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अनिता रश्मि की कहानी 'बंद दरवाज़े के पार'

अनिता रश्मि की कहानी 'बंद दरवाज़े के पार'

अनिता रश्मि जी यह कहानी अजनबीयत और अकेलेपन से शुरू होती है, और अपनेपन तथा संवेदनाओं से साथ ख़त्म। कहानी क्या है, हमारे दौर में पनपती एक अजीब-सी संस्कृति का चित्र खींचा है रचनाकार ने और बताने का प्रयास किया है कि इस 'गैप' को कैसे भरा जा सकता है। संवेदनाओं से, अपनत्व से लेकिन बिना जज किये, बिना बात बनाए, केवल मज़बूरी को समझते हुए। दरअसल शहरी कल्चर में सबकी एक कहानी है और वह कहानी शायद लज्जा अथवा उपहास के डर से हमें अलग-थलग किए दे रही है। यह कहानी इसी अलग-थलग पड़ते समाज को जोड़ने की कोशिश में एक 'टूल' थमाती है हमारे हाथों में। संवेदनशीलता का टूल।

उस घर के बंद दरवाज़े की ओर ताकते हुए वह अक्सर सोचता, 'कभी कोई फेंस के पास, खिड़कियों के पार या बरामदे में दिखलाई क्यों नहीं देता?' बेटा रौनक भी प्रायः पूछता, "पापा! उनके घर के दरवाज़े हमेशा बंद क्यों रहते हैं?"
शाम को इस घर का मालिक सुकेश बेटे के साथ खेलने, लाॅन चेयर पर सुस्ताते हुए नज़र आता। उसकी निगाहें अनायास सामने उठ जातीं। शायद किसी की परछाईं...। शाम रात में बदल जाती, वह दरवाज़ा नहीं खुलता। वह आठ बजे अंदर चला आता।
उस मकान के दरवाज़े पर लगा बड़ा-सा ताला रात गहराने पर लगभग नौ बजे खुलता। सवेरे दस बजे बाहर से बंद होता। सुकेश सात पंद्रह तक विद्यालय के लिए निकल जाता। तीन बजे तक छुट्टी। बच्चों के बीच रहते हुए वह बच्चों की मासूमियत को बेहद प्यार करने लगा था।
वह समझ भी नहीं पाया, वे आख़िर कैसे लोग हैं, कितने लोग हैं? रौशनी की लकीरें बंद दरवाज़े के पार से झाँक किसी की उपस्थिति की चुगली खाती रहतीं।
शुरू-शुरू में सुकेश सोचता, 'झिर्रयों से झरती रौशनी की इन लकीरों के लिए उन्हें जाकर टोके,
"दिन भर क्यों लाइट जलाते हैं? सेव पावर।"
एक बार गया था। बेल बजाई, तो अंदर से ही किसी ने रूखाई से कहा था, "कौन है? क्या चाहिए?"
"कुछ नहीं चाहिए। मैं आपका पड़ोसी। बस, मिलना...।"
"मुझे नहीं मिलना। जाइए वापस। न जाने कहाँ से...। दूसरे के घरों में ताक-झाँक...?"
प्रतिप्रश्न से उदास, अपना-सा मुँह लेकर उसका मिलनसार मन लौट गया था। आते ही रिया से कहा था, "कैसे हैं ये लोग! घर आए अतिथि के साथ कोई ऐसे बिहेव करता है! इतना रूखा स्वर!"
पर उसे अक्सर आवाज़ें परेशान कर डालतीं। रौनक के साथ खेलते हुए भी, "गोंऽऽ! गोंऽऽऽ!!"
"अरे! कोई तो अंदर छूटा रह जाता है।"
"शायद डाॅग है पापा!"
सिक्कड़ के खिसकने, मेज़-बर्त्तन खड़कने की आवाज़ें! वह नहीं चौंकता। आम घरों से उठनेवाली आवाज़ें।
उसके चौंकने की वजह थी, बंद मकान से भी उठा करती थीं वे आवाज़ें!
किसी की बंद ताले के पार से उपस्थिति का आभास! फिर मन को समझा लेता।

