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अंततः ढह जाते हैं 'बिना दीवारों के घर'– के० पी० अनमोल

अंततः ढह जाते हैं 'बिना दीवारों के घर'– के० पी० अनमोल

बिना दीवारों के घर के ज़रिए लेखिका ने हमारे समाज की उन मनोवृत्तियों को उजागर किया है, जिनका शिकार कामकाजी महिलाएँ अपने ही घर में होती हैं। पति के द्वारा उसका साथ न देना, छोटी-बड़ी बात पर चरित्र पर शक करना, ख़ुद से आगे निकलने की ईर्ष्या और पुरुष का झूठे अहंकार के चलते बार-बार उसे अपमानित करना, ये सभी वे यातनाएँ हैं, जिनके मारे पढ़ी-लिखी महिलाएँ या तो घर चुनती हैं या नौकरी।

मन्नू भण्डारी जी मेरी सर्वाधिक पसंदीदा रचनाकारों में एक हैं। जिनका समग्र लेखन पढ़ा जाना ज़रूरी समझता हूँ। 'महाभोज, 'आपका बंटी', 'स्वामी' उपन्यासों के अलावा इनकी अनेक कहानियाँ पढ़ी हैं और पढ़े जाने के बाद बराबर हैरान हुआ हूँ और बार-बार इस बात तक पहुँचा हूँ कि मन्नू को अगर एक स्त्री रचनाकार की तरह न देखा जाए तो भी वे अपने दौर के लगभग हर लेखक पर भारी पड़ती हैं।
कुछ दिन पहले इनका नाटक 'बिना दीवारों के घर' हाथ लगा। इस कृति का नाम पहले भी सिलेबस की किताबें पढ़ते हुए बार-बार सामने पड़ा है। नाटक विधा पसंद भी है और फिर मन्नू भण्डारी, कई वजहें बनी ले आने की।

इन दिनों कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी की एक किताब पढ़ रहा हूँ, जिसमें घर-गृहस्थी के विषय में उनके लेख हैं। पढ़ते हुए बार-बार सोचा कि ऐसी पुस्तकें स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम में होनी चाहिए कि कितना कुछ सीखे जाने योग्य है इनमें युवा पीढ़ी के लिए! उसी तरह की पुस्तकों में यह नाटक भी है। घर, कैसे घर बनता है और कैसे घर को घर बनाया या बनाए रक्खा जाता है, ये इन किताबों के माध्यम से हम बड़ी सरलता से जान सकते हैं।

शोभा और अजित की गृहस्थी शक, ईर्ष्या, झूठे अहंकार और संवादहीनता के कारण कैसे टूट जाती है, यह इस नाटक की विषयवस्तु है। और इस घर के टूटने से उनकी बेटी अप्पी किस प्रकार प्रभावित होती है, यह भी। कुछ-कुछ यही विषय 'आपका बंटी' का भी है। 'आपका बंटी' पुस्तक की भूमिका में यह भी मालूम होता है कि यह पुस्तक हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक मोहन राकेश के अपनी पत्नी से तलाक से प्रेरित है तथा इसके प्रकाशन से पूर्व लेखिका मोहन राकेश से अनुमति भी लेती हैं।

'बिना दीवारों के घर' के ज़रिए लेखिका ने हमारे समाज की उन मनोवृत्तियों को उजागर किया है, जिनका शिकार कामकाजी महिलाएँ अपने ही घर में होती हैं। पति के द्वारा उसका साथ न देना, छोटी-बड़ी बात पर चरित्र पर शक करना, ख़ुद से आगे निकलने की ईर्ष्या और पुरुष का झूठे अहंकार के चलते बार-बार उसे अपमानित करना, ये सभी वे यातनाएँ हैं, जिनके मारे पढ़ी-लिखी महिलाएँ या तो घर चुनती हैं या नौकरी। लेकिन मन्नू की महिला पात्र मुखर होती हैं, वे नौकरी चुनती हैं, अपना अस्तित्व चुनती हैं। उन्हें करना भी यही चाहिए।

हालाँकि अब के पुरुषों की, और ख़ासकर नई पीढ़ी के नवयुवक पतियों की मानसिकता में बहुत अंतर आ चुका है। वे घर के भीतर-बाहर अपनी महिलाओं को बहुत सम्मान भी देते हैं और साथ भी, लेकिन इन बदलावों में 1970 से 2000 के समय की रचनाओं, फिल्मों, धारावाहिकों का बड़ा योगदान है।

'आपका बंटी' की भाँति यह कहानी भी 'घर टूटने' पर ख़त्म होती है और बंटी की तरह अप्पी के लिए संवेदनाएँ छोड़ जाती है। पूरी कहानी में टकराव की स्थिति बनी रहती है, जो अंत में एक निर्णायक फ़ैसले पर जाकर ठहरती है। यह फ़ैसला स्त्री स्वातंत्र्य की घोषणा है, मिथ्या पौरुष पर चोट है। यह फ़ैसला सदियों से दबाई गयी इच्छाओं का विस्फोट है।

यह पुस्तक एक बार फिर मोहर लगाती है कि मन्नू भण्डारी, प्रेमचंद के बाद भारतीय लोक के मानस को पकड़ने में सर्वाधिक सफल लेखक हैं।

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
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