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शमीम हयात की ग़ज़लें

शमीम हयात की ग़ज़लें

शमीम हयात की ग़ज़लें ठण्डी और ताज़ी बयार के झौंके की तरह हैं। ये ग़ज़लें कहन और कथ्य दोनों में नवीनता लिए हुए हैं। इसमें स्व तथा पर दोनों ही अनुभूतियाँ पूरी जीवंतता से उपस्थित हैं। कई जगह सरोकार सम्पन्नता भी प्रभावी है।

- के० पी० अनमोल

ग़ज़ल- 01

धू-धू करके जलती छत की हर लकड़ी से पूछेंगे
आग लगाने वाले कारण ख़ुद बस्ती से पूछेंगे

ऐसे-कैसे आख़िर उसकी उम्मीदों की मौत हुई
इक दिन हम पंखे से लटकी उस रस्सी से पूछेंगे

कच्ची उम्रों के रिश्ते ले जाएँगे जब नींदें भी
अपने ख़्वाबों की ताबीरें किस लड़की से पूछेंगे

बे-वतनों का हाल सुनाने जाएँगे हम वादी में
तुम पर भी फिर क्या-क्या गुज़री हर घाटी से पूछेंगे

डर के कांधे पर चढ़कर भी जीवन कैसे जीते हैं
दानिश्वर रस्सी पर चलती नट बच्ची से पूछेंगे

अपने सीने से लिपटाए किसका बच्चा फिरती है
सारे पाप भुलाकर अपने सब पगली से पूछेंगे

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ग़ज़ल- 02

तल्ख़ रिश्ते की हक़ीक़त यूँ बताती रह गई
आज फिर से ज़र्द चेहरे पर उदासी रह गई

जिस्म पर तो रोज़ बरसे प्यार के बादल मगर
रूह थी बंजर ज़मीं-सी, फिर भी प्यासी रह गई

मुफ़लिसी में एक लड़की बिक गई बाज़ार में
हाथ में गुड़िया लिए वो बिलबिलाती रह गई

गीत लिखकर चल बसा इक शाइरे-ख़ाना-ख़राब
एक शहज़ादी महल में गुनगुनाती रह गई

वो हिला पाई नहीं इक बार भी गहरी जड़ें
ज़ब्त को पेड़ों के आँधी आज़माती रह गई

आँधियों ने गर्दिशों की जब उसे घेरा 'हयात'
ज़िंदगी बेबस दिए-सी टिमटिमाती रह गई

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ग़ज़ल- 03

फ़लक पर चादरें तानो सितारो, नींद आती है
उठा लो चाँद की डोली कहारो, नींद आती है

सभी तो घर गये अपने वो अब तक सो गये होंगे
तुम्हीं जागे हुए हो ग़म के मारो, नींद आती है

ज़रा ठहरो दिले बेकल बड़ी मुश्किल से भूला है
किसी का नाम लेकर मत पुकारो, नींद आती है

अगर फ़ुरसत मिली मिल-बैठ कर बातें करेंगे फिर
न तुम ज़ुल्फ़ें अभी अपनी संवारो, नींद आती है

चराग़ों को बुझाया है अभी तो जुगनुओ हमने
चले जाओ यहाँ से जां-निसारो, नींद आती है

हुई बोझल मेरी आँखें उजाले अब नहीं भाते
ख़ुदारा चाँद खूँटी से उतारो, नींद आती है

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ग़ज़ल- 04

धुन में न जाने किसकी यूँ खोई हुई हो तुम
जमकर शबे-फ़िराक़ में रोई हुई हो तुम

धानी जो रंग ओढ़ के बेबाक हो खड़ी
लगता है जैसे खेत में बोई हुई हो तुम

शादाब पत्तियों पे ये शबनम की बूँद है
या फिर चमन की घास पे सोई हुई हो तुम

ख़ुशरंग पैरहन के यूँ साँचे में हो ढली
माला के मोतियों-सी पिरोई हुई हो तुम

लगता है जैसे कोई अजंता की हूर है
सावन के बादलों की भिगोई हुई हो तुम

बोले तो यूँ 'हयात' लबों पर मिठास है
जैसे अभी शहद में डुबोई हुई हो तुम

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ग़ज़ल- 05

जिसे सब दीदा-ए-नम बोलते थे
मेरी आँखों से वो ग़म बोलते थे

वो बच्चे अब कहाँ इस दौर में जो
बड़ों के सामने कम बोलते थे

उन्हें पायल से मैं पहचान लेता
वो जब चलते छमा-छम बोलते थे

घटा ख़ामोश होकर देखती थी
जब उसकी ज़ुल्फ़ के ख़म बोलते थे

किसी भी दौर में डरना न आया
जहाँ सब चुप रहें, हम बोलते थे

उसे भी खा चुकी है उम्र कब की
बदन वो जिसमें मौसम बोलते थे

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ग़ज़ल- 06

दोस्ती रक्खा करो तुम, प्यार भी रक्खा करो
दुश्मनी के दौर में कुछ यार भी रक्खा करो

इस क़दर मसरूफ़ हो तुम बात भी होती नहीं
मेरे हिस्से का कोई इतवार भी रक्खा करो

ये भी क्या तुमने हवा को बादबानी सौंप दी
नाख़ुदा हो, हाथ में पतवार भी रक्खा करो

दूर तक इनमें उदासी के मनाज़िर क़ैद हैं
ख़ूब आँखें हैं तुम्हारी, प्यार भी रक्खा करो