रिया कहती, "किसी के फटे में झाँकने की आदत तो तुम्हें थी नहीं, इस नए मकान में ऐसा क्या अजूबा...?"
"कुछ... कुछ तो है। अजूबा ही है रिया।"
"चलें अंदर? कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं है। ये फ्लैट कल्चर के लोग हैं। बड़े क्वार्टर में आ फँसे हैं, बस!"
"इतना भी क्या कटना! इतनी भी क्या प्राइवेसी!"
"भूल गये संतोष को? फ्लैट में केवल बीवी, बच्चे और मेड को जानता-पहचानता था। एक फ्लोर पर पाँच फ्लैट लेकिन किसी ने किसी का चेहरा नहीं देखा था।"
वह नहीं भूला था।
संतोष के पत्नी-बच्चे नाना के घर गए थे। अकेला संतोष बाथरूम में गिरकर बेहोश पड़ा रह गया था। फोन करने पर भी भनक नहीं लगी उसकी ऊषा को। वह दो-दिन तक ऑफिस, घर में फोन घुमाती रह गयी। जब तक ट्रेन घर पहुँचाती, गुमनाम-सी लाश पड़ी रही थी।
अब तक उसे सालती है संतोष की ऐसी मौत।

सुकेश दोपहर को लौटते ही एक दिन उस घर के फेंस की ओर बढ़ गया, अप्रत्याशित। चारों ओर की खिड़कियाँ , दरवाज़े बंद। पिछवाड़े गया।
"गोंऽऽ! गोंऽऽऽ!!"
कौनसा पशु है भई! पीछे के द्वार की झिर्री से उसने आँखें जोड़ लीं।
पिछला दरवाज़ा एक आँगन में खुल रहा था, उसके क्वार्टर की तरह। आँगन का बड़ा भाग सामने। उसके पार से बड़ा बरामदा भी झाँक रहा था। आँगन में वहीं पड़े मेज़ से बँधा सिक्कड़, बड़ा-सा लुढ़का कटोरा भोजन से लिथड़ा था। बरामदे पर एक बेड भी किनारे पड़ा था।
बहुत देर खड़ा रहा सुकेश सुगबुगाहट को पकड़ने की कोशिश करते हुए। कोई भी नज़र नहीं आया। अंततः वह लौट आया।
रिया सुनकर चौंकी ज़रूर पर इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं लगा उसे।
"पालतू के घर में रहने पर सब स्वाभाविक है।" वह शाम की तैयारियों में व्यस्त रहते हुए बोली।

शाम को रौनक के साथ क्रिकेट खेलते हुए भी सुकेश का ध्यान वहीं था।
दूसरे दिन सुकेश फिर बग़लगीर के पिछले दरवाज़े पर। आज भी दरवाज़ा अंदर से बोल्ट। कुछ तो नया नहीं। थोड़ी देर बाद आज भी लौटा।
लेकिन तीसरे दिन उसने अजूबा देख ही लिया।
वही सिक्कड़! सिक्कड़ खड़का और एक चौपाया एक तरफ से सरकता दूसरी तरफ चला गया। वह चौंका। उसकी आँखें झिर्री से चिपक रहीं। चौपाया पुनः उस ओर आया। सुकेश ठीक से देख नहीं पाया। थोड़ी देर बाद वापस लौटना ही चाहता था कि चौपाया एकदम सामने आ, दरवाज़े की ओर एकटक देखने लगा।
सुकेश की ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे।
एक किशोर था वह। कृशकाय। विकलांग और अर्द्ध विक्षिप्त।
"गोंऽ! गोंऽऽ!!" उसके मुँह से अस्फुष्ट आवाज़ निकलने लगी फिर। सुकेश थोड़ी देर में लौट गया।
'नहीं। अब और नहीं। मेरा इंट्यूशन एकदम सही था।'

उसी क्षण उसने ठान लिया। उस दिन उसने गोल-मटोल, घुँघराले बालोंवाले बेहद ख़ूबसूरत रौनक को और प्यार किया। पप्पी से उसका मुँह भर दिया। उसके साथ देर तक खेलता रहा। ख़ूब देर तक।
कल पार्क घूमने ले जाने और आइसक्रीम खिलाने का वादा भी। शाम क्षितिज के ललहुन सूर्य को विदा कह चुकी थी, वह वहीं बैठा रहा। विदा होते सूर्य ने अपना पीला, गुलाबी दुप्पटा समेट लिया, वह बैठा रहा। रात का ख़ामोश अँधेरा गहराया, वह बैठा रहा। रिया तीन-चार बार अंदर आने का निमंत्रण दे चुकी थी। उसने
हाथ के इशारे से मना कर दिया। वह टकटकी लगाए रहा।

