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जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

शाहरूख बेग की ग़ज़लें

शाहरूख बेग की ग़ज़लें

युवा ग़ज़लकार शाहरूख बेग़ की ग़ज़लें पारंपरिक लबो-लहजे की ग़ज़लें हैं, लेकिन इनकी कहन की ताज़गी प्रभावित करती है। हुस्न-इश्क़, प्यार-मुहब्बत, हिज़्र-विसाल के बीच ग़रीबी की लाचारी और दुनिया की हक़ीक़त भी इनकी ग़ज़लों में दिखाई पड़ती है।

ग़ज़ल- 01

नज़र उठा के जो ऊपर को देख लूँगा मैं
तुम्हे भी बाम पे पल भर को देख लूँगा मैं

बस एक बार मेरी सिम्त देख लेना तुम
तुम्हारी राह के पत्थर को देख लूँगा मैं

अभी तो सिर्फ मुझे रब को राज़ी करना है
फिर उसके बाद मुकद्दर को देख लूँगा मैं

तेरे लबों को अगर मुस्कुराते देख लिया
चमन के सारे गुले-तर को देख लूँगा मैं

अभी न काम बताओ, अभी है सोग़ के दिन
निकल के हिज़्र से दफ्तर को देख लूँगा मैं

फिर उसके बाद तुम्हें छोड़ दूँगा जीने को
तुम्हारी आँख में जब डर को देख लूँगा मैं

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ग़ज़ल- 02

हमारे गुस्से को आकर निढाल करना था
बिछड़ते वक़्त तो तुमको विसाल करना था

हमारे दुश्मनों का दिल तो रख लिया तुमने
हमारे दिल का भी थोड़ा ख़याल करना था

इसी वजह से ही तुमको छुआ नहीं अब तक
मुझे तो इश्क़ भी तुमसे हलाल करना था

मुझे हरीफ़ ने हैरान कर दिया हँस कर
उसे तो जीत पे मेरी मलाल करना था

ग़ुलाम इसलिए आज़ाद हो नहीं पाए
ख़मोश बैठे रहे जब सवाल करना था

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ग़ज़ल- 03

इज़हारे-इश्क़ कर दिया दिलबर के सामने
हमने गले को रख दिया खंजर के सामने

बिन माँगे पा लिया है तुम्हें एक शख्स ने
हम हाथ जोड़ते रहे पत्थर के सामने

होता है रश्क मुझको मुहब्बत के नाम से
महलों की बात मत करो बे-घर के सामने

इस वास्ते कटाना पड़ा अपना सर मुझे
दस्तार क़ीमती थी मेरे सर के सामने

अल्लाह की नज़र जो पड़ी मुझ फ़क़ीर पर
फिर पाँव छोटे पड़ गये चादर के सामने

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ग़ज़ल- 04

उसके होंठों से सुनी जब भी बड़ाई अपनी
तब लगा है ख़ुदा अपना है ख़ुदाई अपनी

ऐब सारे तुम्हें दुनिया के तो दिख जाते हैं
और दिखती ही नहीं तुमको बुराई अपनी

लोग तो औरों का हक़ छीन लिया करते हैं
हाय! हमने तो मुहब्बत भी न पाई अपनी

मुझको बेटी ने कहा था कि खिलौने ला दो
इसलिए ला नहीं पाया मैं दवाई अपनी

उसकी बातें किसी मिसरे की तरह होती हैं
सो गज़ल हो गई जब उसने सुनाई अपनी

तुमको माँगा है तहज्जुद की नमाज़ें पढ़कर
ऐन मुमकिन है कि हो जाए सगाई अपनी

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ग़ज़ल- 05

हमारी रौनके-अर्शो-ज़मीं नहीं आई
अभी तलक भी वो पर्दानशीं नहीं आई

हज़ार लड़कियाँ आई थीं ज़िंदगी में पर
तुम्हारे जैसी कोई भी हसीं नहीं आई

मैं चूमता गया होंठों को और गालों को
दिलो-दिमाग़ में तेरी जबीं नहीं आई

तुम्हारी बज़्म में सर को झुका के आना था?
हमारी आँख भी देखो! झुकी नहीं आई

भला वो चाँद तुम्हें किस तरह से लाकर दे
कि जिसके हिस्से में अब तक ज़मीं नहीं आई

मज़ाक बन गया मेरा तेरे न आने से
जहाँ पे बनता था आना, वहीं नहीं आई

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ग़ज़ल- 06

मौसमे-हिज़्र है और वस्ल की बातें करना
यार छोड़ो भी ये बे-फ़स्ल की बातें करना

अपने मक़तूल से ही क़त्ल की बातें करना
कौन समझाए तुम्हें अक़्ल की बातें करना

दिल के जज़्बात ही होठों से बयां होते हैं
हमसे आती ही नहीं नक़्ल की बातें करना

कोई इल्ज़ाम तेरे सर न कहीं आ जाए
बाद मेरे न मेरे क़त्ल की बातें करना

चाँद को चाँद की तारीफ़ भली लगती है
उससे करना भी तो हमशक्ल की बातें करना

बूढ़ी हड्डी है मगर बाप हूँ इक बेटी का
ज़िंदगी मुझसे न तू कस्ल की बातें करना

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ग़ज़ल- 07

एक त्यौहार का त्यौहार भी हो सकता है
ईद के दिन तेरा दीदार भी हो सकता है

एक तू है जो कभी भी नहीं मेरा होता
वरना होने को चमत्कार भी हो सकता है

शक्ल पे नूर है, बातों में हैं उसकी जादू
वो‌ किसी पीर का अवतार भी हो सकता है

अपने इंकार के लहजे में ज़रा नर्मी रख
मुझसे इक रोज़ तुझे प्यार भी हो सकता है

ध्यान से मारना है तीर मेरे दुश्मन को
सफ़े-दुश्मन में मेरा यार भी हो सकता है

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रचनाकार परिचय

शाहरूख बेग

ईमेल : shahrukhshayar86@gmail.com

निवास : मंगलौर (हरिद्वार)

पता- टांडा बन्हेरा, मंगलौर, ज़िला- हरिद्वार (उत्तराखंड)
मोबाइल- 7017692155