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मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

फागुन और बसंत- दशरथ कुमार सोलंकी

फागुन और बसंत- दशरथ कुमार सोलंकी

हवा, पानी, धूप की उन्मुक्ति में अवरोध प्रकृति की मुक्त-गति को ठेस पहुँचाते हैं। वह अपने मुख से कहती नहीं, उसकी मूक पर साक्षात् प्रतिक्रिया को हम अनदेखा करते हैं। हमारी प्रगति की परिभाषाएँ उन भाषाओं से अनभिज्ञ हैं, जो मानव के लिए शांति की राह प्रशस्त करती हैं। यह सभ्यता की ख़ामोश त्रासदी है।

आज उद्यान के उस कोने वाली बैंच पर बैठा, जहाँ लोगों की आवाज़ से अधिक पंछियों का कलरव सुनाई देता है। आवाज़ ही करनी है तो उद्यान आते क्यों लोग! हमारे घर-गलियाँ शोर से अटे पड़े हैं। शहर पूरा कोलाहल से भरा, इसलिए तो सुबह अरण्य के अंक में बिताने का मन करता। ऐसे में हल्की-सी आहट भी मन की नीरवता में ख़लल डालती लगती है। घड़ी भर तो मौन हुआ जाए! खुले मन से खुले आकाश को निहारा जाए! धूप को सीधे देह का निमज्जन करने दिया जाए। हवा को साँस में तो उतरने दिया ही जाए। उसे कोश-कोश और रोम-रोम तक पहुँचने दिया जाए। और हाँ, मौन मैं ही नहीं, पूरी कायनात चाहती है। मौन स्वभाव है प्रकृति का, शोर तो सभ्यता की देन है। यही सोचकर अस्तित्व के व्याकरण में लिखा था-

आवाज़ से ख़लल पड़ता है
निसर्ग की शांति में
इसलिए मौन साधना चाहता हूँ मैं।

हवा, पानी, धूप की उन्मुक्ति में अवरोध प्रकृति की मुक्त-गति को ठेस पहुँचाते हैं। वह अपने मुख से कहती नहीं, उसकी मूक पर साक्षात् प्रतिक्रिया को हम अनदेखा करते हैं। हमारी प्रगति की परिभाषाएँ उन भाषाओं से अनभिज्ञ हैं, जो मानव के लिए शांति की राह प्रशस्त करती हैं। यह सभ्यता की ख़ामोश त्रासदी है।

तो आज मैं कोने वाली बैंच पर बैठकर प्राकृत तत्वों को अपने अंदर आत्मसात् कर रहा था। पंछियों का कलरव मेरे मौन में माधुर्य घोल रहा था, फागुनी हवा मेरे तन की ताज़गी का हेतु बन रही थी, रवि-रश्मियाँ अपनी उज्ज्वलता का आख्यान मांड रही थीं। पास में पलाश के झड़ गये पत्ते मोक्ष-भाव से मुदित थे तो नीम के पेड़ की मंजरी नव्यता का काव्य रच रही थी। मेरे पैरों से तनिक दूर एक तिनका नृत्यरत था। तिनके भी नाच सकते हैं, यह देखना उदास आँखों में स्वप्न भरता है, उनमें उमंगित कर सकता है।

इस बार फागुन और फरवरी साथ-साथ आये। जा भी लगभग साथ ही रहे हैं। जैसे मौसमों के घर में दो रंग-बिरंगे खिलंदड़े मेहमान आये और कब विदा हुए, पता ही न चल सका। बसंत इनमें कहीं घुल-मिल गया। कभी जाता दिखा तो अभी आता। बसंत आए और ठहरें नहीं घड़ी-पलक, क्या अर्थ फिर उसका! वह आया, हूक उठी, उमंग का प्रस्फुटन हुआ और लो, वह तो निकल भी गया! शृंगार अधूरे रह गये, कामनाओं को पूर्णता प्राप्त न हो सकी। मदन किस बात का बदला ले रहा है कि मनुष्य को उसका ही उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता! प्रकृति में प्रफुल्लित होता बसंत, वह पल्लवों में खिलता, कलियों में उमगता, फूलों में महकता, पंछियों के कंठ में ठहरता।

तो क्या प्रकृति में हस्तक्षेप की सजा है यह मनुष्य को, कि लो रखो अपनी प्रगति, रखो अपनी सभ्यता, मैं मौसमों के आनंद से तुम्हें वंचित करता हूँ, बसंत को करता हूँ क्षीण! यदि ऐसा है तो यह हमारे अस्तित्व के समक्ष बड़ा प्रश्न है। उत्तर खोजने में देर न करनी होगी अन्यथा बसंत फिर कविताओं और ललित-निबंधों में भरकर रह जाएगा। दुःखद तो ये भी होगा कि हमारी नव-पीढ़ी पढ़ने से विमुख होती जा रही है, फिर किताबों के पन्नों पर भी कौन बाँचेगा बसंत! न बागन में बसंत, न पुस्तकन में, कितने बेनूर दिन होंगे वे!

मैं बचाए रखना चाहता हूँ प्रकृति की प्रसन्नता, प्राणियों की प्रफुल्लता। गिलहरी और चिड़िया को बचाए रखना चाहता हूँ। पंछियों का कलरव और टहनियों पर उनकी क्रीड़ाएँ बचाना चाहता हूँ। पगडंडी पर बिछे हुए पात नहीं मिलेंगे तो मेरे लिए प्रगति के पथ अर्थहीन होंगे। मैं फागुन के रंग बचाना चाहता हूँ, यद्यपि आधुनिकता की ज़िद्द फरवरी को बचाना चाहती है। मुझे उस हवा को बचाना है, जो भोर की बेला में मेरे देह और आत्मा को दवा और दुआ की तरह पोषती है। उस धूप को बचाना है, जो मेरे अंतस् के हर कोने को उज्ज्वलता देती है। हाँ, मुझे हमारे जीवन और ऋतुओं से बिछड़ते जा रहे बसंत को थोड़ा-सा बचाना है।

4 Total Review
S

Shashi Joshi

22 March 2026

Vikas ki aapadhapi me prakruti ke nuksan ka aakalan kavi hriday hi kar sakta he Insaan ko sach me shanti ki jarurat he

जीनस कंवर

21 March 2026

बेहद सुन्दर आलेख ...यह मात्र लेखन की सुंदरता नहीं है यह एक दृष्टि है प्रकृति के सौंदर्य चरम को अनुभूत करने का भाव है खुद के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए बचा लेने की तत्परता है...🌺🌿

दशरथ कुमार सोलंकी

21 March 2026

अपने पूर्वप्रकट भावों को पुनः पढ़ना, उन्हें अनुभूत करना अनन्य आनंद का स्रोत है । आभार और साधुवाद संपादक महोदय ।

कुलदीप सिंह भाटी

21 March 2026

बहुत सुंदर आलेख। हार्दिक बधाई सर

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
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1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
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