहना
बादलों पर बदलते धब्बे पहचानना
कि उनमें से बरसेंगे गीत
ऐसा हो नहीं सकता कि
चाँद ने छोड़ दिया कविता लिखना।

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रचनाकार परिचय

लाल्टू

ईमेल : laltu10@gmail.com

निवास : हैदराबाद (तेलंगाना)

मूल नाम- हरजिंदर सिंह जन्मतिथि- 10 दिसंबर 1957 जन्मस्थान- कोलकाता (पश्चिम बंगाल) सम्प्रति- सैद्धांतिक प्रकृति विज्ञान विषय के प्राध्यापक लेखन विधाएँ- कविता, कहानी, अनुवाद, नाटक, बाल-साहित्य आदि। प्रकाशन- ‘एक झील थी बर्फ की’, ‘डायरी में तेईस अक्तूबर’, ‘लोग ही चुनेंगे रंग’, ‘सुंदर लोग और अन्य कविताएँ’, ‘नहा कर नहीं लौटा है बुद्ध’, ‘कोई लकीर सच नहीं होती’ और ‘चुपचाप अट्टहास’ (काव्य-संग्रह), ‘भैया ज़िंदाबाद’ (बाल कविता संग्रह) तथा ‘घुघनी’ (कहानी-संग्रह) प्रकाशित। अन्य- अँग्रेज़ी, पंजाबी और बांग्ला से अनुवाद। ब्लॉग- ‘आइए हाथ उठाएँ हम भी’ पर भी सक्रिय।