सादगी अच्छी है लेकिन ख़ास मौक़े पर कभी
ख़ुद को तुम थोड़ा बहुत तैयार भी रक्खा करो

घर पे तुमने चार बजते ही बुलाया है मुझे
चाय बिस्कुट ठीक है, अख़बार भी रक्खा करो

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ग़ज़ल- 07

ख़ुद अँधेरों में रहा और उजाले माँगे
मांग भरने को तेरी चाँद-सितारे माँगे

मैने चाहा था कलाई के लिए कँगन दूँ
उसने कानों के लिए नाज़ से बाले माँगे

शेर कहता हूँ, वो ग़ज़लों में उतर आता है
उसकी आँखों से कई गीत उधारे माँगे

चीख़ पड़ती थीं यूँ ख़ामोश सदाएँ मुझ पर
मैने शाख़ों के लिए रब से परिंदे माँगे

उसकी मूरत है मेरे मन में न जाने कब की
आज दुनिया ने मेरे नाम के फ़तवे माँगे

एक मजनूं है, जो सूरज को तके जाता है
कौन पागल है ये जो धूप से साये माँगे

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ग़ज़ल- 08

जाते-जाते कैसा मंज़र छोड़ गया है
बिखरा कमरा, उजड़ा बिस्तर छोड़ गया है

गूँज रही हैं आवाज़ें उसके हँसने की
कहने को तो कब का वो घर छोड़ गया है

वो दफ़्तर में एक झलक दिख जाता मुझको
फिर देखा इक रोज़ कि दफ़्तर छोड़ गया है

यूँ रूठा इक दिन काग़ज़ पर गुडबाय लिखा
काग़ज़ रखकर उस पर पत्थर छोड़ गया है

उसके कपड़े, उसकी चादर उसकी ख़ुशबू
मुझ पर जैसे जादू-मंतर छोड़ गया है

मैंने चाहा सब कुछ अपना ले जाए वो
लेकिन मेरी पीठ में ख़ंजर छोड़ गया है

करने वाला रूहों के रिश्तों की बातें
प्रेम-पुजारी तन को छूकर छोड़ गया है

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ग़ज़ल- 09

फिर पहाड़ों पर दिखा बादल मुझे
याद आया फिर तेरा आँचल मुझे

एक दिन मैं देर तक हँसता रहा
दर्द ने जब कर दिया पागल मुझे

जो मिला मुझमें कहीं खोता गया
इश्क़ ने यूँ कर दिया जंगल मुझे

इक झलक दुल्हन बने देखा उसे
एक लम्हा कर गया बेकल मुझे

सामने फिर तल्ख़ माज़ी आ गया
इक कबूतर कल मिला घायल मुझे

एक आहट, एक दस्तक खेल ख़त्म
मार डालेगी ज़रा हलचल मुझे

लक्ष्य पर अपने टिकाई है नज़र
दिख रहा है आँख का सर्कल मुझे

जो तुम्हारे साथ था फूलों भरा
फिर वही रस्ता लगा दलदल मुझे

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ग़ज़ल- 10

कोई हराम का सिक्का जो डाल देता है
फ़क़ीर आज भी कासा उछाल देता है

इसीलिए तो मैं दुश्मन क़रीब रखता हूँ
मेरे वजूद से ख़ामी निकाल देता है

निगल रहा है समन्दर मुझे मैं ज़िंदा हूँ
तुम्हें पता है, वो लाशें उछाल देता है

मेरा नसीब है क़ायल मेरी ज़हानत का
हर एक मोड़ पे मुश्क़िल सवाल देता है

बुलंदियों ने तुम्हें ये भुला दिया शायद
उरूज जिसने दिया, वो ज़वाल देता है

तेरे बग़ैर ये रातें हैं रायगाँ मेरी
तेरा तो ख़्वाब भी आकर मलाल देता है

सुना है शहर में इक शख़्स और है मुझसा
जो बात-बात पे तेरी मिसाल देता है

'हयात' जिसने बनाया है कुल जहाँ सारा
वही ग़रीब के बच्चे भी पाल देता है

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रचनाकार परिचय

शमीम हयात 

ईमेल : Hayat.shamim@gmail.com

निवास : शामली(उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 5 फरवरी 1979
जन्मस्थान- शामली उत्तर प्रदेश 
लेखन विधा- ग़ज़ल गीत नज़्म
मोबाइल-7404972737