नौ बजे दो सायों को जैसे ही उसने फेंस पार करते देखा, वह उठ गया। साए बरामदे की ओर बढ़े, वह लपकता वहाँ जा पहुँचा। वे दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हो रहे थे, अंदर से किलकारी की आवाज़ आने लगी थी। सिक्कड़, मेज़ के खिसकने की भी।
स्त्री आगे बढ़ चुकी थी। मर्द भी आगे बढ़ा।
"संजू, डोर बंद करो।"
एक स्त्री स्वर सुना सुकेश ने, जब वह दरवाज़े से अंदर प्रवेश कर रहा था। स्त्री ने आहट से चौंककर पीछे देखा। देखती रह गई विस्फारित नेत्रों से। पुरुष अपने बैग को टेबल पर रख, उस पतले-दुबले विक्षिप्त किशोर के सर पर हाथ फेर रहा था। गोरे लेकिन झँवलाए किशोर की नज़र सुकेश पर पड़ी।
"संजू, इसने तंग तो नहीं किया। खाना खाया था?"
पास ही खड़ी एक अधेड़ महिला से वह पूछ रहा था। उसका ध्यान अंदर घुस आये अजनबी आगंतुक की ओर एकदम नहीं था। फिर अचानक वह पलटा।
सब हतप्रभ हो गये। दोनों पति-पत्नी कुछ देर गुस्से, शर्मिंदगी, अफ़सोस से सुकेश को देखते रहे। फिर पहले पति की नज़रें नीची हुईं, तब पत्नी की। वे सुकेश की नज़रों से छिपना चाह रहे थे।
सुकेश ने एक निगाह उस बेतरतीब कमरे पर डाली। सबके उदास, लज्जा से झुके चेहरे को देखा। आगे टी० वी० स्टैंड के पास गया, ठिठका और फिर बाहर।
इस बीच उसने न एक शब्द कुछ कहा, न पूछा। लौटते हुए एक निगाह उन लोगो पर पुनः डाली, बस!

"अरे! यह कागज कैसा? रितेश, उसने रखा है।"
पत्नी ने साश्चर्य काग़ज़ उठाया। पढ़ा। उसकी आँखें नम हुईं। हाथों में थरथराहट भर गयी। काँपते हाथों से ख़त पति की तरफ बढ़ा दिया। पति ने भी पढ़ा। वह बेजान काग़ज़ नहीं, एक पत्र था। जीवंत-
"कुछ गुम जाने से ये जीवन ख़त्म नहीं हो जाता दोस्त! जीवन तो चलता ही रहता है। आप चलो, न चलो, वह रुकेगा नहीं। फिर हम क्यों रुक जाएँ! इस मासूम को इसके हिस्से की धूप, हवा, पानी लेने दो। देखना, यह कैसे फलता-फूलता है। कुदरत के इस खेल में तुम्हारा, इसका या किसी भी मनुष्य का क्या दोष? क्यों बाँधकर रख दी इस कोंपल की बढ़त?
तुम्हारे एक हमदर्द पड़ोसी ने तुम्हारे दर्द को जानने की जुर्रत की है। अंदर से आनेवाली किलकारी या आह की अनदेखी नहीं कर सका वह। क्षमाप्रार्थी!
पड़ोसी के घर का गेट तुम्हारे लिए सदा खुला है। मेरा बेटा रौनक अभी छोटा है। खेलने-कूदने की उम्र है उसकी। तुम्हारे बेटे की भी। रौनक तुम्हारे बेटे का इंतज़ार करेगा। आओगे न?"

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रचनाकार परिचय

अनिता रश्मि

ईमेल : rashmianita25@gmail.com

निवास : राँची (झारखण्ड)

प्रकाशन- छः कथा संग्रह, दो काव्य संग्रह सहित चौदह पुस्तकें प्रकाशित।
हंस दलित विशेषांक, जनसत्ता दीपावली विशेषांक, ज्ञानोदय झारखंड विशेषांक, लोकमत उत्सव विशेषांक (चार बार), विश्व गाथा कहानी कथा विशेषांक, लेखनी.नेट कहानी विशेषांक सहित प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर विविधवर्णी रचनाएँ प्रकाशित।
विशेष- शोध प्रबन्धों में रचनाएँ शामिल। अंग्रेजी, बंगला, मलयालम, तेलुगू में रचनाएँ अनुदित। एक लघु फिल्म में अभिनय।
सम्मान/पुरस्कार- अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार-सम्मान। 
संपर्क- 1 सी, डी ब्लाॅक, सत्यभामा ग्रैंड, कुसई, डोरंडा, राँची (झारखण्ड)- 834002
मोबाइल- 9431701893